December 2025
Section A
प्रश्न 1. तुलनात्मक राजनीति के आधुनिक उपागम की विस्तृत विवेचना कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) राजनीति विज्ञान की वह शाखा है जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं, संस्थाओं तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन और तुलना की जाती है। प्रारम्भ में इसका अध्ययन केवल संविधान और सरकारी संस्थाओं तक सीमित था, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद राजनीति के अध्ययन में नया दृष्टिकोण विकसित हुआ, जिसे आधुनिक उपागम (Modern Approach) कहा जाता है। इस उपागम में केवल संस्थाओं का ही नहीं बल्कि राजनीतिक व्यवहार, संस्कृति, सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का भी अध्ययन किया जाता है।
आधुनिक उपागम का अर्थ
आधुनिक उपागम वह वैज्ञानिक पद्धति है जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन वास्तविक तथ्यों, व्यवहार, आँकड़ों तथा सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल यह जानना नहीं है कि संविधान क्या कहता है, बल्कि यह समझना भी है कि व्यवहार में राजनीतिक व्यवस्था कैसे कार्य करती है।
आधुनिक उपागम के विकास के कारण
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नए स्वतंत्र देशों का उदय।
- सामाजिक विज्ञानों का विकास।
- व्यवहारवादी (Behavioural) आंदोलन का प्रभाव।
- वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धतियों का विकास।
- राजनीतिक विकास और आधुनिकीकरण का अध्ययन।
- राजनीति को समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति से जोड़कर देखने की आवश्यकता।
आधुनिक उपागम की प्रमुख विशेषताएँ
1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
इस उपागम में अध्ययन तथ्यों, आँकड़ों और प्रमाणों के आधार पर किया जाता है।
2. व्यवहारवादी दृष्टिकोण
केवल संविधान का अध्ययन नहीं किया जाता, बल्कि यह देखा जाता है कि नेता, मतदाता, राजनीतिक दल और दबाव समूह वास्तव में कैसे कार्य करते हैं।
3. राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन
राजनीतिक संस्थाओं के साथ-साथ सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है।
4. अंतःविषय (Interdisciplinary) दृष्टिकोण
राजनीति का अध्ययन समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान और इतिहास से जोड़कर किया जाता है।
5. मूल्य-निरपेक्षता
अध्ययन करते समय व्यक्तिगत विचारों और पक्षपात से बचने का प्रयास किया जाता है।
6. अनुभवजन्य (Empirical) अध्ययन
निष्कर्ष वास्तविक अनुभव, सर्वेक्षण और शोध के आधार पर निकाले जाते हैं।
7. विकासशील देशों का अध्ययन
आधुनिक उपागम केवल यूरोप और अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों का भी अध्ययन करता है।
8. तुलनात्मक विश्लेषण
विभिन्न देशों की समानताओं और असमानताओं की तुलना करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
9. राजनीतिक संस्कृति पर बल
यह अध्ययन करता है कि किसी देश के लोगों की मान्यताएँ, परम्पराएँ और राजनीतिक सोच उसकी राजनीति को कैसे प्रभावित करती हैं।
10. राजनीतिक विकास का अध्ययन
राजनीतिक स्थिरता, लोकतंत्रीकरण, आधुनिकीकरण तथा विकास की प्रक्रियाओं का भी विश्लेषण किया जाता है।
प्रमुख विद्वानों का योगदान
1. गैब्रियल आल्मंड (Gabriel Almond)
राजनीतिक व्यवस्था तथा संरचना-कार्य (Structural Functional) सिद्धांत का विकास किया।
2. डेविड ईस्टन (David Easton)
राजनीति को एक "राजनीतिक प्रणाली" (Political System) के रूप में समझाया।
3. लूसियन पाई (Lucian Pye)
राजनीतिक विकास और राजनीतिक संस्कृति का अध्ययन किया।
4. कार्ल डॉइच (Karl Deutsch)
संचार (Communication) और राजनीतिक व्यवस्था के संबंध को स्पष्ट किया।
आधुनिक उपागम के गुण
- अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक।
- वास्तविक राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन।
- सभी देशों पर लागू।
- राजनीतिक विकास को समझने में सहायक।
- सामाजिक एवं आर्थिक कारकों को महत्व देता है।
- निष्पक्ष एवं प्रमाण-आधारित अध्ययन।
आधुनिक उपागम की सीमाएँ
- पूरी तरह मूल्य-निरपेक्ष रहना कठिन है।
- आँकड़ों का संग्रह कठिन और महँगा होता है।
- सामाजिक एवं सांस्कृतिक अंतर के कारण सभी देशों की तुलना सरल नहीं होती।
- कई बार व्यवहार पर अधिक ध्यान देने से संवैधानिक पक्ष की उपेक्षा हो जाती है।
निष्कर्ष
आधुनिक उपागम ने तुलनात्मक राजनीति को अधिक वैज्ञानिक, व्यावहारिक और व्यापक बनाया है। इसने केवल संवैधानिक अध्ययन तक सीमित रहने के बजाय राजनीतिक व्यवहार, संस्कृति, सामाजिक परिस्थितियों तथा राजनीतिक विकास को भी अध्ययन का भाग बनाया। आज तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में आधुनिक उपागम सबसे अधिक उपयोगी और प्रभावशाली माना जाता है।
प्रश्न 2. संविधानवाद क्या है? संविधान और संविधानवाद के बीच अंतर समझाइए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
किसी भी लोकतांत्रिक राज्य के सुचारु संचालन के लिए केवल संविधान का होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसका पालन भी आवश्यक होता है। संविधान सरकार की संरचना और शक्तियों को निर्धारित करता है, जबकि संविधानवाद (Constitutionalism) यह सुनिश्चित करता है कि सरकार संविधान के अनुसार कार्य करे और नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहें। इसलिए संविधान और संविधानवाद दोनों एक-दूसरे से जुड़े होने पर भी अलग-अलग अवधारणाएँ हैं।
संविधानवाद का अर्थ
संविधानवाद वह राजनीतिक सिद्धांत है जिसके अनुसार सरकार की सभी शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित होती हैं और शासन कानून के अनुसार चलाया जाता है।
इसका मुख्य उद्देश्य है—
- सरकार की शक्तियों पर नियंत्रण रखना।
- नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना।
- कानून का शासन स्थापित करना।
- लोकतंत्र और उत्तरदायी शासन को मजबूत बनाना।
विद्वान कार्ल फ्रेडरिक के अनुसार,
"संविधानवाद का अर्थ सीमित सरकार तथा कानून के शासन की स्थापना है।"
संविधानवाद के प्रमुख तत्व
1. संविधान की सर्वोच्चता
देश का सर्वोच्च कानून संविधान होता है। सरकार और सभी नागरिकों को इसका पालन करना पड़ता है।
2. कानून का शासन (Rule of Law)
सभी व्यक्ति कानून के सामने समान होते हैं। कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होता।
3. सीमित सरकार
सरकार अपनी शक्तियों का मनमाना प्रयोग नहीं कर सकती। उसकी शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित रहती हैं।
4. मौलिक अधिकारों की सुरक्षा
संविधानवाद नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।
5. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है और सरकार के कार्यों की संवैधानिकता की जाँच करती है।
6. शक्तियों का विभाजन
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का उचित विभाजन किया जाता है।
7. उत्तरदायी सरकार
सरकार जनता और संविधान दोनों के प्रति उत्तरदायी होती है।
8. लोकतांत्रिक शासन
संविधानवाद लोकतांत्रिक मूल्यों और जनसहभागिता को बढ़ावा देता है।
संविधान और संविधानवाद में अंतर
| संविधान | संविधानवाद |
|---|---|
| संविधान देश का मूल कानून है। | संविधानवाद एक राजनीतिक सिद्धांत एवं विचारधारा है। |
| यह शासन की संरचना और शक्तियों का वर्णन करता है। | यह सुनिश्चित करता है कि सरकार संविधान के अनुसार कार्य करे। |
| संविधान लिखित या अलिखित हो सकता है। | संविधानवाद किसी भी प्रकार के संविधान में लागू हो सकता है। |
| संविधान केवल नियमों का संग्रह है। | संविधानवाद उन नियमों के पालन पर बल देता है। |
| संविधान सरकार की शक्तियाँ निर्धारित करता है। | संविधानवाद सरकार की शक्तियों को सीमित करता है। |
| संविधान का होना पर्याप्त नहीं है। | संविधानवाद संविधान के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करता है। |
| संविधान कभी-कभी नागरिक अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा नहीं कर पाता। | संविधानवाद नागरिकों के अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देता है। |
संविधानवाद का महत्व
- लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
- नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।
- सरकार को निरंकुश बनने से रोकता है।
- कानून के शासन को स्थापित करता है।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखता है।
- शासन में स्थिरता और पारदर्शिता लाता है।
- जनता का सरकार पर विश्वास बढ़ाता है।
संविधानवाद की सीमाएँ
- केवल संविधान होने से संविधानवाद स्थापित नहीं हो जाता।
- यदि सरकार संविधान का पालन न करे, तो संविधानवाद कमजोर हो जाता है।
- राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार संविधानवाद को प्रभावित कर सकते हैं।
- आपातकाल जैसी परिस्थितियों में संविधानवाद की भावना कमजोर पड़ सकती है।
निष्कर्ष
संविधान और संविधानवाद एक-दूसरे के पूरक हैं। संविधान शासन की रूपरेखा प्रदान करता है, जबकि संविधानवाद यह सुनिश्चित करता है कि शासन संविधान के अनुसार, कानून के शासन के अंतर्गत तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए संचालित हो। किसी भी लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य के लिए संविधानवाद अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 3. संसदात्मक शासन प्रणाली से आप क्या समझते हैं? इसकी मुख्य विशेषताओं की विवेचना कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संसदात्मक शासन प्रणाली (Parliamentary System of Government) विश्व की सबसे लोकप्रिय लोकतांत्रिक शासन प्रणालियों में से एक है। इस प्रणाली में कार्यपालिका (Executive) विधायिका (Legislature) से निकलती है और उसके प्रति उत्तरदायी होती है। यदि सरकार संसद का विश्वास खो देती है, तो उसे इस्तीफा देना पड़ता है। ब्रिटेन इस प्रणाली का मूल देश माना जाता है, जबकि भारत, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे अनेक देशों में भी यह प्रणाली अपनाई गई है।
संसदात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
संसदात्मक शासन प्रणाली वह शासन व्यवस्था है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद होती है तथा वे संसद के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होते हैं। इस प्रणाली में राष्ट्राध्यक्ष (राजा या राष्ट्रपति) केवल संवैधानिक प्रमुख होता है, जबकि वास्तविक शासन प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल चलाते हैं।
संसदात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. नाममात्र और वास्तविक कार्यपालिका
इस प्रणाली में दो प्रकार की कार्यपालिका होती है—
- नाममात्र कार्यपालिका – राष्ट्रपति या राजा, जो संवैधानिक प्रमुख होता है।
- वास्तविक कार्यपालिका – प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद, जो शासन का वास्तविक संचालन करते हैं।
उदाहरण: भारत में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख हैं, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका के प्रमुख हैं।
2. कार्यपालिका और विधायिका का घनिष्ठ संबंध
प्रधानमंत्री और मंत्री संसद के सदस्य होते हैं। वे संसद में भाग लेते हैं तथा उसके प्रति उत्तरदायी रहते हैं।
3. मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्व
संसदात्मक प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत सामूहिक उत्तरदायित्व है।
यदि संसद अविश्वास प्रस्ताव पारित कर देती है, तो पूरी मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है।
4. प्रधानमंत्री का नेतृत्व
प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है। वह—
- मंत्रियों की नियुक्ति की सलाह देता है।
- मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
- सरकारी नीतियाँ निर्धारित करता है।
- प्रशासन का नेतृत्व करता है।
5. बहुदलीय व्यवस्था
अधिकांश संसदीय लोकतंत्रों में कई राजनीतिक दल होते हैं। बहुमत प्राप्त दल सरकार बनाता है।
यदि किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिले, तो गठबंधन सरकार बन सकती है।
6. संसद की सर्वोच्च भूमिका
सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। संसद प्रश्नकाल, चर्चा, अविश्वास प्रस्ताव तथा अन्य संसदीय उपायों के माध्यम से सरकार पर नियंत्रण रखती है।
7. लचीली कार्यपालिका
यदि सरकार जनता का विश्वास खो देती है, तो उसे हटाया जा सकता है। इससे नई सरकार का गठन संभव होता है।
8. विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका
विपक्ष सरकार की नीतियों की समीक्षा करता है, कमियों की ओर ध्यान दिलाता है तथा जनता के हितों की रक्षा करता है।
9. उत्तरदायी शासन
सरकार अपने प्रत्येक निर्णय के लिए संसद और जनता के प्रति उत्तरदायी रहती है।
10. लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित
इस प्रणाली में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि सरकार का संचालन करते हैं, जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है।
संसदात्मक शासन प्रणाली के गुण
1. उत्तरदायी सरकार
सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी रहती है।
2. लोकतांत्रिक शासन
जनप्रतिनिधियों के माध्यम से शासन संचालित होता है।
3. निरंकुशता पर नियंत्रण
संसद सरकार के कार्यों की निरंतर निगरानी करती है।
4. लचीलापन
सरकार बदलने के लिए क्रांति या हिंसा की आवश्यकता नहीं होती।
5. जनता की भागीदारी
जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन में भाग लेती है।
6. नीति निर्माण में सहयोग
मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से निर्णय लेती है, जिससे बेहतर नीतियाँ बनती हैं।
संसदात्मक शासन प्रणाली के दोष
1. राजनीतिक अस्थिरता
यदि सरकार के पास बहुमत न हो, तो सरकार बार-बार बदल सकती है।
2. गठबंधन की समस्याएँ
गठबंधन सरकारों में निर्णय लेने में कठिनाई हो सकती है।
3. प्रधानमंत्री पर अत्यधिक निर्भरता
यदि प्रधानमंत्री बहुत शक्तिशाली हो जाए, तो मंत्रिमंडल की भूमिका कमजोर पड़ सकती है।
4. निर्णय लेने में विलंब
संसद में लंबी चर्चा के कारण निर्णय लेने में समय लग सकता है।
5. दलीय राजनीति का प्रभाव
कई बार राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा दलगत हित अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
संसदात्मक शासन प्रणाली के उदाहरण
- ब्रिटेन
- भारत
- कनाडा
- ऑस्ट्रेलिया
- जापान
- न्यूज़ीलैंड
निष्कर्ष
संसदात्मक शासन प्रणाली लोकतंत्र, उत्तरदायित्व और जनप्रतिनिधित्व पर आधारित शासन व्यवस्था है। इसमें सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी रहती है और जनता के हितों की रक्षा का प्रयास करती है। यद्यपि इसमें राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन की समस्याएँ हो सकती हैं, फिर भी उत्तरदायी और लोकतांत्रिक शासन प्रदान करने के कारण यह विश्व की सबसे सफल शासन प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
प्रश्न 4. अमरीकी संविधान की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) का संविधान विश्व का सबसे पुराना लिखित संविधान माना जाता है। इसे 17 सितम्बर 1787 को तैयार किया गया और 1789 से लागू किया गया। यह संविधान लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता तथा कानून के शासन के सिद्धांतों पर आधारित है। अपनी स्थिरता और प्रभावशीलता के कारण अमेरिकी संविधान ने अनेक देशों के संविधानों को प्रभावित किया है।
अमेरिकी संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. विश्व का सबसे पुराना लिखित संविधान
अमेरिकी संविधान विश्व का पहला आधुनिक लिखित संविधान है। इसमें शासन की संरचना, शक्तियाँ तथा नागरिकों के अधिकार स्पष्ट रूप से लिखे गए हैं।
2. संघीय शासन व्यवस्था (Federal System)
अमेरिका में संघीय शासन प्रणाली है, जिसमें शक्तियों का विभाजन दो स्तरों पर किया गया है—
- संघीय (केंद्रीय) सरकार
- राज्य सरकारें
दोनों सरकारें संविधान द्वारा निर्धारित अपने-अपने अधिकारों का प्रयोग करती हैं।
3. शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
अमेरिकी संविधान सरकार को तीन स्वतंत्र शाखाओं में बाँटता है—
- विधायिका (Congress) – कानून बनाती है।
- कार्यपालिका (President) – कानून लागू करती है।
- न्यायपालिका (Supreme Court) – संविधान की रक्षा करती है और न्याय प्रदान करती है।
इससे किसी एक संस्था में अत्यधिक शक्ति केंद्रित नहीं होती।
4. नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances)
तीनों शाखाएँ एक-दूसरे पर नियंत्रण रखती हैं।
उदाहरण—
- राष्ट्रपति विधेयक पर वीटो लगा सकता है।
- कांग्रेस राष्ट्रपति के वीटो को विशेष बहुमत से निरस्त कर सकती है।
- सर्वोच्च न्यायालय कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
इस व्यवस्था से सत्ता का दुरुपयोग रुकता है।
5. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली
अमेरिका में राष्ट्रपति ही राष्ट्राध्यक्ष और सरकार का प्रमुख दोनों होता है।
- राष्ट्रपति निश्चित अवधि (4 वर्ष) के लिए चुना जाता है।
- वह कांग्रेस के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
- उसे केवल महाभियोग (Impeachment) द्वारा हटाया जा सकता है।
6. कठोर संविधान (Rigid Constitution)
अमेरिकी संविधान में संशोधन करना कठिन है।
संशोधन के लिए—
- कांग्रेस में विशेष बहुमत,
- तथा अधिकांश राज्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
इसी कारण अब तक इसमें बहुत कम संशोधन हुए हैं।
7. स्वतंत्र न्यायपालिका
अमेरिका की न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र है।
सर्वोच्च न्यायालय—
- संविधान की रक्षा करता है।
- नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करता है।
- सरकार के कार्यों की संवैधानिकता की जाँच करता है।
8. न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)
सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून या सरकारी निर्णय को असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
यह लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का महत्वपूर्ण साधन है।
9. मौलिक अधिकार (Bill of Rights)
संविधान के पहले दस संशोधनों को Bill of Rights कहा जाता है।
इनमें नागरिकों को महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं, जैसे—
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- धर्म की स्वतंत्रता
- प्रेस की स्वतंत्रता
- निष्पक्ष न्याय पाने का अधिकार
- हथियार रखने का अधिकार (द्वितीय संशोधन)
10. जनता की संप्रभुता (Popular Sovereignty)
अमेरिकी संविधान का प्रारंभ "We the People" शब्दों से होता है।
इसका अर्थ है कि राज्य की सर्वोच्च शक्ति जनता में निहित है।
11. लोकतांत्रिक गणराज्य
अमेरिका एक लोकतांत्रिक गणराज्य है जहाँ राष्ट्रपति जनता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होता है तथा शासन जनता के प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होता है।
12. द्विसदनीय विधायिका (Bicameral Legislature)
अमेरिकी कांग्रेस दो सदनों से मिलकर बनी है—
- सीनेट (Senate) – राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है।
- प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) – जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
13. संविधान की सर्वोच्चता
अमेरिका में संविधान सर्वोच्च कानून है। सरकार की सभी शाखाएँ संविधान के अनुसार कार्य करती हैं।
अमेरिकी संविधान के गुण
- विश्व का सबसे स्थायी और सफल संविधान।
- नागरिकों के अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा।
- स्वतंत्र न्यायपालिका।
- शक्तियों का संतुलन।
- लोकतांत्रिक एवं उत्तरदायी शासन।
- संघीय व्यवस्था के कारण केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन।
अमेरिकी संविधान की सीमाएँ
- संविधान में संशोधन करना बहुत कठिन है।
- राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच टकराव की संभावना रहती है।
- न्यायपालिका को अत्यधिक शक्तिशाली माना जाता है।
- निर्वाचन प्रणाली (Electoral College) की अक्सर आलोचना होती है।
- संघीय और राज्य सरकारों के बीच अधिकारों को लेकर विवाद हो सकते हैं।
निष्कर्ष
अमेरिकी संविधान लोकतंत्र, स्वतंत्रता, कानून के शासन तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी संघीय व्यवस्था, शक्तियों का पृथक्करण, नियंत्रण एवं संतुलन तथा स्वतंत्र न्यायपालिका इसे विश्व के सबसे प्रभावशाली संविधानों में स्थान दिलाते हैं। यद्यपि इसमें कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी इसकी स्थिरता और प्रभावशीलता के कारण यह आज भी अनेक देशों के लिए प्रेरणास्रोत है।
प्रश्न 5. स्विस संघीय व्यवस्था पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
स्विट्ज़रलैण्ड (Switzerland) विश्व के सबसे सफल लोकतांत्रिक और संघीय देशों में से एक है। यहाँ की संघीय शासन व्यवस्था (Federal System) अपनी स्थिरता, विकेंद्रीकरण और प्रत्यक्ष लोकतंत्र के कारण विशेष महत्व रखती है। स्विट्ज़रलैण्ड में विभिन्न भाषाएँ, संस्कृतियाँ और धर्म होने के बावजूद देश में एकता और राजनीतिक स्थिरता बनी हुई है। इसका प्रमुख कारण इसकी सुदृढ़ संघीय व्यवस्था है।
स्विस संघीय व्यवस्था का अर्थ
संघीय शासन व्यवस्था वह व्यवस्था है जिसमें शक्तियों का विभाजन संघ (Federal Government) और कैंटन (Cantons/States) के बीच संविधान द्वारा किया जाता है।
स्विट्ज़रलैण्ड में वर्तमान में 26 कैंटन हैं। प्रत्येक कैंटन को अपने स्थानीय मामलों में पर्याप्त स्वायत्तता (Autonomy) प्राप्त है।
स्विस संघीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
1. लिखित एवं कठोर संविधान
स्विट्ज़रलैण्ड का संविधान लिखित तथा कठोर है। इसमें संशोधन के लिए जनता तथा कैंटनों दोनों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
2. शक्तियों का विभाजन
संविधान के अनुसार शक्तियाँ दो स्तरों में बाँटी गई हैं—
- संघीय सरकार – राष्ट्रीय महत्व के विषय, जैसे रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा आदि।
- कैंटन सरकारें – शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस तथा स्थानीय प्रशासन जैसे विषय।
इससे दोनों स्तरों की सरकारें स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।
3. कैंटनों की स्वायत्तता
स्विट्ज़रलैण्ड के प्रत्येक कैंटन का अपना—
- संविधान
- संसद
- सरकार
- न्यायालय
होता है। वे अपने आंतरिक मामलों का स्वयं संचालन करते हैं।
4. द्विसदनीय संघीय संसद
स्विट्ज़रलैण्ड की संसद को संघीय सभा (Federal Assembly) कहा जाता है, जिसके दो सदन हैं—
(क) राष्ट्रीय परिषद (National Council)
- जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
- सदस्यों का चुनाव जनसंख्या के आधार पर होता है।
(ख) राज्यों की परिषद (Council of States)
- कैंटनों का प्रतिनिधित्व करती है।
- प्रत्येक कैंटन को समान प्रतिनिधित्व मिलता है।
दोनों सदनों को लगभग समान शक्तियाँ प्राप्त हैं।
5. बहुल कार्यपालिका (Federal Council)
स्विट्ज़रलैण्ड में एक व्यक्ति राष्ट्रपति नहीं होता, बल्कि सात सदस्यों वाली संघीय परिषद (Federal Council) कार्यपालिका का कार्य करती है।
- सभी सदस्य समान अधिकार रखते हैं।
- राष्ट्रपति केवल एक वर्ष के लिए चुना जाता है।
- राष्ट्रपति अन्य सदस्यों से अधिक शक्तिशाली नहीं होता।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
संघीय सर्वोच्च न्यायालय संविधान और कानून की रक्षा करता है तथा विभिन्न स्तरों के विवादों का समाधान करता है।
7. प्रत्यक्ष लोकतंत्र
स्विट्ज़रलैण्ड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) है।
जनता सीधे शासन में भाग लेती है।
इसके प्रमुख साधन हैं—
- जनमत संग्रह (Referendum)
- जन पहल (Popular Initiative)
इससे जनता को कानून बनाने और संविधान संशोधन में भाग लेने का अवसर मिलता है।
8. बहुभाषी एवं बहुसांस्कृतिक व्यवस्था
स्विट्ज़रलैण्ड में मुख्यतः चार भाषाएँ बोली जाती हैं—
- जर्मन
- फ्रेंच
- इटालियन
- रोमांश
संघीय व्यवस्था सभी भाषाओं और संस्कृतियों को समान सम्मान देती है।
9. विकेंद्रीकरण
अधिकांश प्रशासनिक कार्य स्थानीय स्तर पर किए जाते हैं। इससे प्रशासन अधिक प्रभावी और जनता के निकट रहता है।
10. लोकतांत्रिक और उत्तरदायी शासन
संघीय तथा कैंटन सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं। इससे शासन में पारदर्शिता और विश्वास बना रहता है।
स्विस संघीय व्यवस्था के गुण
1. स्थानीय स्वायत्तता
कैंटन अपने स्थानीय मामलों का स्वतंत्र रूप से संचालन करते हैं।
2. राष्ट्रीय एकता
भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद राष्ट्रीय एकता बनी रहती है।
3. लोकतंत्र को बढ़ावा
जनमत संग्रह और जन पहल जैसी व्यवस्थाएँ जनता की भागीदारी सुनिश्चित करती हैं।
4. सत्ता का विकेंद्रीकरण
सभी शक्तियाँ केंद्र में केंद्रित नहीं होतीं।
5. स्थिर शासन
बहुल कार्यपालिका और सहयोग की भावना के कारण राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है।
6. नागरिक अधिकारों की रक्षा
संविधान तथा न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।
स्विस संघीय व्यवस्था के दोष
1. निर्णय लेने में विलंब
जनमत संग्रह और व्यापक परामर्श के कारण कई बार निर्णय लेने में अधिक समय लगता है।
2. प्रशासनिक जटिलता
संघ, कैंटन और स्थानीय सरकारों के बीच समन्वय कठिन हो सकता है।
3. अधिक खर्च
तीन स्तर की सरकारों के कारण प्रशासनिक व्यय बढ़ जाता है।
4. विभिन्न कैंटनों में नीतियों का अंतर
अलग-अलग कैंटन अपनी-अपनी नीतियाँ बनाते हैं, जिससे कुछ मामलों में असमानता दिखाई देती है।
निष्कर्ष
स्विट्ज़रलैण्ड की संघीय व्यवस्था विश्व की सबसे सफल संघीय व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संघवाद, लोकतंत्र, विकेंद्रीकरण और प्रत्यक्ष लोकतंत्र का उत्कृष्ट समन्वय देखने को मिलता है। यही कारण है कि विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और धर्मों वाले समाज में भी स्विट्ज़रलैण्ड राजनीतिक स्थिरता, शांति और विकास का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
Section B
प्रश्न 1. ब्रिटेन की दलीय व्यवस्था का वर्णन कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
ब्रिटेन विश्व का सबसे पुराना लोकतांत्रिक देश माना जाता है। यहाँ की दलीय व्यवस्था (Party System) संसदीय लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार है। राजनीतिक दल जनता और सरकार के बीच सेतु का कार्य करते हैं। ब्रिटेन में मुख्य रूप से द्विदलीय व्यवस्था (Two-Party System) विकसित हुई है, यद्यपि वर्तमान समय में कुछ अन्य दल भी सक्रिय हैं।
ब्रिटेन की दलीय व्यवस्था
ब्रिटेन में लंबे समय तक दो प्रमुख राजनीतिक दलों का प्रभाव रहा है—
- कंज़र्वेटिव पार्टी (Conservative Party)
- लेबर पार्टी (Labour Party)
इन दोनों दलों के बीच सत्ता परिवर्तन होता रहता है। अन्य दल भी चुनाव लड़ते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इन दो दलों का प्रभाव सबसे अधिक रहा है।
ब्रिटेन की दलीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
1. द्विदलीय व्यवस्था
ब्रिटेन की सबसे प्रमुख विशेषता द्विदलीय व्यवस्था है। सामान्यतः एक दल सरकार बनाता है और दूसरा प्रमुख विपक्ष की भूमिका निभाता है।
2. मजबूत विपक्ष
ब्रिटेन में विपक्ष को लोकतंत्र का आवश्यक अंग माना जाता है। विपक्ष सरकार की नीतियों की आलोचना करता है और उसे उत्तरदायी बनाए रखता है।
3. अनुशासित राजनीतिक दल
ब्रिटेन के राजनीतिक दलों में अनुशासन बहुत मजबूत होता है। सांसद सामान्यतः अपने दल के निर्णयों का पालन करते हैं।
4. स्पष्ट नीतियाँ
प्रमुख दल चुनाव से पहले अपना घोषणापत्र (Manifesto) जारी करते हैं, जिससे मतदाता उनकी नीतियों को समझकर मतदान कर सकें।
5. संसदीय शासन का आधार
ब्रिटेन में बहुमत प्राप्त दल सरकार बनाता है। उसका नेता प्रधानमंत्री बनता है और मंत्रिमंडल का गठन करता है।
6. शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन
चुनाव के बाद सत्ता का परिवर्तन शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से होता है। यह ब्रिटिश लोकतंत्र की महत्वपूर्ण विशेषता है।
7. राष्ट्रीय और स्थानीय संगठन
सभी प्रमुख दल राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर संगठित होते हैं, जिससे वे जनता से जुड़े रहते हैं।
प्रमुख राजनीतिक दल
(1) कंज़र्वेटिव पार्टी (Conservative Party)
- यह ब्रिटेन का प्रमुख और सबसे पुराना राजनीतिक दल है।
- मुक्त बाजार, निजी उद्योग और पारंपरिक मूल्यों का समर्थन करती है।
- सीमित सरकारी हस्तक्षेप की पक्षधर मानी जाती है।
(2) लेबर पार्टी (Labour Party)
- यह श्रमिकों और मध्यम वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व करती है।
- सामाजिक न्याय, कल्याणकारी योजनाओं और समान अवसरों पर बल देती है।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाओं के विकास का समर्थन करती है।
(3) अन्य दल
ब्रिटेन में कुछ अन्य दल भी सक्रिय हैं, जैसे—
- लिबरल डेमोक्रेट्स (Liberal Democrats)
- स्कॉटिश नेशनल पार्टी (SNP)
- प्लेड कम्री (Plaid Cymru)
- ग्रीन पार्टी (Green Party)
हालाँकि इनका प्रभाव मुख्यतः कुछ क्षेत्रों तक सीमित रहता है।
ब्रिटेन की दलीय व्यवस्था के गुण
- स्थिर सरकार का निर्माण।
- उत्तरदायी शासन।
- मजबूत विपक्ष।
- स्पष्ट नीतियाँ और चुनावी विकल्प।
- लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूती।
ब्रिटेन की दलीय व्यवस्था की सीमाएँ
- छोटे दलों को कम प्रतिनिधित्व मिलता है।
- कई बार दो बड़े दलों का अत्यधिक प्रभुत्व हो जाता है।
- दलीय अनुशासन के कारण सांसद स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त नहीं कर पाते।
- क्षेत्रीय दलों के हितों की अनदेखी हो सकती है।
निष्कर्ष
ब्रिटेन की दलीय व्यवस्था संसदीय लोकतंत्र की सफलता का महत्वपूर्ण आधार है। इसकी द्विदलीय प्रणाली, मजबूत विपक्ष, अनुशासित राजनीतिक दल और शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक शासन को प्रभावी बनाते हैं। वर्तमान में अन्य दलों का प्रभाव बढ़ा है, फिर भी कंज़र्वेटिव और लेबर पार्टी ब्रिटेन की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
प्रश्न 2. संविधानवाद की पाश्चात्य अवधारणा की चर्चा कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संविधानवाद (Constitutionalism) लोकतांत्रिक शासन की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका उद्देश्य सरकार की शक्तियों को संविधान द्वारा सीमित करना तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। पाश्चात्य (Western) अवधारणा का विकास मुख्यतः ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस जैसे लोकतांत्रिक देशों में हुआ, जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून का शासन और सीमित सरकार पर विशेष बल दिया गया।
संविधानवाद की पाश्चात्य अवधारणा
पाश्चात्य विचारधारा के अनुसार संविधानवाद का अर्थ केवल संविधान का अस्तित्व नहीं, बल्कि संविधान के अनुसार शासन चलाना है। सरकार संविधान और कानून के अधीन रहती है तथा मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकती।
इस अवधारणा का मुख्य उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करना और लोकतांत्रिक शासन को मजबूत बनाना है।
पाश्चात्य संविधानवाद की प्रमुख विशेषताएँ
1. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है। सरकार की सभी शाखाएँ संविधान के अनुसार कार्य करती हैं।
2. सीमित सरकार (Limited Government)
सरकार की शक्तियाँ संविधान द्वारा निर्धारित और सीमित होती हैं। सरकार अपनी इच्छा से कानून नहीं बना सकती।
3. कानून का शासन (Rule of Law)
सभी नागरिक और शासक कानून के सामने समान होते हैं। कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होता।
4. मौलिक अधिकारों की रक्षा
संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति, धर्म, समानता तथा स्वतंत्रता जैसे अधिकार प्रदान करता है और उनकी सुरक्षा करता है।
5. शक्तियों का पृथक्करण
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियों का विभाजन किया जाता है, जिससे सत्ता का दुरुपयोग न हो।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है तथा नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
7. लोकतांत्रिक शासन
सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और जनता के प्रति उत्तरदायी रहती है।
8. उत्तरदायित्व और पारदर्शिता
सरकार अपने कार्यों के लिए जनता और संसद के प्रति उत्तरदायी होती है तथा शासन में पारदर्शिता बनाए रखती है।
पाश्चात्य संविधानवाद का महत्व
- लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
- नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करता है।
- सरकार की निरंकुशता पर रोक लगाता है।
- कानून के शासन की स्थापना करता है।
- शासन में स्थिरता और उत्तरदायित्व लाता है।
सीमाएँ
- केवल संविधान होने से संविधानवाद स्थापित नहीं होता।
- यदि सरकार संविधान का पालन न करे, तो संविधानवाद कमजोर हो जाता है।
- आपातकाल जैसी परिस्थितियों में नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
- राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार संविधानवाद की भावना को प्रभावित कर सकते हैं।
निष्कर्ष
पाश्चात्य संविधानवाद लोकतंत्र, कानून के शासन, सीमित सरकार और नागरिक अधिकारों की रक्षा पर आधारित है। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार संविधान के अनुसार कार्य करे और किसी भी प्रकार की निरंकुशता को रोका जा सके। आधुनिक लोकतांत्रिक देशों की सफलता में इस अवधारणा का महत्वपूर्ण योगदान है।
प्रश्न 3. एकात्मक शासन प्रणाली की विशेषताएँ बताइए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
एकात्मक शासन प्रणाली (Unitary System of Government) वह शासन व्यवस्था है जिसमें सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के हाथों में होती हैं। स्थानीय या प्रांतीय सरकारें यदि होती भी हैं, तो वे केंद्रीय सरकार के अधीन कार्य करती हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में एकात्मक शासन प्रणाली अपनाई गई है।
एकात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. शक्तियों का केंद्रीकरण
एकात्मक शासन की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि शासन की सभी महत्वपूर्ण शक्तियाँ केंद्रीय सरकार में निहित होती हैं। स्थानीय सरकारें केंद्र के निर्देशों के अनुसार कार्य करती हैं।
2. एक ही संविधान
इस प्रणाली में पूरे देश के लिए सामान्यतः एक ही संविधान लागू होता है, जिसके अनुसार शासन संचालित होता है।
3. एकल विधायिका
अधिकांश एकात्मक राज्यों में एक ही सर्वोच्च विधायिका होती है, जो पूरे देश के लिए कानून बनाती है।
4. प्रशासन में एकरूपता
देशभर में कानून, नीतियाँ और प्रशासनिक व्यवस्था लगभग समान रहती है। इससे शासन में एकरूपता बनी रहती है।
5. स्थानीय सरकारों पर नियंत्रण
स्थानीय निकाय या प्रांतीय सरकारें स्वतंत्र नहीं होतीं। उनकी शक्तियाँ केंद्रीय सरकार द्वारा निर्धारित की जाती हैं और आवश्यकता पड़ने पर बदली भी जा सकती हैं।
6. त्वरित निर्णय
क्योंकि निर्णय लेने का अधिकार मुख्यतः केंद्र के पास होता है, इसलिए नीतियाँ जल्दी बनाई और लागू की जा सकती हैं।
7. राष्ट्रीय एकता
एकात्मक व्यवस्था पूरे देश में समान कानून और नीतियाँ लागू करके राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करती है।
8. संविधान संशोधन में सरलता
यदि संविधान लचीला हो, तो उसमें संशोधन अपेक्षाकृत सरल होता है क्योंकि राज्यों की अलग-अलग स्वीकृति की आवश्यकता नहीं पड़ती।
एकात्मक शासन प्रणाली के गुण
- शासन सरल और प्रभावी होता है।
- निर्णय शीघ्र लिए जाते हैं।
- प्रशासनिक खर्च कम होता है।
- पूरे देश में समान कानून लागू होते हैं।
- राष्ट्रीय एकता और अखंडता मजबूत होती है।
एकात्मक शासन प्रणाली के दोष
- सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण हो सकता है।
- स्थानीय आवश्यकताओं की अनदेखी होने की संभावना रहती है।
- नागरिकों की स्थानीय स्तर पर भागीदारी कम हो सकती है।
- बड़े और विविधतापूर्ण देशों के लिए यह व्यवस्था हमेशा उपयुक्त नहीं मानी जाती।
उदाहरण
एकात्मक शासन प्रणाली वाले प्रमुख देश हैं—
- ब्रिटेन
- फ्रांस
- जापान
- न्यूज़ीलैंड
- श्रीलंका
निष्कर्ष
एकात्मक शासन प्रणाली में सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं। यह व्यवस्था प्रशासन में एकरूपता, त्वरित निर्णय और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देती है। हालांकि, अत्यधिक केंद्रीकरण और स्थानीय स्वायत्तता की कमी इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं। छोटे और अपेक्षाकृत समान प्रकृति वाले देशों के लिए यह शासन प्रणाली अधिक उपयुक्त मानी जाती है।
प्रश्न 4. अमरीका की न्यायपालिका पर एक संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) की न्यायपालिका विश्व की सबसे स्वतंत्र, शक्तिशाली और प्रभावशाली न्यायिक व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। इसका मुख्य कार्य संविधान की रक्षा करना, कानूनों की व्याख्या करना, नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करना तथा न्याय प्रदान करना है। अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद III (Article III) में न्यायपालिका की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
अमरीका की न्यायपालिका की संरचना
अमेरिका में न्यायपालिका तीन स्तरों में कार्य करती है—
1. सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)
- यह अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय है।
- इसमें 1 मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) तथा 8 अन्य न्यायाधीश होते हैं।
- यह संविधान का अंतिम व्याख्याता (Final Interpreter) है।
- इसके निर्णय पूरे देश में बाध्यकारी होते हैं।
2. अपीलीय न्यायालय (Courts of Appeals)
- ये जिला न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनते हैं।
- इनका मुख्य कार्य यह देखना होता है कि कानून का सही ढंग से पालन हुआ या नहीं।
3. जिला न्यायालय (District Courts)
- ये संघीय स्तर के निचले न्यायालय हैं।
- अधिकांश दीवानी (Civil) और आपराधिक (Criminal) मामलों की सुनवाई सबसे पहले यहीं होती है।
अमरीकी न्यायपालिका की प्रमुख विशेषताएँ
1. स्वतंत्र न्यायपालिका
अमेरिकी न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका से स्वतंत्र है। न्यायाधीश अपने निर्णय बिना किसी राजनीतिक दबाव के देते हैं।
2. न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)
सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून या सरकारी निर्णय को असंवैधानिक (Unconstitutional) घोषित कर सकता है यदि वह संविधान के विरुद्ध हो।
3. संविधान की रक्षा
न्यायपालिका संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखती है और यह सुनिश्चित करती है कि सरकार संविधान के अनुसार कार्य करे।
4. मौलिक अधिकारों की रक्षा
न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करती है।
5. संघीय न्यायिक व्यवस्था
अमेरिका में संघीय (Federal) और राज्य (State) दोनों स्तरों पर न्यायालय कार्य करते हैं, जिससे न्याय व्यवस्था अधिक प्रभावी बनती है।
अमरीकी न्यायपालिका के कार्य
- संविधान की व्याख्या करना।
- कानूनों की वैधता की जाँच करना।
- नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना।
- केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का समाधान करना।
- संघीय मामलों में अंतिम निर्णय देना।
- न्यायिक पुनरावलोकन के माध्यम से संविधान की रक्षा करना।
अमरीकी न्यायपालिका के गुण
- पूर्ण स्वतंत्रता।
- संविधान की प्रभावी रक्षा।
- नागरिक अधिकारों का संरक्षण।
- निष्पक्ष न्याय प्रदान करना।
- सरकार की शक्तियों पर नियंत्रण रखना।
सीमाएँ
- न्यायिक प्रक्रिया कई बार लंबी और महँगी होती है।
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राजनीतिक विवाद का विषय बन सकती है।
- कुछ मामलों में न्यायपालिका पर अत्यधिक शक्तिशाली होने का आरोप लगाया जाता है।
निष्कर्ष
अमेरिका की न्यायपालिका लोकतंत्र की मजबूत आधारशिला है। इसकी स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति तथा संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा करने की भूमिका इसे विश्व की सबसे प्रभावशाली न्यायिक व्यवस्थाओं में स्थान दिलाती है। यही कारण है कि अमेरिकी न्यायपालिका लोकतांत्रिक शासन में संतुलन और न्याय बनाए रखने का महत्वपूर्ण कार्य करती है।
प्रश्न 5. चीन के संविधान की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
चीन का वर्तमान संविधान 4 दिसंबर 1982 को लागू किया गया। यह चीन का चौथा और वर्तमान संविधान है। चीन स्वयं को समाजवादी (Socialist) राज्य मानता है और वहाँ की राजनीतिक व्यवस्था पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party of China - CPC) का प्रमुख प्रभाव है। चीन का संविधान समाजवाद, राष्ट्रीय एकता और आर्थिक विकास पर विशेष बल देता है।
चीन के संविधान की मुख्य विशेषताएँ
1. लिखित संविधान
चीन का संविधान एक लिखित संविधान है, जिसमें शासन की संरचना, सरकार की शक्तियाँ तथा नागरिकों के अधिकार और कर्तव्यों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
2. समाजवादी राज्य
संविधान के अनुसार चीन एक समाजवादी राज्य है, जहाँ समाजवाद के सिद्धांतों के आधार पर शासन चलता है।
3. कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व
चीन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) को देश का प्रमुख राजनीतिक नेतृत्व प्राप्त है। सरकार की नीतियों और निर्णयों में पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
4. एकात्मक शासन व्यवस्था
चीन में एकात्मक (Unitary) शासन प्रणाली है। सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं और प्रांतीय सरकारें केंद्र के अधीन कार्य करती हैं।
5. राष्ट्रीय जन कांग्रेस (National People's Congress)
राष्ट्रीय जन कांग्रेस (NPC) चीन की सर्वोच्च विधायिका है। यह कानून बनाती है, संविधान में संशोधन करती है तथा प्रमुख सरकारी पदों का चुनाव करती है।
6. मौलिक अधिकार और कर्तव्य
संविधान नागरिकों को कुछ अधिकार प्रदान करता है, जैसे—
- समानता का अधिकार
- शिक्षा का अधिकार
- धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता
- कार्य करने का अधिकार
साथ ही नागरिकों के कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है, जैसे संविधान का पालन करना और राष्ट्र की रक्षा करना।
7. समाजवादी अर्थव्यवस्था
संविधान समाजवादी आर्थिक व्यवस्था का समर्थन करता है। वर्तमान समय में चीन ने समाजवादी व्यवस्था के साथ बाज़ार आधारित आर्थिक सुधारों को भी अपनाया है।
8. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान देश का सर्वोच्च कानून है और सभी सरकारी संस्थाओं को इसके अनुसार कार्य करना होता है।
चीन के संविधान के गुण
- शासन की स्पष्ट संरचना प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय एकता और स्थिरता को बढ़ावा देता है।
- आर्थिक विकास के लिए आधार प्रदान करता है।
- नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का उल्लेख करता है।
- प्रशासन में एकरूपता बनाए रखता है।
चीन के संविधान की सीमाएँ
- कम्युनिस्ट पार्टी का अत्यधिक प्रभाव।
- बहुदलीय लोकतंत्र का अभाव।
- न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र नहीं मानी जाती।
- नागरिक स्वतंत्रताओं पर कुछ प्रतिबंध होने की आलोचना की जाती है।
निष्कर्ष
चीन का संविधान समाजवादी विचारधारा, एकात्मक शासन व्यवस्था और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व पर आधारित है। इसने चीन के राजनीतिक और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, एक-दलीय व्यवस्था और सीमित राजनीतिक स्वतंत्रता के कारण इसकी आलोचना भी की जाती है। फिर भी यह चीन की शासन व्यवस्था का मूल आधार है।
प्रश्न 6. रूस की कार्यपालिका पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
रूस (Russian Federation) विश्व का सबसे बड़ा देश है। वर्तमान रूसी संविधान 12 दिसंबर 1993 को लागू हुआ। रूस में अर्ध-राष्ट्रपति (Semi-Presidential) शासन प्रणाली है, जिसमें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों कार्यपालिका का हिस्सा होते हैं। राष्ट्रपति सबसे शक्तिशाली पद माना जाता है, जबकि प्रधानमंत्री सरकार के दैनिक कार्यों का संचालन करता है।
रूस की कार्यपालिका
रूस की कार्यपालिका मुख्य रूप से निम्नलिखित भागों से मिलकर बनी है—
1. राष्ट्रपति (President)
राष्ट्रपति रूस का राष्ट्राध्यक्ष (Head of State) और सबसे शक्तिशाली पदाधिकारी होता है।
उसके प्रमुख कार्य—
- संविधान की रक्षा करना।
- प्रधानमंत्री की नियुक्ति करना।
- मंत्रिपरिषद की नियुक्ति को स्वीकृति देना।
- सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति होना।
- विदेश नीति का नेतृत्व करना।
- आवश्यकता पड़ने पर संसद को भंग करने की शक्ति (संवैधानिक परिस्थितियों में)।
राष्ट्रपति का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान से किया जाता है।
2. प्रधानमंत्री (Prime Minister)
प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख (Head of Government) होता है।
उसके प्रमुख कार्य—
- सरकार के दैनिक प्रशासन का संचालन।
- मंत्रिपरिषद का नेतृत्व।
- आर्थिक एवं प्रशासनिक नीतियों का क्रियान्वयन।
- विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों का समन्वय।
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है तथा संसद के निचले सदन (स्टेट ड्यूमा) की स्वीकृति आवश्यक होती है।
3. मंत्रिपरिषद (Council of Ministers)
मंत्रिपरिषद में विभिन्न मंत्री शामिल होते हैं।
इसके प्रमुख कार्य—
- सरकारी नीतियों को लागू करना।
- प्रशासन चलाना।
- बजट तैयार करना।
- आर्थिक एवं सामाजिक विकास की योजनाओं को लागू करना।
रूस की कार्यपालिका की प्रमुख विशेषताएँ
- अर्ध-राष्ट्रपति शासन प्रणाली।
- राष्ट्रपति के पास व्यापक संवैधानिक शक्तियाँ।
- राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों कार्यपालिका का हिस्सा।
- प्रधानमंत्री सरकार का दैनिक प्रशासन संभालता है।
- मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ मिलकर शासन चलाती है।
- संविधान के अनुसार कार्यपालिका का संचालन किया जाता है।
रूस की कार्यपालिका के गुण
- मजबूत और स्थिर नेतृत्व।
- त्वरित निर्णय लेने की क्षमता।
- राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर प्रभावी नियंत्रण।
- प्रशासनिक समन्वय में सुविधा।
रूस की कार्यपालिका की सीमाएँ
- राष्ट्रपति के पास अत्यधिक शक्तियाँ होने की आलोचना की जाती है।
- कार्यपालिका पर लोकतांत्रिक नियंत्रण अपेक्षाकृत कम माना जाता है।
- राष्ट्रपति और संसद के बीच मतभेद होने पर राजनीतिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।
निष्कर्ष
रूस की कार्यपालिका अर्ध-राष्ट्रपति शासन प्रणाली पर आधारित है, जिसमें राष्ट्रपति सबसे शक्तिशाली पद पर होता है तथा प्रधानमंत्री प्रशासन का संचालन करता है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद मिलकर देश का शासन चलाते हैं। इस व्यवस्था ने रूस में प्रशासनिक स्थिरता प्रदान की है, हालांकि राष्ट्रपति की व्यापक शक्तियों के कारण इसकी आलोचना भी की जाती है।
प्रश्न 7. तुलनात्मक राजनीति के परंपरागत उपागम का वर्णन कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) राजनीति विज्ञान की वह शाखा है जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं, संस्थाओं और शासन प्रणालियों का अध्ययन एवं तुलना की जाती है। प्रारंभिक काल में इसका अध्ययन जिस पद्धति से किया जाता था, उसे परंपरागत उपागम (Traditional Approach) कहा जाता है। यह उपागम मुख्यतः संविधान, सरकार और राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन पर आधारित था।
परंपरागत उपागम का अर्थ
परंपरागत उपागम वह अध्ययन पद्धति है जिसमें संविधान, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा अन्य सरकारी संस्थाओं का औपचारिक (Formal) और कानूनी (Legal) अध्ययन किया जाता है। इसमें यह देखा जाता है कि संविधान के अनुसार शासन कैसे होना चाहिए।
परंपरागत उपागम की प्रमुख विशेषताएँ
1. संस्थागत अध्ययन (Institutional Approach)
इस उपागम में मुख्य रूप से विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और संविधान जैसी संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है।
2. कानूनी दृष्टिकोण (Legal Approach)
संविधान, कानूनों और नियमों के आधार पर राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है।
3. औपचारिक अध्ययन (Formal Study)
यह उपागम केवल संवैधानिक प्रावधानों और सरकारी संरचना पर ध्यान देता है, न कि वास्तविक राजनीतिक व्यवहार पर।
4. वर्णनात्मक प्रकृति (Descriptive Nature)
इसमें राजनीतिक संस्थाओं का वर्णन किया जाता है, उनका वैज्ञानिक विश्लेषण अपेक्षाकृत कम किया जाता है।
5. ऐतिहासिक दृष्टिकोण (Historical Approach)
राजनीतिक संस्थाओं और शासन व्यवस्था के विकास को ऐतिहासिक आधार पर समझाया जाता है।
6. लोकतांत्रिक देशों पर अधिक ध्यान
यह उपागम मुख्य रूप से ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस जैसे पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों के अध्ययन तक सीमित रहा।
परंपरागत उपागम के गुण
- संविधान और राजनीतिक संस्थाओं का स्पष्ट ज्ञान प्रदान करता है।
- शासन व्यवस्था की मूल संरचना को समझने में सहायक है।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास को समझने में उपयोगी है।
- राजनीति विज्ञान के प्रारंभिक विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
परंपरागत उपागम की सीमाएँ
- वास्तविक राजनीतिक व्यवहार की उपेक्षा करता है।
- सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारकों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता।
- वैज्ञानिक एवं अनुभवजन्य (Empirical) अध्ययन का अभाव है।
- विकासशील देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का पर्याप्त अध्ययन नहीं करता।
निष्कर्ष
परंपरागत उपागम ने तुलनात्मक राजनीति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने संविधान और सरकारी संस्थाओं के अध्ययन की मजबूत नींव रखी। हालांकि, वास्तविक राजनीतिक व्यवहार और सामाजिक परिस्थितियों की उपेक्षा के कारण बाद में आधुनिक उपागम (Modern Approach) का विकास हुआ, जिसने तुलनात्मक राजनीति को अधिक वैज्ञानिक और व्यापक बनाया।
प्रश्न 8. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली (Presidential System of Government) वह शासन व्यवस्था है जिसमें राष्ट्रपति ही राष्ट्राध्यक्ष (Head of State) तथा सरकार का प्रमुख (Head of Government) दोनों होता है। इस प्रणाली में राष्ट्रपति जनता द्वारा (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से) निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और वह विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का सबसे प्रमुख उदाहरण है।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ
1. राष्ट्रपति ही वास्तविक कार्यपालिका
इस प्रणाली में राष्ट्रपति सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है। वही प्रशासन का संचालन करता है और सरकारी नीतियों का निर्धारण करता है।
2. निश्चित कार्यकाल
राष्ट्रपति का कार्यकाल निश्चित होता है (जैसे अमेरिका में 4 वर्ष)। उसे केवल संसद का विश्वास खोने पर नहीं हटाया जा सकता। उसे केवल विशेष संवैधानिक प्रक्रिया (महाभियोग) द्वारा ही हटाया जा सकता है।
3. शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं। कोई भी शाखा दूसरी शाखा के कार्यों में सीधे हस्तक्षेप नहीं करती।
4. नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances)
सरकार की तीनों शाखाएँ एक-दूसरे पर नियंत्रण रखती हैं ताकि किसी एक संस्था में अत्यधिक शक्ति केंद्रित न हो।
5. मंत्रिमंडल राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी
मंत्री राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं और वे उसी के प्रति उत्तरदायी होते हैं, न कि संसद के प्रति।
6. विधायिका से स्वतंत्र कार्यपालिका
राष्ट्रपति और उसके मंत्री सामान्यतः विधायिका के सदस्य नहीं होते। दोनों संस्थाएँ अलग-अलग कार्य करती हैं।
7. स्थिर सरकार
राष्ट्रपति का कार्यकाल निश्चित होने के कारण सरकार में बार-बार परिवर्तन नहीं होता और राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है।
8. महाभियोग द्वारा पद से हटाना
यदि राष्ट्रपति संविधान का उल्लंघन करे या गंभीर अपराध करे, तो उसे महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकता है।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण
- स्थिर और मजबूत सरकार।
- त्वरित निर्णय लेने की क्षमता।
- शक्तियों का स्पष्ट विभाजन।
- प्रशासनिक कार्यों में दक्षता।
- राजनीतिक अस्थिरता की संभावना कम।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दोष
- राष्ट्रपति के हाथों में अत्यधिक शक्ति केंद्रित हो सकती है।
- राष्ट्रपति और विधायिका के बीच टकराव की संभावना रहती है।
- राष्ट्रपति को कार्यकाल समाप्त होने से पहले हटाना कठिन होता है।
- निर्णयों में सहयोग और समन्वय की कमी हो सकती है।
उदाहरण
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली वाले प्रमुख देश—
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)
- ब्राज़ील
- मेक्सिको
- अर्जेंटीना
निष्कर्ष
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में राष्ट्रपति शासन का केंद्र होता है। यह प्रणाली शक्तियों के पृथक्करण, निश्चित कार्यकाल और स्थिर सरकार के सिद्धांतों पर आधारित है। यद्यपि इसमें राष्ट्रपति के अत्यधिक शक्तिशाली होने की संभावना रहती है, फिर भी प्रभावी प्रशासन और राजनीतिक स्थिरता के कारण यह विश्व की महत्वपूर्ण शासन प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
June 2025
Section A
प्रश्न 1. परम्परागत तुलनात्मक राजनीति की विशेषताओं और आलोचनाओं का विश्लेषण कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) राजनीति विज्ञान की वह शाखा है जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं, संस्थाओं तथा शासन प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। प्रारंभ में इसका अध्ययन परम्परागत उपागम (Traditional Approach) के आधार पर किया जाता था। यह उपागम मुख्यतः संविधान, सरकार, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी औपचारिक संस्थाओं के अध्ययन पर केंद्रित था। समय के साथ इसकी कुछ सीमाएँ सामने आईं, जिनके कारण आधुनिक उपागम का विकास हुआ।
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति का अर्थ
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति वह अध्ययन पद्धति है जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक संस्थाओं, संविधानों तथा शासन व्यवस्थाओं का कानूनी (Legal), ऐतिहासिक (Historical) तथा संस्थागत (Institutional) आधार पर अध्ययन किया जाता है।
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति की विशेषताएँ
1. संस्थागत अध्ययन (Institutional Approach)
इस उपागम में मुख्य रूप से संविधान, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा अन्य सरकारी संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है।
2. कानूनी दृष्टिकोण (Legal Approach)
राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन संविधान और कानूनों के आधार पर किया जाता है।
3. औपचारिक अध्ययन (Formal Study)
यह उपागम वास्तविक राजनीतिक व्यवहार की अपेक्षा संवैधानिक प्रावधानों और सरकारी संरचना पर अधिक बल देता है।
4. ऐतिहासिक दृष्टिकोण (Historical Approach)
राजनीतिक संस्थाओं और शासन व्यवस्था के विकास को ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर समझाया जाता है।
5. वर्णनात्मक प्रकृति (Descriptive Nature)
इसमें राजनीतिक संस्थाओं और शासन प्रणालियों का वर्णन अधिक किया जाता है, जबकि वैज्ञानिक विश्लेषण अपेक्षाकृत कम होता है।
6. पश्चिमी देशों पर अधिक ध्यान
यह अध्ययन मुख्यतः ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस जैसे विकसित लोकतांत्रिक देशों तक सीमित रहा।
7. आदर्शवादी दृष्टिकोण
यह बताने का प्रयास किया जाता था कि शासन कैसा होना चाहिए, न कि वास्तव में शासन कैसे कार्य करता है।
8. सीमित अध्ययन क्षेत्र
इसमें राजनीतिक दलों, दबाव समूहों, राजनीतिक संस्कृति तथा मतदाताओं के व्यवहार जैसे विषयों को अधिक महत्व नहीं दिया गया।
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति की आलोचनाएँ
1. वास्तविक राजनीतिक व्यवहार की उपेक्षा
यह उपागम केवल संवैधानिक व्यवस्था का अध्ययन करता है, जबकि व्यवहारिक राजनीति की अनदेखी करता है।
2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव
इसमें सर्वेक्षण, आँकड़ों और अनुभवजन्य (Empirical) अनुसंधान का पर्याप्त उपयोग नहीं किया जाता।
3. सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की उपेक्षा
राजनीति को प्रभावित करने वाले सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तत्वों का समुचित अध्ययन नहीं किया गया।
4. विकासशील देशों की उपेक्षा
यह उपागम मुख्यतः यूरोप और अमेरिका तक सीमित रहा। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया।
5. अत्यधिक औपचारिकता
संविधान में जो लिखा है, उसी पर अधिक ध्यान दिया गया, जबकि व्यवहार में क्या हो रहा है, इस पर कम ध्यान दिया गया।
6. सीमित तुलना
तुलना का दायरा बहुत सीमित था और केवल कुछ लोकतांत्रिक देशों तक ही केंद्रित रहा।
7. भविष्यवाणी करने में असमर्थ
यह उपागम राजनीतिक परिवर्तनों और नई परिस्थितियों का सही अनुमान लगाने में सक्षम नहीं था।
परम्परागत उपागम के गुण
- राजनीतिक संस्थाओं की स्पष्ट जानकारी देता है।
- संविधान और शासन व्यवस्था को समझने में सहायक है।
- राजनीति विज्ञान के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं के अध्ययन की मजबूत नींव रखी।
निष्कर्ष
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति ने राजनीति विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने संविधान और राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन की आधारशिला रखी। किंतु इसकी सीमाओं—जैसे वास्तविक राजनीतिक व्यवहार, सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की उपेक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव—के कारण आधुनिक उपागम का विकास हुआ। आज भी परम्परागत उपागम का महत्व बना हुआ है, क्योंकि यह राजनीतिक संस्थाओं को समझने का मूल आधार प्रदान करता है।
प्रश्न 2. संविधान को परिभाषित करें तथा संविधानों के वर्गीकरण की प्रक्रिया पर प्रकाश डालें। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संविधान (Constitution) किसी भी राज्य का सर्वोच्च कानून (Supreme Law) होता है। यह शासन की संरचना, सरकार की शक्तियाँ, नागरिकों के अधिकार तथा राज्य के मूल सिद्धांतों का निर्धारण करता है। प्रत्येक लोकतांत्रिक देश का शासन संविधान के अनुसार चलता है। विभिन्न देशों के संविधान उनकी ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं, इसलिए उनका विभिन्न आधारों पर वर्गीकरण किया जाता है।
संविधान का अर्थ
संविधान वह मूल कानून है जिसके अनुसार किसी देश की शासन व्यवस्था संचालित होती है। इसमें सरकार के विभिन्न अंगों (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) की शक्तियाँ, उनके कार्य तथा नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य निर्धारित किए जाते हैं।
प्रमुख परिभाषाएँ
1. लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce) के अनुसार—
"संविधान उन नियमों का समूह है जो सरकार के स्वरूप और कार्यप्रणाली को निर्धारित करते हैं।"
2. ए. वी. डायसी (A. V. Dicey) के अनुसार—
"संविधान उन सभी नियमों का संग्रह है जो राज्य की सर्वोच्च सत्ता के वितरण और प्रयोग का निर्धारण करते हैं।"
संविधानों का वर्गीकरण (Classification of Constitutions)
संविधानों का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है।
1. लिखित एवं अलिखित संविधान
(क) लिखित संविधान (Written Constitution)
जिस संविधान के सभी नियम और प्रावधान एक लिखित दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से संकलित हों, उसे लिखित संविधान कहते हैं।
विशेषताएँ
- सभी नियम लिखित रूप में होते हैं।
- नागरिकों के अधिकार स्पष्ट होते हैं।
- संशोधन की निश्चित प्रक्रिया होती है।
उदाहरण: भारत, अमेरिका, फ्रांस।
(ख) अलिखित संविधान (Unwritten Constitution)
जिस संविधान के नियम विभिन्न कानूनों, परंपराओं, न्यायालयों के निर्णयों और प्रथाओं पर आधारित हों, उसे अलिखित संविधान कहते हैं।
विशेषताएँ
- एक ही दस्तावेज़ में संकलित नहीं होता।
- परंपराओं और संवैधानिक प्रथाओं पर आधारित होता है।
- समय के साथ विकसित होता है।
उदाहरण: ब्रिटेन।
2. कठोर एवं लचीला संविधान
(क) कठोर संविधान (Rigid Constitution)
जिस संविधान में संशोधन करना कठिन हो और विशेष प्रक्रिया अपनानी पड़े, उसे कठोर संविधान कहते हैं।
विशेषताएँ
- संशोधन के लिए विशेष बहुमत आवश्यक।
- संविधान अधिक स्थिर रहता है।
- मूल सिद्धांतों की रक्षा होती है।
उदाहरण: अमेरिका।
(ख) लचीला संविधान (Flexible Constitution)
जिस संविधान में संशोधन सामान्य कानून की तरह आसानी से किया जा सके, उसे लचीला संविधान कहते हैं।
विशेषताएँ
- संशोधन सरल।
- बदलती परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन संभव।
- शासन अधिक अनुकूलनीय होता है।
उदाहरण: ब्रिटेन।
3. विकसित एवं निर्मित संविधान
(क) विकसित संविधान (Evolved Constitution)
जो संविधान लंबे समय में धीरे-धीरे परंपराओं, प्रथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर विकसित हुआ हो।
उदाहरण: ब्रिटेन।
(ख) निर्मित संविधान (Enacted Constitution)
जो संविधान किसी संविधान सभा या विशेष समिति द्वारा एक निश्चित समय में बनाया गया हो।
उदाहरण: भारत, अमेरिका।
4. संघीय एवं एकात्मक संविधान
(क) संघीय संविधान (Federal Constitution)
जिसमें शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच संविधान द्वारा किया जाता है।
उदाहरण: भारत, अमेरिका, स्विट्ज़रलैण्ड।
(ख) एकात्मक संविधान (Unitary Constitution)
जिसमें सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं।
उदाहरण: ब्रिटेन, फ्रांस, जापान।
संविधान का महत्व
- शासन की स्पष्ट रूपरेखा प्रदान करता है।
- सरकार की शक्तियों को सीमित करता है।
- नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है।
- कानून के शासन (Rule of Law) की स्थापना करता है।
- लोकतंत्र और राजनीतिक स्थिरता को मजबूत बनाता है।
- सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का संतुलन बनाए रखता है।
संविधान के प्रमुख कार्य
- सरकार का गठन करना।
- शासन की शक्तियों का निर्धारण करना।
- नागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्यों का उल्लेख करना।
- न्यायपालिका की व्यवस्था करना।
- संविधान संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित करना।
- राज्य के मूल उद्देश्यों और नीतियों का निर्धारण करना।
निष्कर्ष
संविधान किसी भी राज्य की राजनीतिक व्यवस्था का आधार होता है। यह सरकार को दिशा देता है, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है और शासन को कानून के अनुसार संचालित करता है। विभिन्न देशों की परिस्थितियों के अनुसार संविधान अलग-अलग प्रकार के होते हैं, इसलिए उनका वर्गीकरण लिखित-अलिखित, कठोर-लचीला, विकसित-निर्मित तथा संघीय-एकात्मक जैसे आधारों पर किया जाता है। एक प्रभावी संविधान लोकतांत्रिक शासन की सफलता का महत्वपूर्ण आधार है।
प्रश्न 3. "अमेरिकी राष्ट्रपति का पद बेहद शक्तिशाली है।" कथन का औचित्य समझाते हुए, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया एवं शक्तियों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली (Presidential System) लागू है। यहाँ राष्ट्रपति ही राष्ट्राध्यक्ष (Head of State) तथा सरकार का प्रमुख (Head of Government) दोनों होता है। अमेरिकी राष्ट्रपति के पास व्यापक प्रशासनिक, विधायी, सैन्य और कूटनीतिक शक्तियाँ होती हैं। इसी कारण उसे विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक पदों में से एक माना जाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव
अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष निर्वाचन (Indirect Election) द्वारा किया जाता है।
चुनाव प्रक्रिया
1. उम्मीदवारों का चयन
- प्रमुख राजनीतिक दल (डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन) अपने उम्मीदवार का चयन करते हैं।
- इसके लिए प्राइमरी (Primary) और कॉकस (Caucus) आयोजित किए जाते हैं।
2. चुनाव प्रचार
- उम्मीदवार पूरे देश में चुनाव प्रचार करते हैं।
- जनता से समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
3. इलेक्टोरल कॉलेज (Electoral College)
- अमेरिकी नागरिक सीधे राष्ट्रपति को नहीं चुनते।
- वे निर्वाचकों (Electors) का चुनाव करते हैं।
- यही निर्वाचक राष्ट्रपति के पक्ष में मतदान करते हैं।
4. राष्ट्रपति की घोषणा
- जिस उम्मीदवार को निर्वाचकों के बहुमत का समर्थन मिलता है, वह राष्ट्रपति निर्वाचित घोषित किया जाता है।
5. कार्यकाल
- राष्ट्रपति का कार्यकाल 4 वर्ष का होता है।
- कोई भी व्यक्ति अधिकतम दो बार राष्ट्रपति चुना जा सकता है (22वाँ संविधान संशोधन)।
अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्तियाँ
1. कार्यपालिका संबंधी शक्तियाँ
- राष्ट्रपति सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है।
- मंत्रिमंडल (Cabinet) के सदस्यों की नियुक्ति करता है।
- उच्च अधिकारियों और राजदूतों की नियुक्ति करता है।
- संघीय प्रशासन का संचालन करता है।
2. विधायी शक्तियाँ
- कांग्रेस को संदेश भेज सकता है।
- विधेयकों पर वीटो (Veto) लगा सकता है।
- विशेष परिस्थितियों में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन बुला सकता है।
- सरकार की नीतियों का प्रस्ताव रखता है।
3. सैन्य शक्तियाँ
- राष्ट्रपति अमेरिकी सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति (Commander-in-Chief) होता है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी महत्वपूर्ण निर्णय लेता है।
- युद्धकाल में सेना का नेतृत्व करता है।
4. विदेश नीति संबंधी शक्तियाँ
- विदेश नीति का संचालन करता है।
- अन्य देशों के साथ संधियाँ करता है (सीनेट की स्वीकृति आवश्यक होती है)।
- विदेशी राजदूतों की नियुक्ति करता है।
- अन्य देशों के राजदूतों को स्वीकार करता है।
5. न्यायिक शक्तियाँ
- सर्वोच्च न्यायालय तथा अन्य संघीय न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है (सीनेट की स्वीकृति से)।
- दोषी व्यक्तियों को क्षमादान (Pardon) दे सकता है।
- दंड में कमी या परिवर्तन कर सकता है।
6. आपातकालीन शक्तियाँ
राष्ट्रीय संकट या आपातकाल की स्थिति में राष्ट्रपति त्वरित निर्णय ले सकता है तथा आवश्यक प्रशासनिक कदम उठा सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति को शक्तिशाली क्यों माना जाता है?
- वह राष्ट्राध्यक्ष और सरकार का प्रमुख दोनों होता है।
- प्रशासन पर उसका सीधा नियंत्रण होता है।
- वह सेना का सर्वोच्च सेनापति होता है।
- विदेश नीति का प्रमुख निर्माता होता है।
- उसके पास वीटो की शक्ति होती है।
- उच्च अधिकारियों और न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
- क्षमादान देने की संवैधानिक शक्ति रखता है।
- उसका निश्चित कार्यकाल होता है, इसलिए वह संसद के विश्वास पर निर्भर नहीं रहता।
राष्ट्रपति की शक्तियों पर नियंत्रण
यद्यपि राष्ट्रपति अत्यंत शक्तिशाली होता है, फिर भी उसकी शक्तियों पर कुछ संवैधानिक नियंत्रण हैं—
- कांग्रेस राष्ट्रपति के वीटो को विशेष बहुमत से निरस्त कर सकती है।
- सीनेट कई नियुक्तियों और संधियों को स्वीकृति देती है।
- सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति के आदेशों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
- गंभीर अपराध की स्थिति में राष्ट्रपति पर महाभियोग (Impeachment) चलाया जा सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति के गुण
- मजबूत और स्थिर नेतृत्व।
- त्वरित निर्णय लेने की क्षमता।
- प्रभावी प्रशासन।
- राष्ट्रीय सुरक्षा पर मजबूत नियंत्रण।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली नेतृत्व।
अमेरिकी राष्ट्रपति की सीमाएँ
- कांग्रेस के साथ टकराव की संभावना।
- न्यायपालिका उसके निर्णयों की समीक्षा कर सकती है।
- कई नियुक्तियों के लिए सीनेट की स्वीकृति आवश्यक होती है।
- महाभियोग द्वारा पद से हटाया जा सकता है।
निष्कर्ष
अमेरिकी राष्ट्रपति विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक पदों में से एक है। उसे प्रशासनिक, सैन्य, विधायी, न्यायिक तथा विदेश नीति से संबंधित व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हैं। फिर भी अमेरिकी संविधान की Checks and Balances (नियंत्रण एवं संतुलन) व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न कर सके। यही कारण है कि अमेरिकी शासन प्रणाली में शक्ति और उत्तरदायित्व दोनों का संतुलन बना रहता है।
प्रश्न 4. एकात्मक शासन प्रणाली को परिभाषित कीजिए तथा इसके गुण-दोषों पर प्रकाश डालिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
विश्व में विभिन्न प्रकार की शासन प्रणालियाँ प्रचलित हैं, जिनमें एकात्मक शासन प्रणाली (Unitary System of Government) एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है। इस प्रणाली में राज्य की सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार में निहित होती हैं। स्थानीय या प्रांतीय सरकारें यदि होती भी हैं, तो वे केंद्रीय सरकार के अधीन कार्य करती हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और न्यूज़ीलैंड जैसे देश एकात्मक शासन प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं।
एकात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
एकात्मक शासन प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें पूरे देश के शासन का मुख्य अधिकार केवल केंद्रीय सरकार के पास होता है। स्थानीय सरकारों की शक्तियाँ संविधान से नहीं, बल्कि केंद्रीय सरकार से प्राप्त होती हैं। केंद्र आवश्यकता पड़ने पर इन शक्तियों में परिवर्तन भी कर सकता है।
विद्वानों की परिभाषा
गार्नर (Garner) के अनुसार—
"एकात्मक शासन वह व्यवस्था है जिसमें राज्य की सर्वोच्च सत्ता एक ही केंद्रीय सरकार में निहित होती है।"
एकात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. शक्तियों का केंद्रीकरण
सभी महत्वपूर्ण शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं।
2. एक ही संविधान
पूरे देश में एक ही संविधान लागू होता है और उसी के अनुसार शासन चलता है।
3. एकल विधायिका
सामान्यतः एक ही सर्वोच्च विधायिका पूरे देश के लिए कानून बनाती है।
4. प्रशासन में एकरूपता
देशभर में समान कानून और प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है।
5. स्थानीय सरकारें केंद्र के अधीन
स्थानीय निकाय या प्रांतीय सरकारें स्वतंत्र नहीं होतीं, बल्कि केंद्र के नियंत्रण में कार्य करती हैं।
6. त्वरित निर्णय
निर्णय लेने की प्रक्रिया सरल होती है क्योंकि अंतिम अधिकार केंद्र के पास होता है।
7. राष्ट्रीय एकता
समान कानून और नीतियों के कारण राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा मिलता है।
एकात्मक शासन प्रणाली के गुण
1. मजबूत और प्रभावी सरकार
सभी शक्तियाँ केंद्र में होने के कारण सरकार प्रभावी ढंग से कार्य करती है।
2. त्वरित निर्णय
केंद्र को राज्यों से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए निर्णय शीघ्र लिए जाते हैं।
3. कम प्रशासनिक खर्च
एक ही स्तर की प्रमुख सरकार होने से प्रशासनिक खर्च कम होता है।
4. राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा
पूरे देश में समान कानून लागू होने से एकता मजबूत होती है।
5. संकट के समय प्रभावी शासन
युद्ध, महामारी या प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में केंद्र शीघ्र निर्णय लेकर पूरे देश में लागू कर सकता है।
6. सरल प्रशासन
शासन व्यवस्था अपेक्षाकृत सरल होती है और अधिकारों को लेकर भ्रम कम रहता है।
एकात्मक शासन प्रणाली के दोष
1. अत्यधिक केंद्रीकरण
सभी शक्तियाँ केंद्र में होने से सत्ता का दुरुपयोग हो सकता है।
2. स्थानीय आवश्यकताओं की उपेक्षा
केंद्र सभी क्षेत्रों की स्थानीय समस्याओं को समान रूप से नहीं समझ सकता।
3. स्थानीय स्वायत्तता का अभाव
स्थानीय सरकारों को स्वतंत्र निर्णय लेने का अवसर कम मिलता है।
4. बड़े देशों के लिए कम उपयुक्त
अत्यधिक विशाल और विविधता वाले देशों में यह प्रणाली प्रभावी नहीं मानी जाती।
5. लोकतांत्रिक भागीदारी में कमी
स्थानीय स्तर पर जनता की भागीदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
एकात्मक शासन प्रणाली के उदाहरण
- ब्रिटेन
- फ्रांस
- जापान
- न्यूज़ीलैंड
- श्रीलंका
एकात्मक एवं संघीय शासन में अंतर
| एकात्मक शासन | संघीय शासन |
|---|---|
| सभी शक्तियाँ केंद्र में होती हैं। | शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच होता है। |
| स्थानीय सरकारें केंद्र के अधीन होती हैं। | राज्य सरकारों को संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते हैं। |
| प्रशासन अधिक केंद्रीकृत होता है। | प्रशासन विकेंद्रीकृत होता है। |
| छोटे देशों के लिए अधिक उपयुक्त। | बड़े और विविध देशों के लिए अधिक उपयुक्त। |
निष्कर्ष
एकात्मक शासन प्रणाली में केंद्रीय सरकार सबसे शक्तिशाली होती है और पूरे देश की शासन व्यवस्था का संचालन करती है। यह प्रणाली प्रशासन में एकरूपता, त्वरित निर्णय और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देती है। हालांकि, स्थानीय स्वायत्तता की कमी और अत्यधिक केंद्रीकरण इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं। इसलिए यह व्यवस्था विशेष रूप से छोटे और अपेक्षाकृत समान प्रकृति वाले देशों के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती है।
प्रश्न 5. संघीय शासन प्रणाली से आप क्या समझते हैं? इसके गुण और दोषों की विस्तृत चर्चा करें। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
विश्व के अनेक बड़े और विविधतापूर्ण देशों में संघीय शासन प्रणाली (Federal System of Government) अपनाई गई है। इस व्यवस्था में शासन की शक्तियाँ केंद्रीय सरकार (Union/Central Government) तथा राज्य सरकारों (State Governments) के बीच संविधान द्वारा विभाजित होती हैं। दोनों सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं। भारत, अमेरिका, स्विट्ज़रलैण्ड, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया संघीय शासन प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं।
संघीय शासन प्रणाली का अर्थ
संघीय शासन प्रणाली वह शासन व्यवस्था है जिसमें दो स्तरों की सरकारें होती हैं—केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारें। दोनों की शक्तियाँ संविधान द्वारा निर्धारित होती हैं तथा कोई भी सरकार दूसरी सरकार के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
विद्वान की परिभाषा
गार्नर (Garner) के अनुसार—
"संघीय शासन वह व्यवस्था है जिसमें केंद्रीय और राज्य सरकारें संविधान द्वारा निर्धारित शक्तियों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करती हैं।"
संघीय शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. दोहरी शासन व्यवस्था (Dual Government)
इस प्रणाली में दो स्तरों की सरकारें होती हैं—
- केंद्रीय सरकार
- राज्य सरकार
दोनों अपने-अपने कार्यक्षेत्र में कार्य करती हैं।
2. शक्तियों का विभाजन
संविधान के अनुसार केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है।
उदाहरण (भारत)—
- संघ सूची
- राज्य सूची
- समवर्ती सूची
3. लिखित संविधान
संघीय व्यवस्था में सामान्यतः लिखित संविधान होता है ताकि शक्तियों का स्पष्ट उल्लेख किया जा सके।
4. कठोर संविधान
संविधान में संशोधन के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिससे केंद्र और राज्यों के अधिकार सुरक्षित रहें।
5. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है। केंद्र और राज्य दोनों उसी के अनुसार कार्य करते हैं।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
सर्वोच्च न्यायालय संविधान की रक्षा करता है तथा केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का समाधान करता है।
7. द्विसदनीय विधायिका
अधिकांश संघीय देशों में संसद के दो सदन होते हैं—
- निचला सदन – जनता का प्रतिनिधित्व करता है।
- ऊपरी सदन – राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है।
संघीय शासन प्रणाली के गुण
1. स्थानीय स्वायत्तता
राज्य सरकारें स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय ले सकती हैं।
2. लोकतंत्र को बढ़ावा
जनता को राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर शासन में भाग लेने का अवसर मिलता है।
3. प्रशासनिक सुविधा
बड़े देशों का प्रशासन अधिक प्रभावी और व्यवस्थित ढंग से किया जा सकता है।
4. सत्ता का विकेंद्रीकरण
सभी शक्तियाँ केंद्र में केंद्रित नहीं होतीं, जिससे निरंकुशता की संभावना कम होती है।
5. राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय हितों में संतुलन
संघीय व्यवस्था राष्ट्रीय एकता बनाए रखते हुए राज्यों के हितों की भी रक्षा करती है।
6. विविधता का सम्मान
भाषा, संस्कृति, धर्म और क्षेत्रीय पहचान वाले देशों में यह व्यवस्था अधिक उपयुक्त होती है।
संघीय शासन प्रणाली के दोष
1. केंद्र और राज्यों के बीच विवाद
अधिकारों के विभाजन को लेकर मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं।
2. निर्णय लेने में विलंब
कई मामलों में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय के कारण निर्णय लेने में अधिक समय लगता है।
3. प्रशासनिक खर्च अधिक
दो स्तर की सरकारों के कारण प्रशासनिक व्यय बढ़ जाता है।
4. कानूनों में असमानता
विभिन्न राज्यों में अलग-अलग कानून होने से प्रशासनिक अंतर दिखाई दे सकता है।
5. राष्ट्रीय नीतियों के क्रियान्वयन में कठिनाई
कुछ मामलों में राज्य सरकारों का सहयोग न मिलने से राष्ट्रीय योजनाओं को लागू करने में कठिनाई हो सकती है।
संघीय शासन प्रणाली के उदाहरण
- भारत
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)
- स्विट्ज़रलैण्ड
- कनाडा
- ऑस्ट्रेलिया
संघीय एवं एकात्मक शासन प्रणाली में अंतर
| संघीय शासन | एकात्मक शासन |
|---|---|
| शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच होता है। | सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्र के पास होती हैं। |
| दो स्तर की सरकारें होती हैं। | एक प्रमुख केंद्रीय सरकार होती है। |
| संविधान सामान्यतः लिखित एवं कठोर होता है। | संविधान लिखित या अलिखित तथा लचीला भी हो सकता है। |
| राज्यों को संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते हैं। | स्थानीय सरकारें केंद्र के अधीन होती हैं। |
निष्कर्ष
संघीय शासन प्रणाली बड़े और विविधतापूर्ण देशों के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। यह राष्ट्रीय एकता बनाए रखते हुए राज्यों को पर्याप्त स्वायत्तता प्रदान करती है। यद्यपि केंद्र और राज्यों के बीच विवाद तथा प्रशासनिक जटिलताएँ इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी लोकतंत्र, विकेंद्रीकरण और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के कारण यह विश्व की सबसे सफल शासन व्यवस्थाओं में से एक है।
Section B
प्रश्न 1. संसदात्मक शासन प्रणाली की विशेषताओं की चर्चा कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संसदात्मक शासन प्रणाली (Parliamentary System) वह शासन व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका (Executive) विधायिका (Legislature) से निकलती है और उसके प्रति उत्तरदायी होती है। इस प्रणाली में वास्तविक शासन प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद द्वारा चलाया जाता है, जबकि राष्ट्रपति या राजा केवल संवैधानिक प्रमुख होता है। भारत और ब्रिटेन इस शासन प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं।
संसदात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. नाममात्र एवं वास्तविक कार्यपालिका
इस प्रणाली में दो प्रकार की कार्यपालिका होती है—
- नाममात्र कार्यपालिका – राष्ट्रपति या राजा
- वास्तविक कार्यपालिका – प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद
वास्तविक शासन प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद द्वारा संचालित किया जाता है।
2. कार्यपालिका और विधायिका का घनिष्ठ संबंध
प्रधानमंत्री तथा मंत्री सामान्यतः संसद के सदस्य होते हैं। इसलिए कार्यपालिका और विधायिका के बीच घनिष्ठ संबंध रहता है।
3. सामूहिक उत्तरदायित्व
मंत्रिपरिषद संसद के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। यदि संसद अविश्वास प्रस्ताव पारित कर देती है, तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है।
4. प्रधानमंत्री का नेतृत्व
प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है। वह मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करता है तथा सरकारी नीतियों का निर्धारण करता है।
5. बहुमत का सिद्धांत
संसद में जिस राजनीतिक दल या गठबंधन को बहुमत प्राप्त होता है, वही सरकार बनाता है।
6. विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका
विपक्ष सरकार की नीतियों की समीक्षा करता है तथा लोकतंत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
7. लचीली सरकार
यदि सरकार जनता या संसद का विश्वास खो देती है, तो उसे बदला जा सकता है। इससे शासन व्यवस्था में लचीलापन बना रहता है।
8. लोकतांत्रिक शासन
सरकार जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से संचालित होती है, जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है।
संसदात्मक शासन प्रणाली के गुण
- उत्तरदायी सरकार।
- लोकतांत्रिक शासन।
- संसद द्वारा सरकार पर नियंत्रण।
- शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन।
- जनता के प्रति जवाबदेही।
संसदात्मक शासन प्रणाली के दोष
- राजनीतिक अस्थिरता की संभावना।
- गठबंधन सरकारों में निर्णय लेने में कठिनाई।
- दलीय राजनीति का अधिक प्रभाव।
- प्रधानमंत्री पर अत्यधिक निर्भरता।
उदाहरण
- भारत
- ब्रिटेन
- कनाडा
- ऑस्ट्रेलिया
- जापान
निष्कर्ष
संसदात्मक शासन प्रणाली लोकतंत्र, उत्तरदायित्व और जनप्रतिनिधित्व पर आधारित शासन व्यवस्था है। इसमें सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी रहती है तथा जनता के हितों के अनुसार कार्य करती है। यद्यपि इसमें राजनीतिक अस्थिरता जैसी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी यह विश्व की सबसे सफल लोकतांत्रिक शासन प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
प्रश्न 2. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण और दोषों पर एक निबंध लिखिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली (Presidential System of Government) वह शासन व्यवस्था है जिसमें राष्ट्रपति ही राष्ट्राध्यक्ष (Head of State) और सरकार का प्रमुख (Head of Government) दोनों होता है। राष्ट्रपति जनता द्वारा (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से) निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है तथा वह विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) इस प्रणाली का सबसे प्रमुख उदाहरण है।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का संक्षिप्त परिचय
इस प्रणाली में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अलग-अलग कार्य करती हैं। राष्ट्रपति अपने मंत्रिमंडल का गठन करता है तथा शासन का संचालन करता है। उसका कार्यकाल निश्चित होता है और उसे केवल महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता है।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण
1. स्थिर सरकार
राष्ट्रपति का कार्यकाल निश्चित होने के कारण सरकार बार-बार नहीं बदलती, जिससे राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है।
2. मजबूत नेतृत्व
राष्ट्रपति के पास व्यापक प्रशासनिक शक्तियाँ होती हैं, जिससे वह प्रभावी नेतृत्व प्रदान करता है।
3. त्वरित निर्णय
आपातकाल या संकट की स्थिति में राष्ट्रपति शीघ्र निर्णय लेकर उन्हें लागू कर सकता है।
4. शक्तियों का पृथक्करण
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट शक्तियों का विभाजन होने से शासन अधिक संतुलित रहता है।
5. प्रशासनिक दक्षता
राष्ट्रपति अपने मंत्रियों का चयन योग्यता के आधार पर कर सकता है, जिससे प्रशासन अधिक प्रभावी बनता है।
6. राष्ट्रीय हितों की रक्षा
राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रभावी निर्णय ले सकता है।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दोष
1. शक्ति का केंद्रीकरण
राष्ट्रपति के पास अधिक शक्तियाँ होने से निरंकुशता की संभावना बढ़ सकती है।
2. विधायिका से टकराव
राष्ट्रपति और संसद के बीच मतभेद होने पर महत्वपूर्ण निर्णयों में बाधा आ सकती है।
3. उत्तरदायित्व का अभाव
राष्ट्रपति संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होता, इसलिए उस पर प्रत्यक्ष संसदीय नियंत्रण कम होता है।
4. महाभियोग की कठिन प्रक्रिया
यदि राष्ट्रपति अयोग्य सिद्ध हो जाए, तब भी उसे हटाना कठिन होता है क्योंकि महाभियोग की प्रक्रिया जटिल होती है।
5. निर्णयों में सहयोग की कमी
कार्यपालिका और विधायिका अलग-अलग होने के कारण कई बार समन्वय की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के उदाहरण
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)
- ब्राज़ील
- मेक्सिको
- अर्जेंटीना
निष्कर्ष
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली स्थिर, प्रभावी और मजबूत नेतृत्व प्रदान करती है। शक्तियों का पृथक्करण तथा निश्चित कार्यकाल इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। यद्यपि शक्ति के केंद्रीकरण और राष्ट्रपति-विधायिका के बीच टकराव जैसी कुछ कमियाँ हैं, फिर भी यह प्रणाली प्रभावी प्रशासन और राजनीतिक स्थिरता के कारण विश्व के अनेक देशों में सफलतापूर्वक कार्य कर रही है।
प्रश्न 3. चीन के संविधान की विशेषताओं की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
चीन का वर्तमान संविधान 4 दिसंबर 1982 को लागू हुआ। यह चीन का चौथा और वर्तमान संविधान है। चीन स्वयं को समाजवादी राज्य (Socialist State) मानता है तथा उसकी राजनीतिक व्यवस्था में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party of China - CPC) की प्रमुख भूमिका है। चीन का संविधान शासन की संरचना, नागरिकों के अधिकार एवं कर्तव्यों तथा राज्य की नीतियों का आधार है। इसकी कई विशेषताएँ हैं, लेकिन कुछ कारणों से इसकी आलोचना भी की जाती है।
चीन के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. लिखित संविधान
चीन का संविधान लिखित रूप में है, जिसमें शासन व्यवस्था, नागरिकों के अधिकार एवं सरकार की शक्तियों का स्पष्ट वर्णन किया गया है।
2. समाजवादी राज्य
संविधान के अनुसार चीन एक समाजवादी राज्य है और उसका उद्देश्य समाजवादी व्यवस्था को मजबूत करना है।
3. कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) को देश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति माना गया है और शासन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
4. एकात्मक शासन व्यवस्था
चीन में एकात्मक (Unitary) शासन प्रणाली है। सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं।
5. राष्ट्रीय जन कांग्रेस (NPC)
राष्ट्रीय जन कांग्रेस (National People's Congress) चीन की सर्वोच्च विधायिका है। यह कानून बनाती है और संविधान में संशोधन करती है।
6. नागरिकों के अधिकार एवं कर्तव्य
संविधान नागरिकों को समानता, शिक्षा, धार्मिक आस्था और कार्य करने जैसे अधिकार प्रदान करता है तथा उनके कर्तव्यों का भी उल्लेख करता है।
चीन के संविधान की आलोचनात्मक समीक्षा
1. एक-दलीय व्यवस्था
चीन में केवल कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव है। बहुदलीय लोकतंत्र का अभाव होने के कारण राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सीमित मानी जाती है।
2. सीमित राजनीतिक स्वतंत्रता
संविधान में अधिकारों का उल्लेख है, लेकिन व्यवहार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक गतिविधियों पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध होने की आलोचना की जाती है।
3. न्यायपालिका की स्वतंत्रता
आलोचकों का मानना है कि चीन की न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है और उस पर राजनीतिक प्रभाव देखा जा सकता है।
4. शक्तियों का केंद्रीकरण
केंद्रीय सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी के पास अधिक शक्तियाँ होने के कारण सत्ता का केंद्रीकरण दिखाई देता है।
5. सकारात्मक पक्ष
इन आलोचनाओं के बावजूद चीन के संविधान ने—
- राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने,
- आर्थिक विकास को बढ़ावा देने,
- राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने,
- प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने
में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
निष्कर्ष
चीन का संविधान समाजवादी विचारधारा, एकात्मक शासन और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व पर आधारित है। इसने देश के विकास और प्रशासनिक स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, एक-दलीय व्यवस्था, सीमित राजनीतिक स्वतंत्रता तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों के कारण इसकी आलोचना भी होती है। इसलिए चीन के संविधान को समझने के लिए उसके सकारात्मक पक्षों और सीमाओं दोनों का संतुलित अध्ययन आवश्यक है।
प्रश्न 4. संयुक्त राज्य अमेरिका की विधायी शाखा 'कांग्रेस' के कार्यों और शक्तियों पर टिप्पणी कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में कांग्रेस (Congress) देश की विधायिका (Legislature) है। इसका मुख्य कार्य कानून बनाना, सरकार के कार्यों पर नियंत्रण रखना तथा राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण में भाग लेना है। अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद I (Article I) में कांग्रेस का उल्लेख किया गया है। यह विश्व की सबसे शक्तिशाली विधायिकाओं में से एक मानी जाती है।
कांग्रेस की संरचना
अमेरिकी कांग्रेस द्विसदनीय (Bicameral) है। इसके दो सदन हैं—
1. सीनेट (Senate)
- यह उच्च सदन (Upper House) है।
- प्रत्येक राज्य से 2 सदस्य चुने जाते हैं।
- कुल 100 सदस्य होते हैं।
- सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है।
2. प्रतिनिधि सभा (House of Representatives)
- यह निम्न सदन (Lower House) है।
- सदस्यों की संख्या राज्यों की जनसंख्या के आधार पर निर्धारित होती है।
- वर्तमान में इसमें 435 सदस्य हैं।
- सदस्यों का कार्यकाल 2 वर्ष होता है।
कांग्रेस के प्रमुख कार्य एवं शक्तियाँ
1. कानून निर्माण (Law Making)
कांग्रेस का सबसे महत्वपूर्ण कार्य पूरे देश के लिए कानून बनाना, उनमें संशोधन करना तथा आवश्यक होने पर उन्हें समाप्त करना है।
2. वित्तीय शक्तियाँ
- राष्ट्रीय बजट को स्वीकृति देना।
- कर (Taxes) लगाना।
- सरकारी खर्चों को मंजूरी देना।
- सार्वजनिक धन के उपयोग पर नियंत्रण रखना।
3. राष्ट्रपति पर नियंत्रण
कांग्रेस राष्ट्रपति के कार्यों पर नियंत्रण रखती है।
- राष्ट्रपति के वीटो को विशेष बहुमत से निरस्त कर सकती है।
- राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया चला सकती है।
4. नियुक्तियों की स्वीकृति
सीनेट राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त—
- न्यायाधीशों,
- राजदूतों,
- उच्च अधिकारियों
की नियुक्ति को स्वीकृति देती है।
5. संधियों की स्वीकृति
राष्ट्रपति द्वारा किए गए अंतरराष्ट्रीय समझौतों (Treaties) को प्रभावी बनाने के लिए सीनेट की स्वीकृति आवश्यक होती है।
6. युद्ध संबंधी शक्तियाँ
संविधान के अनुसार युद्ध की घोषणा (Declaration of War) करने का अधिकार कांग्रेस के पास है।
7. जाँच एवं निगरानी
कांग्रेस विभिन्न समितियों के माध्यम से सरकारी विभागों और नीतियों की जाँच करती है तथा सरकार को उत्तरदायी बनाती है।
कांग्रेस का महत्व
- लोकतंत्र की रक्षा करती है।
- राष्ट्रपति की शक्तियों पर नियंत्रण रखती है।
- जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
- संविधान की भावना के अनुसार कानून बनाती है।
- शासन में संतुलन और उत्तरदायित्व बनाए रखती है।
सीमाएँ
- राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच मतभेद होने पर निर्णय लेने में देरी हो सकती है।
- राजनीतिक दलों के बीच टकराव से कानून बनाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
- कुछ मामलों में निर्णय लेने की प्रक्रिया लंबी और जटिल हो जाती है।
निष्कर्ष
अमेरिकी कांग्रेस देश की सर्वोच्च विधायिका है। कानून निर्माण, वित्तीय नियंत्रण, राष्ट्रपति की शक्तियों पर नियंत्रण तथा राष्ट्रीय नीतियों के निर्धारण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। Checks and Balances (नियंत्रण एवं संतुलन) की व्यवस्था के कारण कांग्रेस अमेरिकी लोकतंत्र की एक मजबूत और प्रभावशाली संस्था मानी जाती है।
प्रश्न 5. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के कार्यों और शक्तियों पर टिप्पणी कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
ब्रिटेन में संसदात्मक शासन प्रणाली (Parliamentary System) लागू है। इस प्रणाली में प्रधानमंत्री (Prime Minister) सरकार का वास्तविक प्रमुख (Real Executive) होता है, जबकि राजा या रानी केवल संवैधानिक प्रमुख (Nominal Head) होते हैं। प्रधानमंत्री देश की शासन व्यवस्था का संचालन करता है और मंत्रिमंडल का नेतृत्व करता है। इसलिए उसे ब्रिटिश शासन व्यवस्था का "केंद्रबिंदु" कहा जाता है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ
1. सरकार का प्रमुख
प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है। वह शासन का संचालन करता है तथा राष्ट्रीय नीतियों का निर्धारण करता है।
2. मंत्रिमंडल का गठन
प्रधानमंत्री मंत्रियों का चयन करता है और राजा/रानी को उनकी नियुक्ति की सलाह देता है। वह आवश्यकता पड़ने पर किसी मंत्री से इस्तीफ़ा भी माँग सकता है।
3. मंत्रिमंडल का नेतृत्व
प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा विभिन्न विभागों के कार्यों में समन्वय स्थापित करता है।
4. संसद का नेतृत्व
प्रधानमंत्री संसद में सरकार का प्रमुख प्रतिनिधि होता है। वह सरकारी नीतियों का समर्थन करता है तथा महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में प्रमुख भूमिका निभाता है।
5. नीतियों का निर्माण
देश की आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक और विदेश नीति के निर्माण में प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
6. विदेश नीति में भूमिका
प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में देश का प्रतिनिधित्व करता है तथा अन्य देशों के साथ संबंधों को मजबूत बनाने का कार्य करता है।
7. राजनीतिक दल का नेतृत्व
प्रधानमंत्री सामान्यतः संसद में बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है और अपने दल की नीतियों एवं कार्यक्रमों का नेतृत्व करता है।
8. राजा/रानी का मुख्य सलाहकार
प्रधानमंत्री राजा या रानी को शासन से संबंधित महत्वपूर्ण विषयों पर सलाह देता है। व्यवहार में अधिकांश संवैधानिक कार्य प्रधानमंत्री की सलाह पर ही किए जाते हैं।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का महत्व
- सरकार का वास्तविक प्रमुख।
- मंत्रिमंडल का नेता।
- संसद और कार्यपालिका के बीच समन्वय स्थापित करता है।
- राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नेतृत्व करता है।
- सरकार की सफलता या असफलता का मुख्य उत्तरदायी होता है।
सीमाएँ
- प्रधानमंत्री संसद के प्रति उत्तरदायी होता है।
- बहुमत खोने पर उसे पद छोड़ना पड़ सकता है।
- विपक्ष और मीडिया उसके कार्यों की निरंतर समीक्षा करते हैं।
- दलीय अनुशासन और जनमत का भी उस पर प्रभाव रहता है।
निष्कर्ष
ब्रिटेन का प्रधानमंत्री देश की शासन व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पदाधिकारी है। वह मंत्रिमंडल, संसद और प्रशासन का नेतृत्व करता है तथा देश की नीतियों का निर्धारण करता है। यद्यपि वह अत्यंत शक्तिशाली होता है, फिर भी संसद, विपक्ष और लोकतांत्रिक परंपराओं के कारण उसकी शक्तियाँ नियंत्रित रहती हैं।
प्रश्न 6. संघात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संघात्मक शासन प्रणाली (Federal System of Government) वह शासन व्यवस्था है जिसमें केंद्रीय सरकार (Central Government) और राज्य सरकारों (State Governments) के बीच शक्तियों का विभाजन संविधान द्वारा किया जाता है। दोनों सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं। भारत, अमेरिका, स्विट्ज़रलैण्ड, कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया संघात्मक शासन प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं।
संघात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. दोहरी शासन व्यवस्था (Dual Government)
इस प्रणाली में दो स्तरों की सरकार होती हैं—
- केंद्रीय सरकार
- राज्य सरकार
दोनों अपने-अपने क्षेत्र में कार्य करती हैं।
2. शक्तियों का विभाजन
संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन करता है। इससे दोनों सरकारों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
3. लिखित संविधान
संघात्मक शासन में सामान्यतः लिखित संविधान होता है, जिससे सरकारों की शक्तियाँ स्पष्ट रूप से निर्धारित रहती हैं।
4. कठोर संविधान
संविधान में संशोधन के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है। इससे केंद्र और राज्यों के अधिकारों की रक्षा होती है।
5. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है। केंद्र और राज्य दोनों को संविधान के अनुसार कार्य करना पड़ता है।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
सर्वोच्च न्यायालय संविधान की रक्षा करता है तथा केंद्र और राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों का समाधान करता है।
7. द्विसदनीय विधायिका
अधिकांश संघीय देशों में संसद के दो सदन होते हैं—
- निचला सदन (जनता का प्रतिनिधित्व)
- ऊपरी सदन (राज्यों का प्रतिनिधित्व)
8. विकेंद्रीकरण
शासन की शक्तियाँ केवल केंद्र तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि राज्यों को भी पर्याप्त अधिकार प्राप्त होते हैं। इससे स्थानीय समस्याओं का समाधान प्रभावी ढंग से होता है।
संघात्मक शासन प्रणाली के लाभ
- राष्ट्रीय और राज्य हितों में संतुलन बना रहता है।
- स्थानीय स्वायत्तता को बढ़ावा मिलता है।
- लोकतंत्र मजबूत होता है।
- प्रशासन अधिक प्रभावी बनता है।
- विविधता वाले देशों के लिए उपयुक्त व्यवस्था है।
निष्कर्ष
संघात्मक शासन प्रणाली बड़े और विविधतापूर्ण देशों के लिए अत्यंत उपयोगी मानी जाती है। इसमें केंद्र और राज्य दोनों को संविधान द्वारा निर्धारित अधिकार प्राप्त होते हैं। इससे राष्ट्रीय एकता बनी रहती है और स्थानीय आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाता है। यही कारण है कि भारत, अमेरिका और स्विट्ज़रलैण्ड जैसे देशों ने इस प्रणाली को सफलतापूर्वक अपनाया है।
प्रश्न 7. ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स के गठन और शक्तियों पर एक निबंध लिखिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
हाउस ऑफ लॉर्ड्स (House of Lords) ब्रिटेन की संसद का उच्च सदन (Upper House) है। ब्रिटेन की संसद दो सदनों से मिलकर बनी है—
- हाउस ऑफ कॉमन्स (House of Commons) – निम्न सदन
- हाउस ऑफ लॉर्ड्स (House of Lords) – उच्च सदन
हाउस ऑफ लॉर्ड्स विश्व की सबसे पुरानी संसदीय संस्थाओं में से एक है। वर्तमान समय में इसकी भूमिका मुख्यतः कानूनों की समीक्षा, संशोधन और सरकार को सुझाव देने की है।
हाउस ऑफ लॉर्ड्स का गठन
हाउस ऑफ लॉर्ड्स के अधिकांश सदस्य निर्वाचित नहीं होते, बल्कि नियुक्त किए जाते हैं। इसके प्रमुख प्रकार के सदस्य निम्नलिखित हैं—
1. लाइफ़ पीयर्स (Life Peers)
- इनकी नियुक्ति सम्राट (King/Queen) द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है।
- इनका पद जीवनभर के लिए होता है।
- वर्तमान समय में अधिकांश सदस्य इसी श्रेणी के हैं।
2. बिशप (Lords Spiritual)
- इंग्लैंड के चर्च (Church of England) के वरिष्ठ बिशप इस सदन के सदस्य होते हैं।
- ये धार्मिक मामलों में अपने विचार रखते हैं।
3. वंशानुगत सदस्य (Hereditary Peers)
- पहले इनकी संख्या अधिक थी।
- House of Lords Act, 1999 के बाद अधिकांश वंशानुगत सदस्यों का अधिकार समाप्त कर दिया गया।
- वर्तमान में केवल सीमित संख्या में ऐसे सदस्य हैं।
हाउस ऑफ लॉर्ड्स की शक्तियाँ एवं कार्य
1. विधायी कार्य
- संसद द्वारा पारित विधेयकों की समीक्षा करता है।
- आवश्यक संशोधन (Amendments) सुझा सकता है।
- विधेयकों पर पुनर्विचार के लिए उन्हें हाउस ऑफ कॉमन्स को वापस भेज सकता है।
2. विचार-विमर्श का मंच
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के विषयों पर गंभीर चर्चा और बहस करता है।
3. सरकार को सुझाव
सरकार की नीतियों की समीक्षा करता है और सुधार के लिए सुझाव देता है।
4. विशेषज्ञों का योगदान
इस सदन में कानून, शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, सेना तथा अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञ सदस्य होते हैं, जो कानून निर्माण में अपना अनुभव प्रदान करते हैं।
5. न्यायिक भूमिका (ऐतिहासिक)
पहले हाउस ऑफ लॉर्ड्स ब्रिटेन का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय भी था, लेकिन 2009 में यूनाइटेड किंगडम के सर्वोच्च न्यायालय (UK Supreme Court) की स्थापना के बाद यह न्यायिक कार्य समाप्त हो गया।
हाउस ऑफ लॉर्ड्स की सीमाएँ
- यह जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित नहीं है।
- धन विधेयकों (Money Bills) पर इसकी शक्तियाँ बहुत सीमित हैं।
- यह किसी विधेयक को स्थायी रूप से रोक नहीं सकता, केवल कुछ समय के लिए विलंब कर सकता है।
- अंतिम निर्णय का अधिकार हाउस ऑफ कॉमन्स के पास होता है।
हाउस ऑफ लॉर्ड्स का महत्व
- कानूनों की गहन समीक्षा करता है।
- जल्दबाजी में बनाए गए कानूनों की त्रुटियाँ दूर करने में सहायता करता है।
- विशेषज्ञों के अनुभव का लाभ मिलता है।
- सरकार को उत्तरदायी बनाए रखने में सहयोग करता है।
निष्कर्ष
हाउस ऑफ लॉर्ड्स ब्रिटेन की संसद का एक महत्वपूर्ण अंग है। यद्यपि इसकी शक्तियाँ हाउस ऑफ कॉमन्स की तुलना में सीमित हैं, फिर भी कानूनों की समीक्षा, संशोधन तथा विशेषज्ञ सलाह प्रदान करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए इसे ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था का एक आवश्यक और उपयोगी संस्थान माना जाता है।
प्रश्न 8. रूस के साम्यवादी दल और चीन के साम्यवादी दल का विश्लेषण कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
साम्यवादी दल (Communist Party) मार्क्सवाद और लेनिनवाद की विचारधारा पर आधारित राजनीतिक संगठन होता है। रूस और चीन दोनों देशों में साम्यवादी दलों ने राजनीति, शासन और समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि दोनों दल साम्यवादी विचारधारा से प्रेरित हैं, फिर भी उनकी वर्तमान स्थिति और भूमिका में काफी अंतर है।
1. रूस का साम्यवादी दल
रूस का प्रमुख साम्यवादी दल रूसी संघ का साम्यवादी दल (Communist Party of the Russian Federation - CPRF) है।
प्रमुख विशेषताएँ
- इसकी स्थापना 1993 में हुई।
- यह सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की परंपरा को आगे बढ़ाता है।
- यह वर्तमान रूस में एक विपक्षी राजनीतिक दल के रूप में कार्य करता है।
- यह सामाजिक समानता, सरकारी नियंत्रण और श्रमिकों के हितों पर बल देता है।
- यह नियमित रूप से चुनावों में भाग लेता है, लेकिन शासन की प्रमुख शक्ति नहीं है।
2. चीन का साम्यवादी दल
चीन का साम्यवादी दल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party of China - CPC) कहलाता है।
प्रमुख विशेषताएँ
- इसकी स्थापना 1921 में हुई।
- 1949 में जनवादी गणराज्य चीन की स्थापना के बाद से यही देश का शासक दल है।
- चीन में एक-दलीय राजनीतिक व्यवस्था है, इसलिए यही सबसे प्रमुख राजनीतिक शक्ति है।
- सरकार, सेना और प्रशासन पर इसका व्यापक प्रभाव है।
- देश की आर्थिक, सामाजिक और विदेश नीति के निर्धारण में इसकी मुख्य भूमिका होती है।
रूस और चीन के साम्यवादी दलों की तुलना
| आधार | रूस का साम्यवादी दल | चीन का साम्यवादी दल |
|---|---|---|
| स्थापना | 1993 | 1921 |
| राजनीतिक स्थिति | प्रमुख विपक्षी दल | सत्तारूढ़ दल |
| शासन व्यवस्था | बहुदलीय व्यवस्था | एक-दलीय व्यवस्था |
| शासन पर प्रभाव | सीमित | अत्यधिक |
| चुनाव | अन्य दलों के साथ चुनाव लड़ता है | देश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति |
समानताएँ
- दोनों दल मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा से प्रेरित हैं।
- सामाजिक समानता और श्रमिक हितों पर बल देते हैं।
- राष्ट्रीय विकास और सामाजिक कल्याण को महत्व देते हैं।
- दोनों का अपने-अपने देशों के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
अंतर
- चीन में साम्यवादी दल सत्ता में है, जबकि रूस में यह विपक्ष में है।
- चीन में एक-दलीय व्यवस्था है, जबकि रूस में बहुदलीय व्यवस्था है।
- चीन में सरकार और पार्टी का संबंध बहुत मजबूत है, जबकि रूस में सरकार अलग राजनीतिक दल के नेतृत्व में कार्य करती है।
निष्कर्ष
रूस और चीन दोनों के साम्यवादी दलों ने अपने-अपने देशों की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। चीन का साम्यवादी दल आज भी देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक संस्था है और शासन का नेतृत्व करता है, जबकि रूस का साम्यवादी दल लोकतांत्रिक बहुदलीय व्यवस्था में एक प्रमुख विपक्षी दल के रूप में कार्य करता है। यही दोनों दलों के बीच सबसे बड़ा अंतर है।
December 2024
Section A
प्रश्न 1. तुलनात्मक राजनीति को परिभाषित करते हुए इसकी प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र का विस्तृत विवरण दीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) राजनीति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं, संस्थाओं, प्रक्रियाओं तथा राजनीतिक व्यवहार का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। इसका उद्देश्य विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं की समानताओं और भिन्नताओं को समझना तथा उनके आधार पर सामान्य सिद्धांत विकसित करना है। आधुनिक युग में तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है और इसमें केवल संविधान ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दल, दबाव समूह, राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक विकास तथा नागरिकों के राजनीतिक व्यवहार का भी अध्ययन किया जाता है।
तुलनात्मक राजनीति की परिभाषा
गैब्रियल आल्मंड (Gabriel Almond) के अनुसार—
"तुलनात्मक राजनीति विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन है।"
जीन ब्लोंडेल (Jean Blondel) के अनुसार—
"तुलनात्मक राजनीति का उद्देश्य विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना करके उनके कार्यों और विशेषताओं को समझना है।"
तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति (Nature of Comparative Politics)
1. वैज्ञानिक अध्ययन
तुलनात्मक राजनीति तथ्यों, आँकड़ों और वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करती है।
2. तुलनात्मक अध्ययन
इसमें दो या दो से अधिक देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना की जाती है ताकि उनकी समानताओं और भिन्नताओं को समझा जा सके।
3. व्यवहारवादी दृष्टिकोण
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति केवल संविधान का अध्ययन नहीं करती, बल्कि राजनीतिक दलों, मतदाताओं, नेताओं और दबाव समूहों के वास्तविक व्यवहार का भी अध्ययन करती है।
4. अंतर्विषयक (Interdisciplinary) प्रकृति
यह समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान तथा मानवशास्त्र जैसे विषयों से भी सहायता लेती है।
5. गतिशील प्रकृति
राजनीतिक व्यवस्थाएँ समय के साथ बदलती रहती हैं। इसलिए तुलनात्मक राजनीति भी बदलती परिस्थितियों के अनुसार नए विषयों को शामिल करती रहती है।
6. व्यावहारिक एवं विश्लेषणात्मक
यह केवल सिद्धांतों का अध्ययन नहीं करती, बल्कि यह भी समझने का प्रयास करती है कि राजनीतिक संस्थाएँ व्यवहार में कैसे कार्य करती हैं।
तुलनात्मक राजनीति का विषय-क्षेत्र (Scope of Comparative Politics)
तुलनात्मक राजनीति का विषय-क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित विषयों का अध्ययन किया जाता है—
1. संविधान
विभिन्न देशों के संविधानों की संरचना, विशेषताएँ और कार्यप्रणाली का अध्ययन।
2. शासन प्रणाली
संसदात्मक, अध्यक्षात्मक, संघीय और एकात्मक शासन प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन।
3. राजनीतिक संस्थाएँ
- विधायिका
- कार्यपालिका
- न्यायपालिका
इनकी संरचना, शक्तियों और कार्यों का अध्ययन।
4. राजनीतिक दल
विभिन्न देशों की दलीय व्यवस्था, राजनीतिक दलों की भूमिका तथा कार्यों का अध्ययन।
5. दबाव समूह (Pressure Groups)
दबाव समूहों तथा हित समूहों का सरकार और नीति-निर्माण पर प्रभाव।
6. निर्वाचन प्रणाली
चुनाव प्रक्रिया, मतदान प्रणाली तथा निर्वाचन आयोग की भूमिका का अध्ययन।
7. राजनीतिक संस्कृति
नागरिकों के राजनीतिक विचार, विश्वास, मूल्य और राजनीतिक भागीदारी का अध्ययन।
8. राजनीतिक विकास
लोकतंत्रीकरण, आधुनिकीकरण तथा राजनीतिक स्थिरता का अध्ययन।
9. सार्वजनिक नीति (Public Policy)
सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों तथा उनके प्रभाव का अध्ययन।
10. अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा विदेशी नीतियों का राजनीतिक व्यवस्थाओं पर प्रभाव।
तुलनात्मक राजनीति का महत्व
- विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं को समझने में सहायता मिलती है।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास समझने में मदद मिलती है।
- शासन प्रणालियों के गुण-दोषों का पता चलता है।
- नई नीतियों और सुधारों के लिए उपयोगी सुझाव प्राप्त होते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय समझ और सहयोग को बढ़ावा मिलता है।
- राजनीति विज्ञान के वैज्ञानिक विकास में योगदान मिलता है।
तुलनात्मक राजनीति की सीमाएँ
- सभी देशों की परिस्थितियाँ समान नहीं होतीं।
- राजनीतिक व्यवहार का सही अनुमान लगाना कठिन होता है।
- सामाजिक एवं सांस्कृतिक भिन्नताओं के कारण तुलना जटिल हो सकती है।
- सभी देशों के विश्वसनीय आँकड़े हमेशा उपलब्ध नहीं होते।
निष्कर्ष
तुलनात्मक राजनीति राजनीति विज्ञान की एक व्यापक और वैज्ञानिक शाखा है। यह केवल विभिन्न देशों की शासन व्यवस्थाओं की तुलना ही नहीं करती, बल्कि उनके राजनीतिक व्यवहार, संस्कृति, संस्थाओं और विकास का भी अध्ययन करती है। आधुनिक युग में इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है क्योंकि इससे विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं को बेहतर ढंग से समझने और लोकतांत्रिक शासन को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिलती है।
प्रश्न 2. संविधानवाद की उदारवादी-लोकतांत्रिक अवधारणा व साम्यवादी अवधारणा की विवेचना कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संविधानवाद (Constitutionalism) का अर्थ है कि राज्य की शासन व्यवस्था संविधान के अनुसार संचालित हो तथा सरकार की शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित हों। इसका उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना, कानून के शासन की स्थापना करना और निरंकुश शासन को रोकना है।
संविधानवाद की दो प्रमुख अवधारणाएँ हैं—
- उदारवादी-लोकतांत्रिक अवधारणा (Liberal-Democratic Concept)
- साम्यवादी अवधारणा (Communist Concept)
दोनों अवधारणाओं के उद्देश्य और कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण अंतर है।
1. उदारवादी-लोकतांत्रिक संविधानवाद
अर्थ
उदारवादी-लोकतांत्रिक संविधानवाद का आधार व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लोकतंत्र, कानून का शासन और सीमित सरकार है। इस अवधारणा के अनुसार सरकार संविधान के अधीन कार्य करती है तथा नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है और सरकार उसी के अनुसार कार्य करती है।
2. कानून का शासन (Rule of Law)
सभी नागरिक और शासक कानून के समक्ष समान होते हैं। कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होता।
3. सीमित सरकार
सरकार की शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित रहती हैं। सरकार मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकती।
4. मौलिक अधिकारों की रक्षा
नागरिकों को अभिव्यक्ति, समानता, धर्म और स्वतंत्रता जैसे अधिकार प्राप्त होते हैं।
5. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है और नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण करती है।
6. लोकतांत्रिक शासन
सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और जनता के प्रति उत्तरदायी होती है।
उदाहरण
- भारत
- अमेरिका
- ब्रिटेन
- कनाडा
- ऑस्ट्रेलिया
2. साम्यवादी संविधानवाद
अर्थ
साम्यवादी संविधानवाद मार्क्सवाद और लेनिनवाद की विचारधारा पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य समाजवाद की स्थापना, आर्थिक समानता तथा सामूहिक हितों की रक्षा करना है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. समाजवादी राज्य
राज्य समाजवादी सिद्धांतों के आधार पर कार्य करता है।
2. एक-दलीय व्यवस्था
सामान्यतः केवल साम्यवादी दल ही शासन का नेतृत्व करता है।
3. सामूहिक हित को प्राथमिकता
व्यक्ति की अपेक्षा समाज और राज्य के हितों को अधिक महत्व दिया जाता है।
4. राज्य का व्यापक नियंत्रण
राज्य का अर्थव्यवस्था, उद्योग तथा संसाधनों पर व्यापक नियंत्रण होता है।
5. सीमित राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
बहुदलीय लोकतंत्र के स्थान पर एक-दलीय व्यवस्था होती है।
उदाहरण
- चीन
- क्यूबा
- वियतनाम
- उत्तर कोरिया (विशिष्ट साम्यवादी मॉडल)
उदारवादी-लोकतांत्रिक एवं साम्यवादी संविधानवाद में अंतर
| उदारवादी-लोकतांत्रिक संविधानवाद | साम्यवादी संविधानवाद |
|---|---|
| व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल | सामूहिक हित पर बल |
| बहुदलीय लोकतंत्र | एक-दलीय व्यवस्था |
| सीमित सरकार | राज्य की व्यापक भूमिका |
| स्वतंत्र न्यायपालिका | न्यायपालिका पर राज्य/दल का अधिक प्रभाव |
| मौलिक अधिकारों की व्यापक सुरक्षा | अधिकारों के साथ राज्य हित को प्राथमिकता |
| निजी संपत्ति को मान्यता | सार्वजनिक/राज्य स्वामित्व पर अधिक बल |
उदारवादी-लोकतांत्रिक संविधानवाद के गुण
- नागरिक अधिकारों की रक्षा।
- लोकतंत्र को बढ़ावा।
- स्वतंत्र न्यायपालिका।
- सरकार की शक्तियों पर नियंत्रण।
- कानून के शासन की स्थापना।
साम्यवादी संविधानवाद के गुण
- सामाजिक और आर्थिक समानता पर बल।
- राष्ट्रीय योजनाओं का त्वरित क्रियान्वयन।
- आर्थिक संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण।
- दीर्घकालिक विकास योजनाओं को लागू करने में सुविधा।
साम्यवादी संविधानवाद की सीमाएँ
- राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।
- बहुदलीय लोकतंत्र का अभाव।
- सत्ता का केंद्रीकरण।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध की संभावना।
निष्कर्ष
उदारवादी-लोकतांत्रिक और साम्यवादी संविधानवाद दोनों का उद्देश्य राज्य में व्यवस्था और विकास स्थापित करना है, लेकिन दोनों की कार्यप्रणाली अलग-अलग है। उदारवादी-लोकतांत्रिक संविधानवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और कानून के शासन पर आधारित है, जबकि साम्यवादी संविधानवाद सामाजिक समानता, राज्य नियंत्रण और सामूहिक हित को प्राथमिकता देता है। आधुनिक विश्व में अधिकांश लोकतांत्रिक देश उदारवादी-लोकतांत्रिक संविधानवाद का अनुसरण करते हैं, जबकि कुछ देश समाजवादी मॉडल को अपनाए हुए हैं।
प्रश्न 3. संसदात्मक और अध्यक्षात्मक शासन प्रणालियों का अर्थ समझाते हुए इनके मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
लोकतांत्रिक देशों में मुख्य रूप से दो प्रकार की शासन प्रणालियाँ प्रचलित हैं—संसदात्मक शासन प्रणाली (Parliamentary System) तथा अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली (Presidential System)। दोनों का उद्देश्य सुशासन और लोकतंत्र को मजबूत बनाना है, लेकिन इनकी संरचना, कार्यप्रणाली और शक्तियों के वितरण में महत्वपूर्ण अंतर है। ब्रिटेन और भारत संसदात्मक शासन प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का प्रमुख उदाहरण है।
संसदात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
संसदात्मक शासन प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका (Executive) विधायिका (Legislature) से निकलती है और उसके प्रति उत्तरदायी होती है। प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है, जबकि राष्ट्रपति या राजा केवल संवैधानिक प्रमुख होता है।
उदाहरण: भारत, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें राष्ट्रपति ही राष्ट्राध्यक्ष तथा सरकार का प्रमुख दोनों होता है। राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और वह विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राज़ील, मेक्सिको।
संसदात्मक एवं अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में अंतर
| संसदात्मक शासन प्रणाली | अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली |
|---|---|
| 1. प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका होता है। | 1. राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका होता है। |
| 2. राष्ट्रपति/राजा नाममात्र का प्रमुख होता है। | 2. राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष और सरकार का प्रमुख दोनों होता है। |
| 3. कार्यपालिका संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। | 3. कार्यपालिका संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। |
| 4. मंत्रिपरिषद संसद से बनती है। | 4. मंत्री सामान्यतः संसद के सदस्य नहीं होते। |
| 5. सरकार बहुमत खोने पर गिर सकती है। | 5. राष्ट्रपति का कार्यकाल निश्चित होता है। |
| 6. कार्यपालिका और विधायिका में घनिष्ठ संबंध होता है। | 6. कार्यपालिका और विधायिका में शक्तियों का पृथक्करण होता है। |
| 7. प्रधानमंत्री बहुमत दल का नेता होता है। | 7. राष्ट्रपति जनता द्वारा (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष) चुना जाता है। |
| 8. राजनीतिक अस्थिरता की संभावना अधिक होती है। | 8. सरकार अपेक्षाकृत अधिक स्थिर होती है। |
संसदात्मक शासन प्रणाली के गुण
- सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी रहती है।
- लोकतांत्रिक नियंत्रण अधिक होता है।
- सरकार और संसद के बीच समन्वय बना रहता है।
- अविश्वास प्रस्ताव द्वारा अयोग्य सरकार को हटाया जा सकता है।
- जनता की भागीदारी अधिक होती है।
संसदात्मक शासन प्रणाली के दोष
- गठबंधन सरकारों में अस्थिरता।
- निर्णय लेने में विलंब।
- दलीय राजनीति का अधिक प्रभाव।
- प्रधानमंत्री पर अत्यधिक निर्भरता।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण
- स्थिर सरकार।
- मजबूत नेतृत्व।
- निश्चित कार्यकाल।
- त्वरित निर्णय लेने की क्षमता।
- शक्तियों का स्पष्ट विभाजन।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दोष
- राष्ट्रपति के हाथों में शक्ति का केंद्रीकरण।
- राष्ट्रपति और संसद के बीच टकराव की संभावना।
- महाभियोग के अतिरिक्त राष्ट्रपति को हटाना कठिन।
- कार्यपालिका और विधायिका के बीच समन्वय की कमी।
दोनों प्रणालियों की समानताएँ
- दोनों लोकतांत्रिक शासन प्रणालियाँ हैं।
- दोनों का उद्देश्य जनकल्याण और सुशासन है।
- दोनों में संविधान के अनुसार शासन चलता है।
- दोनों में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का अस्तित्व होता है।
- दोनों में नागरिक अधिकारों की रक्षा का प्रावधान होता है।
निष्कर्ष
संसदात्मक और अध्यक्षात्मक दोनों शासन प्रणालियाँ लोकतांत्रिक शासन की महत्वपूर्ण व्यवस्थाएँ हैं। संसदात्मक प्रणाली उत्तरदायी सरकार और संसदीय नियंत्रण पर बल देती है, जबकि अध्यक्षात्मक प्रणाली स्थिरता, मजबूत नेतृत्व और शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित है। किसी भी देश के लिए कौन-सी प्रणाली उपयुक्त होगी, यह उसकी ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
प्रश्न 4. ब्रिटेन की संसदीय व्यवस्था को मंत्रिमण्डल शासन व्यवस्था क्यों कहते हैं? मंत्रिमण्डल की शक्तियों का विस्तृत वर्णन कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
ब्रिटेन विश्व का सबसे प्राचीन संसदीय लोकतंत्र है। यहाँ संसदात्मक शासन प्रणाली (Parliamentary System) लागू है, जिसमें राजा/रानी केवल संवैधानिक प्रमुख (Nominal Executive) होते हैं, जबकि वास्तविक शासन प्रधानमंत्री और मंत्रिमण्डल (Cabinet) द्वारा चलाया जाता है। इसलिए ब्रिटेन की संसदीय व्यवस्था को "मंत्रिमण्डल शासन व्यवस्था (Cabinet Government)" कहा जाता है।
ब्रिटेन की संसदीय व्यवस्था को मंत्रिमण्डल शासन व्यवस्था क्यों कहा जाता है?
ब्रिटेन में शासन की वास्तविक शक्ति मंत्रिमण्डल के पास होती है। राजा या रानी अधिकांश कार्य प्रधानमंत्री और मंत्रिमण्डल की सलाह पर करते हैं। मंत्रिमण्डल ही सरकार की नीतियाँ बनाता है, प्रशासन चलाता है और संसद के प्रति उत्तरदायी रहता है।
इसी कारण प्रसिद्ध विद्वान वाल्टर बैजट (Walter Bagehot) ने मंत्रिमण्डल को "ब्रिटिश शासन व्यवस्था का हृदय (Heart of the British Constitution)" कहा है।
ब्रिटिश मंत्रिमण्डल की शक्तियाँ
1. प्रशासनिक शक्तियाँ
- मंत्रिमण्डल पूरे देश के प्रशासन का संचालन करता है।
- सभी सरकारी विभागों का नियंत्रण मंत्रिमण्डल के पास होता है।
- विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों में समन्वय स्थापित करता है।
2. विधायी शक्तियाँ
- अधिकांश विधेयक (Bills) मंत्रिमण्डल द्वारा तैयार किए जाते हैं।
- संसद में सरकारी विधेयकों को प्रस्तुत किया जाता है।
- बहुमत के आधार पर अधिकांश विधेयक पारित करा लिए जाते हैं।
3. वित्तीय शक्तियाँ
- वार्षिक बजट तैयार करता है।
- कर लगाने और सरकारी व्यय का प्रस्ताव प्रस्तुत करता है।
- आर्थिक नीतियों का निर्धारण करता है।
4. नीति निर्माण
- देश की आंतरिक और बाहरी नीतियों का निर्माण करता है।
- शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, कृषि, उद्योग तथा आर्थिक विकास से संबंधित नीतियाँ निर्धारित करता है।
5. विदेश नीति संबंधी शक्तियाँ
- अन्य देशों के साथ संबंध स्थापित करता है।
- अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेता है।
- संधियों और समझौतों पर निर्णय लेता है।
6. रक्षा संबंधी शक्तियाँ
- राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा नीति का निर्धारण करता है।
- सशस्त्र सेनाओं से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेता है।
7. नियुक्ति संबंधी शक्तियाँ
- उच्च अधिकारियों, राजदूतों और विभिन्न आयोगों के प्रमुखों की नियुक्ति के संबंध में सलाह देता है।
- व्यवहार में अधिकांश नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री और मंत्रिमण्डल की सलाह पर होती हैं।
8. संसद पर प्रभाव
- मंत्रिमण्डल संसद का कार्यसूची (Agenda) निर्धारित करता है।
- संसद के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होता है।
- बहुमत होने के कारण संसद में अपने कार्यक्रमों को लागू करने में सक्षम रहता है।
मंत्रिमण्डल की विशेषताएँ
- प्रधानमंत्री इसका प्रमुख होता है।
- सभी मंत्री सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
- मंत्रिमण्डल बहुमत दल के सदस्यों से बनता है।
- सभी महत्वपूर्ण निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं।
मंत्रिमण्डल की सीमाएँ
- संसद के प्रति उत्तरदायित्व।
- अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर त्यागपत्र देना पड़ता है।
- जनमत और विपक्ष का प्रभाव।
- दलीय अनुशासन और लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करना पड़ता है।
मंत्रिमण्डल शासन व्यवस्था के गुण
- उत्तरदायी सरकार।
- प्रभावी और समन्वित प्रशासन।
- त्वरित नीति निर्माण।
- संसद और सरकार के बीच बेहतर समन्वय।
- लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व।
निष्कर्ष
ब्रिटेन की संसदीय व्यवस्था में वास्तविक शासन मंत्रिमण्डल द्वारा संचालित होता है, इसलिए इसे मंत्रिमण्डल शासन व्यवस्था कहा जाता है। मंत्रिमण्डल प्रशासन, कानून निर्माण, वित्त, विदेश नीति तथा राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में केंद्रीय भूमिका निभाता है। यद्यपि इसकी शक्तियाँ व्यापक हैं, फिर भी संसद, विपक्ष और जनमत के कारण यह लोकतांत्रिक रूप से उत्तरदायी बना रहता है।
प्रश्न 5. तुलनात्मक राजनीति के आधुनिक उपागम के विकास और विशेषताओं की विवेचना कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) राजनीति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। प्रारम्भ में इसका अध्ययन केवल संविधान, सरकार और राजनीतिक संस्थाओं तक सीमित था, जिसे परम्परागत उपागम कहा जाता है। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद राजनीति के अध्ययन में व्यापक परिवर्तन हुए और आधुनिक उपागम (Modern Approach) का विकास हुआ। इस उपागम में केवल संवैधानिक संस्थाओं का ही नहीं, बल्कि राजनीतिक व्यवहार, राजनीतिक संस्कृति, सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का भी अध्ययन किया जाने लगा।
आधुनिक उपागम का विकास
आधुनिक उपागम के विकास के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे—
1. द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अनेक नए स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आए। उनकी राजनीतिक व्यवस्थाओं के अध्ययन के लिए नई पद्धति की आवश्यकता महसूस हुई।
2. व्यवहारवादी आंदोलन (Behavioural Movement)
1940 और 1950 के दशक में व्यवहारवादी आंदोलन ने राजनीति विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक और अनुभवजन्य (Empirical) बनाने पर बल दिया। इससे आधुनिक उपागम का विकास हुआ।
3. सामाजिक विज्ञानों का प्रभाव
समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र तथा मानवशास्त्र जैसे विषयों ने तुलनात्मक राजनीति को अधिक व्यापक बनाया।
4. राजनीतिक विकास का अध्ययन
नवस्वतंत्र देशों में लोकतंत्र, आधुनिकीकरण तथा राजनीतिक विकास का अध्ययन आवश्यक हो गया।
5. वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धतियों का विकास
सर्वेक्षण, सांख्यिकीय विश्लेषण, साक्षात्कार तथा अन्य वैज्ञानिक अनुसंधान विधियों के प्रयोग से तुलनात्मक राजनीति अधिक विश्वसनीय बनी।
आधुनिक उपागम की प्रमुख विशेषताएँ
1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक उपागम तथ्यों, आँकड़ों और वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित है।
2. व्यवहारवादी दृष्टिकोण
यह केवल संविधान का अध्ययन नहीं करता, बल्कि राजनीतिक दलों, मतदाताओं, नेताओं और दबाव समूहों के वास्तविक व्यवहार का भी अध्ययन करता है।
3. राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन
यह सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था (Political System) का अध्ययन करता है, न कि केवल सरकारी संस्थाओं का।
4. अंतर्विषयक दृष्टिकोण
समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान और इतिहास जैसे विषयों से सहायता लेकर राजनीति का अध्ययन किया जाता है।
5. अनुभवजन्य अध्ययन (Empirical Study)
निष्कर्ष वास्तविक तथ्यों, सर्वेक्षणों और शोध के आधार पर निकाले जाते हैं।
6. विकासशील देशों का अध्ययन
आधुनिक उपागम केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों का भी अध्ययन करता है।
7. राजनीतिक संस्कृति पर बल
यह नागरिकों के राजनीतिक विचारों, मूल्यों, विश्वासों और राजनीतिक भागीदारी का अध्ययन करता है।
8. तुलनात्मक विश्लेषण
विभिन्न देशों की समानताओं और भिन्नताओं की तुलना करके सामान्य सिद्धांत विकसित करने का प्रयास करता है।
9. मूल्य-निरपेक्षता (Value Neutrality)
व्यक्तिगत विचारों या पक्षपात से मुक्त होकर निष्पक्ष अध्ययन करने पर बल दिया जाता है।
प्रमुख विद्वानों का योगदान
गैब्रियल आल्मंड (Gabriel Almond)
राजनीतिक व्यवस्था तथा संरचना-कार्य (Structural-Functional Approach) का विकास किया।
डेविड ईस्टन (David Easton)
राजनीति को राजनीतिक प्रणाली (Political System) के रूप में समझाया।
लूसियन पाई (Lucian Pye)
राजनीतिक विकास और राजनीतिक संस्कृति पर महत्वपूर्ण कार्य किया।
कार्ल डॉइच (Karl Deutsch)
राजनीति में संचार (Communication) के महत्व को स्पष्ट किया।
आधुनिक उपागम के गुण
- अधिक वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ।
- वास्तविक राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन।
- सामाजिक एवं आर्थिक कारकों को महत्व।
- विकासशील देशों के अध्ययन में उपयोगी।
- तुलनात्मक राजनीति के क्षेत्र को व्यापक बनाया।
- नई राजनीतिक समस्याओं को समझने में सहायक।
आधुनिक उपागम की सीमाएँ
- पूरी तरह मूल्य-निरपेक्ष रहना कठिन है।
- आँकड़ों का संग्रह समय और धन की दृष्टि से महँगा होता है।
- विभिन्न देशों की परिस्थितियों की तुलना हमेशा सरल नहीं होती।
- कई बार व्यवहार पर अधिक ध्यान देने से संवैधानिक संस्थाओं की उपेक्षा हो जाती है।
निष्कर्ष
आधुनिक उपागम ने तुलनात्मक राजनीति को अधिक वैज्ञानिक, व्यापक और व्यावहारिक बनाया है। इसने संविधान और संस्थाओं के अध्ययन के साथ-साथ राजनीतिक व्यवहार, संस्कृति, सामाजिक परिस्थितियों और राजनीतिक विकास को भी अध्ययन का विषय बनाया। वर्तमान समय में तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में आधुनिक उपागम को सबसे प्रभावशाली और उपयोगी माना जाता है।
Section B
प्रश्न 1. संविधानवाद के प्रमुख तत्वों की व्याख्या कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संविधानवाद (Constitutionalism) का अर्थ है कि राज्य की शासन व्यवस्था संविधान के अनुसार संचालित हो तथा सरकार की शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित हों। इसका उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना, कानून के शासन की स्थापना करना तथा लोकतांत्रिक शासन को मजबूत बनाना है। केवल संविधान का होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका पालन होना भी आवश्यक है। इसी सिद्धांत को संविधानवाद कहा जाता है।
संविधानवाद के प्रमुख तत्व
1. संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of Constitution)
संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है। सरकार के सभी अंग—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—संविधान के अनुसार कार्य करते हैं। कोई भी कानून संविधान के विरुद्ध नहीं बनाया जा सकता।
2. कानून का शासन (Rule of Law)
संविधानवाद का मुख्य आधार कानून का शासन है। सभी नागरिक, अधिकारी तथा शासक कानून के समक्ष समान होते हैं। कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होता।
3. सीमित सरकार (Limited Government)
सरकार की शक्तियाँ संविधान द्वारा निर्धारित और सीमित होती हैं। सरकार मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकती।
4. मौलिक अधिकारों की रक्षा
संविधानवाद नागरिकों के मौलिक अधिकारों जैसे—
- समानता का अधिकार
- स्वतंत्रता का अधिकार
- धार्मिक स्वतंत्रता
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
की रक्षा करता है।
5. शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का विभाजन किया जाता है, जिससे किसी एक संस्था में अत्यधिक शक्ति केंद्रित न हो।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)
न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है तथा नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण करती है। यह सरकार के कार्यों की संवैधानिकता की जाँच भी करती है।
7. उत्तरदायी सरकार (Responsible Government)
सरकार जनता और संविधान के प्रति उत्तरदायी होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार अपने कार्यों के लिए जवाबदेह रहती है।
8. लोकतांत्रिक शासन
संविधानवाद स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, जनप्रतिनिधित्व तथा नागरिक भागीदारी के माध्यम से लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
संविधानवाद का महत्व
- लोकतंत्र की रक्षा करता है।
- नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करता है।
- सरकार की निरंकुशता पर रोक लगाता है।
- कानून के शासन को स्थापित करता है।
- शासन में स्थिरता एवं उत्तरदायित्व लाता है।
निष्कर्ष
संविधानवाद किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की आधारशिला है। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार संविधान के अनुसार कार्य करे और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो। संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका तथा सीमित सरकार इसके प्रमुख तत्व हैं, जो लोकतांत्रिक शासन को सफल बनाते हैं।
प्रश्न 2. संसदात्मक शासन प्रणाली के गुण और दोषों की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संसदात्मक शासन प्रणाली (Parliamentary System) वह शासन व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका (Executive) विधायिका (Legislature) से निकलती है और उसके प्रति उत्तरदायी होती है। इस प्रणाली में प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है, जबकि राष्ट्रपति या राजा केवल संवैधानिक प्रमुख होता है। भारत, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया इस प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं।
संसदात्मक शासन प्रणाली के गुण
1. उत्तरदायी सरकार
मंत्रिपरिषद संसद के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। यदि सरकार बहुमत खो देती है, तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है।
2. लोकतांत्रिक शासन
सरकार जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से बनती है, जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है।
3. कार्यपालिका और विधायिका में समन्वय
दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध होने के कारण नीतियों को लागू करना अपेक्षाकृत आसान होता है।
4. निरंकुशता पर नियंत्रण
संसद प्रश्नकाल, चर्चा, अविश्वास प्रस्ताव तथा अन्य संसदीय उपायों द्वारा सरकार पर नियंत्रण रखती है।
5. शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन
यदि सरकार बहुमत खो देती है, तो नई सरकार लोकतांत्रिक तरीके से बन जाती है। इसके लिए हिंसा या क्रांति की आवश्यकता नहीं होती।
संसदात्मक शासन प्रणाली के दोष
1. राजनीतिक अस्थिरता
यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले, तो गठबंधन सरकारें बनती हैं, जो कई बार अस्थिर होती हैं।
2. निर्णय लेने में विलंब
महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले संसद में लंबी चर्चा होती है, जिससे निर्णय में देरी हो सकती है।
3. दलीय राजनीति का प्रभाव
कई बार राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा राजनीतिक दलों के हित अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
4. प्रधानमंत्री पर अत्यधिक निर्भरता
यदि प्रधानमंत्री बहुत प्रभावशाली हो जाए, तो मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों की भूमिका कम हो सकती है।
5. गठबंधन की समस्याएँ
गठबंधन सरकारों में विभिन्न दलों के बीच मतभेद के कारण नीतियों के क्रियान्वयन में कठिनाई हो सकती है।
आलोचनात्मक समीक्षा
संसदात्मक शासन प्रणाली उत्तरदायी एवं लोकतांत्रिक शासन प्रदान करती है। यह जनता के प्रति जवाबदेह रहती है तथा सरकार की शक्तियों पर नियंत्रण बनाए रखती है। लेकिन गठबंधन सरकारों की अस्थिरता, दलीय राजनीति और निर्णय लेने में विलंब जैसी समस्याएँ इसकी प्रमुख कमजोरियाँ हैं।
फिर भी, लोकतांत्रिक मूल्यों, उत्तरदायित्व और जनप्रतिनिधित्व के कारण यह विश्व की सबसे सफल शासन प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
निष्कर्ष
संसदात्मक शासन प्रणाली लोकतंत्र, उत्तरदायित्व और जनसहभागिता पर आधारित है। इसकी कुछ सीमाएँ होने के बावजूद यह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा तथा सरकार को उत्तरदायी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए भारत और ब्रिटेन जैसे अनेक देशों ने इस प्रणाली को सफलतापूर्वक अपनाया है।
प्रश्न 3. रूस के संविधान में विधायिका और कार्यपालिका की स्थिति का वर्णन कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
रूस (Russian Federation) का वर्तमान संविधान 12 दिसंबर 1993 को लागू हुआ। रूस में अर्ध-राष्ट्रपति शासन प्रणाली (Semi-Presidential System) है, जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधायिका तथा न्यायपालिका सभी संविधान के अनुसार कार्य करते हैं। रूस की शासन व्यवस्था में राष्ट्रपति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जबकि विधायिका कानून निर्माण का कार्य करती है।
रूस की विधायिका (Legislature)
रूस की संसद को संघीय सभा (Federal Assembly) कहा जाता है। यह द्विसदनीय (Bicameral) है।
1. राज्य ड्यूमा (State Duma)
- यह संसद का निम्न सदन (Lower House) है।
- इसके सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं।
- इसका मुख्य कार्य कानून बनाना, बजट पर विचार करना तथा प्रधानमंत्री की नियुक्ति को स्वीकृति देना है।
2. संघ परिषद (Federation Council)
- यह संसद का उच्च सदन (Upper House) है।
- इसमें रूस के विभिन्न संघीय क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते हैं।
- यह महत्वपूर्ण विधेयकों, संधियों तथा उच्च अधिकारियों की नियुक्तियों पर विचार करता है।
विधायिका के प्रमुख कार्य
- कानून बनाना।
- संविधान संशोधन में भाग लेना।
- राष्ट्रीय बजट पर विचार एवं स्वीकृति।
- सरकार के कार्यों पर निगरानी रखना।
- प्रधानमंत्री की नियुक्ति को स्वीकृति देना (राज्य ड्यूमा)।
रूस की कार्यपालिका (Executive)
रूस की कार्यपालिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल हैं—
1. राष्ट्रपति (President)
राष्ट्रपति रूस का राष्ट्राध्यक्ष (Head of State) तथा सबसे शक्तिशाली संवैधानिक पदाधिकारी है।
प्रमुख शक्तियाँ
- संविधान की रक्षा करना।
- प्रधानमंत्री की नियुक्ति करना।
- मंत्रिपरिषद का गठन करना।
- विदेश नीति का संचालन करना।
- सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति होना।
- विशेष परिस्थितियों में संसद को भंग करने की शक्ति।
2. प्रधानमंत्री (Prime Minister)
प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख (Head of Government) होता है।
मुख्य कार्य
- प्रशासन का संचालन।
- मंत्रिपरिषद का नेतृत्व।
- सरकारी नीतियों को लागू करना।
- विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों में समन्वय स्थापित करना।
3. मंत्रिपरिषद (Council of Ministers)
मंत्रिपरिषद प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कार्य करती है तथा शासन और प्रशासन का संचालन करती है।
रूस की शासन व्यवस्था की विशेषताएँ
- अर्ध-राष्ट्रपति शासन प्रणाली।
- द्विसदनीय संसद।
- शक्तिशाली राष्ट्रपति।
- प्रधानमंत्री द्वारा दैनिक प्रशासन का संचालन।
- संविधान की सर्वोच्चता।
- विधायिका और कार्यपालिका दोनों संविधान के अनुसार कार्य करती हैं।
निष्कर्ष
रूस की शासन व्यवस्था में विधायिका और कार्यपालिका दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विधायिका कानून बनाती है, जबकि कार्यपालिका उन कानूनों को लागू करती है। यद्यपि राष्ट्रपति के पास व्यापक शक्तियाँ हैं, फिर भी संसद और संविधान के माध्यम से उसकी शक्तियों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण बनाए रखा जाता है। इस प्रकार रूस की व्यवस्था में शक्ति और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
प्रश्न 4. स्विट्ज़रलैण्ड के संविधान पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
स्विट्ज़रलैण्ड (Switzerland) विश्व का एक प्रमुख लोकतांत्रिक और संघीय देश है। इसका वर्तमान संविधान 18 अप्रैल 1999 को स्वीकृत हुआ और 1 जनवरी 2000 से लागू हुआ। यह संविधान लोकतंत्र, संघवाद, नागरिक अधिकारों तथा प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) के सिद्धांतों पर आधारित है। स्विट्ज़रलैण्ड की राजनीतिक व्यवस्था अपनी स्थिरता और जनसहभागिता के लिए प्रसिद्ध है।
स्विट्ज़रलैण्ड के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. लिखित संविधान
स्विट्ज़रलैण्ड का संविधान लिखित है। इसमें शासन की संरचना, नागरिकों के अधिकार तथा सरकार की शक्तियों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
2. संघीय शासन व्यवस्था
स्विट्ज़रलैण्ड में संघीय शासन प्रणाली है। यहाँ संघीय सरकार और 26 कैंटन (Cantons) के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन किया गया है।
3. कठोर संविधान
संविधान में संशोधन के लिए जनता तथा कैंटनों दोनों की स्वीकृति आवश्यक होती है। इसलिए इसे कठोर संविधान माना जाता है।
4. प्रत्यक्ष लोकतंत्र
स्विट्ज़रलैण्ड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रत्यक्ष लोकतंत्र है।
इसके प्रमुख साधन हैं—
- जनमत संग्रह (Referendum)
- जन पहल (Popular Initiative)
इनके माध्यम से नागरिक सीधे कानून निर्माण और संविधान संशोधन में भाग लेते हैं।
5. बहुल कार्यपालिका
स्विट्ज़रलैण्ड में एक व्यक्ति राष्ट्रपति नहीं होता, बल्कि सात सदस्यों वाली संघीय परिषद (Federal Council) सामूहिक रूप से कार्यपालिका का कार्य करती है।
6. द्विसदनीय संसद
स्विट्ज़रलैण्ड की संसद (Federal Assembly) दो सदनों से मिलकर बनी है—
- राष्ट्रीय परिषद (National Council)
- राज्यों की परिषद (Council of States)
7. स्वतंत्र न्यायपालिका
संघीय सर्वोच्च न्यायालय संविधान की रक्षा करता है तथा न्याय प्रदान करता है।
8. नागरिक अधिकारों की सुरक्षा
संविधान नागरिकों को समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता तथा अन्य मूल अधिकार प्रदान करता है।
स्विट्ज़रलैण्ड के संविधान का महत्व
- लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
- संघवाद और विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देता है।
- नागरिकों की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करता है।
- राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखता है।
- नागरिक अधिकारों की रक्षा करता है।
निष्कर्ष
स्विट्ज़रलैण्ड का संविधान विश्व के सबसे सफल संविधानों में से एक माना जाता है। इसकी संघीय व्यवस्था, प्रत्यक्ष लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका तथा नागरिक अधिकारों की सुरक्षा इसे विशेष बनाती है। यही कारण है कि स्विट्ज़रलैण्ड की शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक स्थिरता और जनभागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।
प्रश्न 5. संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन की न्यायिक प्रक्रियाओं का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और चीन दोनों विश्व के प्रमुख देश हैं, लेकिन उनकी न्यायिक व्यवस्था (Judicial System) में महत्वपूर्ण अंतर है। अमेरिका में स्वतंत्र न्यायपालिका और संविधान की सर्वोच्चता पर बल दिया जाता है, जबकि चीन की न्यायिक व्यवस्था समाजवादी शासन प्रणाली तथा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व से प्रभावित है। इसलिए दोनों देशों की न्यायिक प्रक्रियाओं का तुलनात्मक अध्ययन महत्वपूर्ण है।
संयुक्त राज्य अमेरिका की न्यायिक प्रक्रिया
1. स्वतंत्र न्यायपालिका
अमेरिका में न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका से स्वतंत्र है। न्यायाधीश बिना राजनीतिक हस्तक्षेप के निर्णय देने का प्रयास करते हैं।
2. न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)
अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून या सरकारी निर्णय को असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
3. संविधान की सर्वोच्चता
सभी न्यायिक निर्णय अमेरिकी संविधान के अनुसार दिए जाते हैं। संविधान देश का सर्वोच्च कानून है।
4. नागरिक अधिकारों की सुरक्षा
न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करती है।
चीन की न्यायिक प्रक्रिया
1. समाजवादी न्याय व्यवस्था
चीन की न्यायिक व्यवस्था समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित है और राज्य की नीतियों के अनुरूप कार्य करती है।
2. सर्वोच्च जन न्यायालय
चीन का सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट (Supreme People's Court) है, जो देश का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है।
3. संविधान और कानून का पालन
न्यायालय संविधान और कानूनों के अनुसार कार्य करते हैं, लेकिन शासन व्यवस्था में कम्युनिस्ट पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
4. न्यायपालिका की स्थिति
आलोचकों का मत है कि चीन की न्यायपालिका अमेरिका की तुलना में कम स्वतंत्र है, क्योंकि राजनीतिक व्यवस्था का उस पर अधिक प्रभाव माना जाता है।
अमेरिका और चीन की न्यायिक प्रक्रियाओं में अंतर
| संयुक्त राज्य अमेरिका | चीन |
|---|---|
| स्वतंत्र न्यायपालिका | न्यायपालिका पर राजनीतिक व्यवस्था का प्रभाव |
| न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति | न्यायिक पुनरावलोकन सीमित |
| संविधान सर्वोच्च | संविधान महत्वपूर्ण, परंतु पार्टी नेतृत्व की प्रमुख भूमिका |
| मौलिक अधिकारों की व्यापक सुरक्षा | अधिकारों के साथ राज्य हितों पर अधिक बल |
| लोकतांत्रिक बहुदलीय व्यवस्था | समाजवादी एक-दलीय व्यवस्था |
समानताएँ
- दोनों देशों में सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था है।
- दोनों देशों में न्यायालय कानूनों के अनुसार निर्णय देते हैं।
- दोनों का उद्देश्य न्याय प्रदान करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।
- दोनों में विभिन्न स्तरों के न्यायालय कार्य करते हैं।
निष्कर्ष
संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन की न्यायिक व्यवस्थाएँ अपने-अपने राजनीतिक ढाँचे के अनुरूप विकसित हुई हैं। अमेरिका में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक पुनरावलोकन प्रमुख विशेषताएँ हैं, जबकि चीन में न्यायिक व्यवस्था समाजवादी शासन और राज्य की नीतियों के अनुरूप कार्य करती है। दोनों व्यवस्थाओं का उद्देश्य न्याय प्रदान करना है, किंतु उनकी कार्यप्रणाली और संरचना में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
प्रश्न 6. अमेरिका के संविधान की प्रमुख विशेषताओं की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) का संविधान विश्व का सबसे पुराना लिखित संविधान माना जाता है। इसे 17 सितम्बर 1787 को तैयार किया गया और 1789 से लागू किया गया। यह लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता तथा कानून के शासन के सिद्धांतों पर आधारित है। इसकी अनेक विशेषताएँ हैं, लेकिन कुछ सीमाओं के कारण इसकी आलोचना भी की जाती है।
अमेरिका के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. विश्व का सबसे पुराना लिखित संविधान
अमेरिकी संविधान आधुनिक युग का पहला लिखित संविधान है, जिसने अनेक देशों के संविधानों को प्रभावित किया।
2. संघीय शासन व्यवस्था
अमेरिका में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है, जिससे दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में कार्य करती हैं।
3. शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
संविधान के अनुसार सरकार तीन शाखाओं में विभाजित है—
- विधायिका (Congress)
- कार्यपालिका (President)
- न्यायपालिका (Supreme Court)
4. नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances)
सरकार की तीनों शाखाएँ एक-दूसरे पर नियंत्रण रखती हैं, जिससे किसी एक संस्था में शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण नहीं होता।
5. स्वतंत्र न्यायपालिका
सर्वोच्च न्यायालय संविधान की रक्षा करता है और कानूनों की संवैधानिकता की जाँच करता है।
6. मौलिक अधिकार (Bill of Rights)
संविधान के प्रथम दस संशोधनों में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की गई है।
अमेरिका के संविधान की आलोचनात्मक समीक्षा
सकारात्मक पक्ष
- लोकतंत्र और कानून के शासन को मजबूत करता है।
- नागरिकों के अधिकारों की प्रभावी रक्षा करता है।
- शासन में शक्ति संतुलन बनाए रखता है।
- संविधान की स्थिरता और विश्वसनीयता बनी हुई है।
- संघीय व्यवस्था के कारण राज्यों को पर्याप्त अधिकार प्राप्त हैं।
आलोचनाएँ (सीमाएँ)
1. अत्यधिक कठोर संविधान
संविधान में संशोधन करना कठिन है, क्योंकि इसके लिए विशेष संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।
2. राष्ट्रपति और कांग्रेस में टकराव
शक्तियों के पृथक्करण के कारण कई बार राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं।
3. निर्वाचन प्रणाली की आलोचना
इलेक्टोरल कॉलेज (Electoral College) प्रणाली के कारण कभी-कभी ऐसा उम्मीदवार राष्ट्रपति बन जाता है जिसे पूरे देश में कम लोकप्रिय मत (Popular Vote) मिले हों।
4. न्यायपालिका की व्यापक शक्तियाँ
कुछ विद्वानों का मत है कि सर्वोच्च न्यायालय के पास बहुत अधिक शक्तियाँ हैं, जिससे वह कई बार नीति निर्माण को भी प्रभावित करता है।
निष्कर्ष
अमेरिका का संविधान लोकतंत्र, स्वतंत्रता और कानून के शासन का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी संघीय व्यवस्था, शक्तियों का पृथक्करण तथा स्वतंत्र न्यायपालिका इसे विश्व के सबसे प्रभावशाली संविधानों में स्थान दिलाते हैं। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी इसकी स्थिरता और प्रभावशीलता के कारण यह आज भी अनेक देशों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
प्रश्न 7. आधुनिक विश्व व्यवस्था में ब्रिटेन का क्या योगदान है? चर्चा कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
ब्रिटेन (United Kingdom) विश्व के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देशों में से एक है। इतिहास में उसने राजनीति, कानून, लोकतंत्र, शिक्षा, विज्ञान, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आधुनिक विश्व व्यवस्था के निर्माण और विकास में ब्रिटेन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
आधुनिक विश्व व्यवस्था में ब्रिटेन का योगदान
1. संसदीय लोकतंत्र का विकास
ब्रिटेन को संसदीय लोकतंत्र (Parliamentary Democracy) की जन्मभूमि माना जाता है। भारत, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान सहित अनेक देशों ने ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को अपनाया है।
2. कानून के शासन (Rule of Law) का सिद्धांत
ब्रिटेन ने कानून के शासन की अवधारणा को विकसित किया। ए. वी. डायसी (A. V. Dicey) ने इस सिद्धांत को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। आज अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में यह सिद्धांत अपनाया गया है।
3. संवैधानिक शासन
ब्रिटेन ने संवैधानिक शासन और सीमित सरकार की अवधारणा को विकसित किया, जिससे लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को मजबूती मिली।
4. मानवाधिकार एवं लोकतांत्रिक मूल्य
ब्रिटेन ने स्वतंत्रता, समानता, न्याय और मानवाधिकार जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
5. राष्ट्रमंडल (Commonwealth) की स्थापना
ब्रिटेन के नेतृत्व में राष्ट्रमंडल (Commonwealth of Nations) का गठन हुआ, जिसने सदस्य देशों के बीच शिक्षा, व्यापार, खेल और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा दिया।
6. अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भूमिका
ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र (UN), नाटो (NATO), जी-7 (G7) तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाता है और वैश्विक शांति एवं सुरक्षा में योगदान देता है।
7. औद्योगिक क्रांति
औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) की शुरुआत ब्रिटेन में हुई, जिसने आधुनिक उद्योग, व्यापार, परिवहन और आर्थिक विकास की नींव रखी।
8. शिक्षा और विज्ञान
ब्रिटेन ने विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विश्व को अनेक महान वैज्ञानिक, विचारक और विश्वविद्यालय दिए हैं, जिनका वैश्विक विकास पर गहरा प्रभाव पड़ा।
ब्रिटेन के योगदान का महत्व
- लोकतंत्र का विकास।
- संसदीय शासन का प्रसार।
- कानून के शासन की स्थापना।
- मानवाधिकारों को बढ़ावा।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शांति में योगदान।
- आधुनिक आर्थिक और औद्योगिक विकास की आधारशिला।
निष्कर्ष
आधुनिक विश्व व्यवस्था के निर्माण में ब्रिटेन का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। संसदीय लोकतंत्र, कानून का शासन, संवैधानिक शासन, औद्योगिक क्रांति तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे क्षेत्रों में उसके योगदान ने विश्व राजनीति और प्रशासन को नई दिशा प्रदान की है। आज भी ब्रिटेन वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
प्रश्न 8. एकात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
एकात्मक शासन प्रणाली (Unitary System of Government) वह शासन व्यवस्था है जिसमें राज्य की सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार में निहित होती हैं। स्थानीय या प्रांतीय सरकारें यदि होती भी हैं, तो वे केंद्रीय सरकार के अधीन कार्य करती हैं। इस प्रणाली का उद्देश्य पूरे देश में एक समान प्रशासन और प्रभावी शासन स्थापित करना है। ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और न्यूज़ीलैंड इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
एकात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. शक्तियों का केंद्रीकरण
इस शासन प्रणाली में सभी महत्वपूर्ण शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं। स्थानीय सरकारें केंद्र द्वारा दिए गए अधिकारों के अनुसार कार्य करती हैं।
2. एक ही सरकार
देश में एक ही सर्वोच्च सरकार होती है, जो पूरे राष्ट्र के लिए नीतियाँ बनाती और लागू करती है।
3. एक संविधान
पूरे देश में सामान्यतः एक ही संविधान लागू होता है, जिसके अनुसार शासन संचालित होता है।
4. प्रशासन में एकरूपता
पूरे देश में समान कानून, नीतियाँ और प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है। इससे शासन में एकरूपता बनी रहती है।
5. स्थानीय सरकारें केंद्र के अधीन
नगरपालिका, पंचायत या प्रांतीय सरकारें स्वतंत्र नहीं होतीं, बल्कि केंद्र के नियंत्रण में कार्य करती हैं।
6. त्वरित निर्णय
सभी प्रमुख निर्णय केंद्रीय सरकार द्वारा लिए जाते हैं, इसलिए निर्णय लेने और लागू करने में कम समय लगता है।
7. राष्ट्रीय एकता
पूरे देश में समान प्रशासन और कानून होने के कारण राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा मिलता है।
8. कम प्रशासनिक खर्च
एक ही प्रमुख सरकार होने के कारण प्रशासनिक खर्च संघीय व्यवस्था की तुलना में कम होता है।
एकात्मक शासन प्रणाली के लाभ
- मजबूत और प्रभावी सरकार।
- त्वरित निर्णय लेने की क्षमता।
- राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा।
- प्रशासन में सरलता।
- कम प्रशासनिक व्यय।
एकात्मक शासन प्रणाली के दोष
- सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण।
- स्थानीय समस्याओं की उपेक्षा।
- स्थानीय स्वायत्तता का अभाव।
- बड़े और विविध देशों के लिए कम उपयुक्त।
उदाहरण
- ब्रिटेन
- फ्रांस
- जापान
- न्यूज़ीलैंड
- श्रीलंका
निष्कर्ष
एकात्मक शासन प्रणाली में सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं। यह व्यवस्था प्रशासनिक एकरूपता, राष्ट्रीय एकता और त्वरित निर्णय लेने में सहायक होती है। यद्यपि इसमें स्थानीय स्वायत्तता की कमी और सत्ता के केंद्रीकरण जैसी सीमाएँ हैं, फिर भी छोटे और अपेक्षाकृत समान प्रकृति वाले देशों के लिए यह अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है।
June 2024
Section A
प्रश्न 1. तुलनात्मक राजनीति के परम्परागत उपागम की विशेषताओं की विवेचना कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) राजनीति विज्ञान की वह शाखा है जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं, संस्थाओं तथा शासन प्रणालियों का अध्ययन एवं तुलना की जाती है। प्रारम्भिक काल में इस अध्ययन के लिए जिस पद्धति का प्रयोग किया गया, उसे परम्परागत उपागम (Traditional Approach) कहा जाता है। इस उपागम में मुख्य रूप से संविधान, विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका जैसी औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन किया जाता था।
परम्परागत उपागम का अर्थ
परम्परागत उपागम वह अध्ययन पद्धति है जिसमें संविधान, कानून, राजनीतिक संस्थाओं तथा शासन की संरचना का कानूनी, ऐतिहासिक एवं संस्थागत दृष्टि से अध्ययन किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि विभिन्न देशों की शासन व्यवस्था कैसे संगठित है और संविधान के अनुसार कैसे कार्य करती है।
परम्परागत उपागम की प्रमुख विशेषताएँ
1. संस्थागत अध्ययन (Institutional Approach)
इस उपागम में मुख्य रूप से राजनीतिक संस्थाओं जैसे—
- संविधान
- विधायिका
- कार्यपालिका
- न्यायपालिका
का अध्ययन किया जाता है।
2. कानूनी दृष्टिकोण (Legal Approach)
राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन संविधान, कानूनों तथा कानूनी नियमों के आधार पर किया जाता है।
3. औपचारिक अध्ययन (Formal Approach)
यह उपागम राजनीतिक संस्थाओं की संवैधानिक संरचना का अध्ययन करता है, न कि उनके वास्तविक व्यवहार का।
4. ऐतिहासिक दृष्टिकोण (Historical Approach)
राजनीतिक संस्थाओं के विकास तथा परिवर्तन को ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर समझाया जाता है।
5. वर्णनात्मक प्रकृति (Descriptive Nature)
इसमें राजनीतिक संस्थाओं और शासन प्रणालियों का विस्तृत वर्णन किया जाता है, जबकि विश्लेषण अपेक्षाकृत कम होता है।
6. आदर्शवादी दृष्टिकोण (Normative Approach)
यह बताने का प्रयास किया जाता है कि शासन व्यवस्था कैसी होनी चाहिए, न कि व्यवहार में वह कैसे कार्य कर रही है।
7. पश्चिमी देशों पर अधिक ध्यान
यह उपागम मुख्य रूप से ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस आदि पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों के अध्ययन तक सीमित रहा।
8. सीमित विषय-क्षेत्र
इसमें राजनीतिक दल, दबाव समूह, राजनीतिक संस्कृति, जनमत तथा मतदाताओं के व्यवहार जैसे विषयों को अधिक महत्व नहीं दिया गया।
परम्परागत उपागम के गुण
- राजनीतिक संस्थाओं का स्पष्ट ज्ञान प्रदान करता है।
- संविधान और शासन व्यवस्था को समझने में सहायता करता है।
- राजनीति विज्ञान के प्रारम्भिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं के अध्ययन की मजबूत आधारशिला रखी।
परम्परागत उपागम की सीमाएँ
- वास्तविक राजनीतिक व्यवहार की उपेक्षा।
- वैज्ञानिक एवं अनुभवजन्य अध्ययन का अभाव।
- सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारकों की अनदेखी।
- विकासशील देशों की राजनीति का सीमित अध्ययन।
- अत्यधिक कानूनी और औपचारिक दृष्टिकोण।
निष्कर्ष
परम्परागत उपागम ने तुलनात्मक राजनीति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने संविधान और राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन की मजबूत नींव रखी। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ थीं, फिर भी आधुनिक तुलनात्मक राजनीति के विकास का आधार यही उपागम बना। आज भी राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए इसका अध्ययन आवश्यक माना जाता है।
प्रश्न 2. संसदात्मक एवं अध्यक्षात्मक शासन प्रणालियों की व्याख्या करते हुए दोनों शासन प्रणालियों के मध्य अंतर को स्पष्ट कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
लोकतांत्रिक देशों में शासन चलाने के लिए मुख्य रूप से संसदात्मक (Parliamentary) और अध्यक्षात्मक (Presidential) शासन प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं। दोनों का उद्देश्य लोकतांत्रिक शासन स्थापित करना है, लेकिन इनकी संरचना, कार्यप्रणाली तथा शक्तियों के वितरण में महत्वपूर्ण अंतर है। ब्रिटेन और भारत संसदात्मक शासन प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का प्रमुख उदाहरण है।
संसदात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
संसदात्मक शासन प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका, विधायिका से निकलती है और उसके प्रति उत्तरदायी होती है। प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है, जबकि राष्ट्रपति या राजा केवल संवैधानिक प्रमुख होता है।
प्रमुख विशेषताएँ
- प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका होता है।
- मंत्रिपरिषद संसद के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
- कार्यपालिका और विधायिका के बीच घनिष्ठ संबंध होता है।
- सरकार बहुमत के आधार पर बनती है।
- अविश्वास प्रस्ताव द्वारा सरकार को हटाया जा सकता है।
उदाहरण: भारत, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें राष्ट्रपति ही राष्ट्राध्यक्ष तथा सरकार का प्रमुख दोनों होता है। राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है तथा वह संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
प्रमुख विशेषताएँ
- राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका होता है।
- निश्चित कार्यकाल।
- शक्तियों का पृथक्करण।
- राष्ट्रपति संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
- राष्ट्रपति को केवल महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है।
उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राज़ील, मेक्सिको।
संसदात्मक एवं अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में अंतर
| संसदात्मक शासन प्रणाली | अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली |
|---|---|
| 1. प्रधानमंत्री वास्तविक प्रमुख होता है। | 1. राष्ट्रपति वास्तविक प्रमुख होता है। |
| 2. राष्ट्रपति/राजा संवैधानिक प्रमुख होता है। | 2. राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष और सरकार का प्रमुख दोनों होता है। |
| 3. मंत्रिपरिषद संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। | 3. राष्ट्रपति संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। |
| 4. कार्यपालिका और विधायिका में घनिष्ठ संबंध होता है। | 4. दोनों के बीच शक्तियों का पृथक्करण होता है। |
| 5. सरकार बहुमत खोने पर गिर सकती है। | 5. राष्ट्रपति का कार्यकाल निश्चित होता है। |
| 6. मंत्री सामान्यतः संसद के सदस्य होते हैं। | 6. मंत्री सामान्यतः संसद के सदस्य नहीं होते। |
| 7. अविश्वास प्रस्ताव द्वारा सरकार हट सकती है। | 7. महाभियोग द्वारा ही राष्ट्रपति हटाया जा सकता है। |
| 8. राजनीतिक अस्थिरता की संभावना अधिक होती है। | 8. राजनीतिक स्थिरता अपेक्षाकृत अधिक होती है। |
संसदात्मक शासन प्रणाली के गुण
- उत्तरदायी सरकार।
- लोकतांत्रिक नियंत्रण।
- संसद और सरकार में समन्वय।
- जनता के प्रति जवाबदेही।
- शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन।
संसदात्मक शासन प्रणाली के दोष
- गठबंधन सरकारों में अस्थिरता।
- निर्णय लेने में विलंब।
- दलीय राजनीति का प्रभाव।
- प्रधानमंत्री पर अत्यधिक निर्भरता।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण
- मजबूत नेतृत्व।
- स्थिर सरकार।
- निश्चित कार्यकाल।
- त्वरित निर्णय।
- शक्तियों का स्पष्ट विभाजन।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दोष
- शक्ति का केंद्रीकरण।
- राष्ट्रपति और संसद में टकराव।
- राष्ट्रपति को हटाना कठिन।
- कार्यपालिका और विधायिका में समन्वय की कमी।
निष्कर्ष
संसदात्मक और अध्यक्षात्मक दोनों शासन प्रणालियाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण प्रणालियाँ हैं। संसदात्मक प्रणाली उत्तरदायित्व और जनप्रतिनिधित्व पर आधारित है, जबकि अध्यक्षात्मक प्रणाली स्थिरता, शक्तियों के पृथक्करण और मजबूत नेतृत्व पर बल देती है। किसी देश के लिए कौन-सी प्रणाली अधिक उपयुक्त होगी, यह उसकी ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
प्रश्न 3. एकात्मक शासन प्रणाली को परिभाषित करते हुए इसकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
एकात्मक शासन प्रणाली (Unitary System of Government) विश्व की प्रमुख शासन व्यवस्थाओं में से एक है। इस प्रणाली में सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं। स्थानीय या प्रांतीय सरकारें यदि होती भी हैं, तो वे केंद्रीय सरकार के अधीन कार्य करती हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य पूरे देश में एक समान प्रशासन, प्रभावी शासन तथा राष्ट्रीय एकता बनाए रखना है। ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और न्यूज़ीलैंड इस प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं।
एकात्मक शासन प्रणाली की परिभाषा
एकात्मक शासन प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें राज्य की सर्वोच्च सत्ता केंद्रीय सरकार में निहित होती है। स्थानीय सरकारों की शक्तियाँ संविधान से नहीं, बल्कि केंद्रीय सरकार से प्राप्त होती हैं। केंद्र आवश्यकता पड़ने पर इन शक्तियों में परिवर्तन या उन्हें समाप्त भी कर सकता है।
गार्नर (Garner) के अनुसार—
"एकात्मक शासन वह व्यवस्था है जिसमें राज्य की सर्वोच्च सत्ता एक ही केंद्रीय सरकार में निहित होती है।"
एकात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. शक्तियों का केंद्रीकरण
इस प्रणाली में सभी महत्वपूर्ण प्रशासनिक, विधायी और वित्तीय शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं।
2. एक ही सरकार
पूरे देश में एक ही सर्वोच्च सरकार होती है, जो राष्ट्रीय स्तर पर शासन करती है।
3. एक संविधान
सामान्यतः पूरे देश में एक ही संविधान लागू होता है, जिसके अनुसार शासन संचालित होता है।
4. प्रशासन में एकरूपता
देशभर में समान कानून, नीतियाँ और प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है, जिससे प्रशासन में समानता बनी रहती है।
5. स्थानीय सरकारें केंद्र के अधीन
नगरपालिका, पंचायत या प्रांतीय सरकारें स्वतंत्र नहीं होतीं। वे केंद्रीय सरकार द्वारा दिए गए अधिकारों के अनुसार कार्य करती हैं।
6. त्वरित निर्णय
चूँकि निर्णय लेने का अधिकार केंद्र के पास होता है, इसलिए नीतियाँ शीघ्र बनाई और लागू की जा सकती हैं।
7. राष्ट्रीय एकता
पूरे देश में समान कानून और प्रशासन होने से राष्ट्रीय एकता तथा अखंडता को बढ़ावा मिलता है।
8. कम प्रशासनिक खर्च
संघीय शासन की तुलना में इस प्रणाली में प्रशासनिक व्यय अपेक्षाकृत कम होता है।
एकात्मक शासन प्रणाली के गुण
- मजबूत और प्रभावी केंद्रीय सरकार।
- निर्णय लेने में तेजी।
- प्रशासन में एकरूपता।
- राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा।
- कम प्रशासनिक खर्च।
- संकट के समय त्वरित कार्रवाई।
एकात्मक शासन प्रणाली के दोष
- सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण।
- स्थानीय आवश्यकताओं की उपेक्षा।
- स्थानीय स्वायत्तता का अभाव।
- बड़े और विविध देशों के लिए कम उपयुक्त।
- निरंकुशता की संभावना बढ़ सकती है।
एकात्मक एवं संघीय शासन प्रणाली में अंतर
| एकात्मक शासन | संघीय शासन |
|---|---|
| सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्र में होती हैं। | शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच होता है। |
| एक ही प्रमुख सरकार होती है। | दो स्तर की सरकारें होती हैं। |
| स्थानीय सरकारें केंद्र के अधीन होती हैं। | राज्यों को संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते हैं। |
| छोटे देशों के लिए अधिक उपयुक्त। | बड़े एवं विविध देशों के लिए अधिक उपयुक्त। |
उदाहरण
- ब्रिटेन
- फ्रांस
- जापान
- न्यूज़ीलैंड
- श्रीलंका
निष्कर्ष
एकात्मक शासन प्रणाली में सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं। यह व्यवस्था प्रशासनिक एकरूपता, राष्ट्रीय एकता और त्वरित निर्णय लेने में सहायक होती है। यद्यपि इसमें स्थानीय स्वायत्तता की कमी और शक्ति के केंद्रीकरण जैसी सीमाएँ हैं, फिर भी छोटे और अपेक्षाकृत समान प्रकृति वाले देशों के लिए यह अत्यंत प्रभावी शासन प्रणाली मानी जाती है।
प्रश्न 4. ब्रिटिश संविधान की विशेषताओं का विस्तृत विवरण दीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
ब्रिटेन का संविधान विश्व का सबसे प्राचीन और विशिष्ट संविधान माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अलिखित (Unwritten) तथा विकसित (Evolved) संविधान है। यह किसी एक दस्तावेज़ में संकलित नहीं है, बल्कि कानूनों, न्यायालयों के निर्णयों, परंपराओं और संवैधानिक प्रथाओं पर आधारित है। ब्रिटिश संविधान ने भारत सहित अनेक देशों के संविधानों को प्रभावित किया है।
ब्रिटिश संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. अलिखित संविधान (Unwritten Constitution)
ब्रिटिश संविधान किसी एक लिखित दस्तावेज़ में नहीं है। यह संसद द्वारा बनाए गए कानूनों, न्यायालयों के निर्णयों, परंपराओं और संवैधानिक अभिसमयों (Conventions) का समुच्चय है।
2. विकसित संविधान (Evolved Constitution)
यह संविधान किसी संविधान सभा द्वारा एक समय में नहीं बनाया गया, बल्कि कई शताब्दियों में धीरे-धीरे विकसित हुआ है।
3. लचीला संविधान (Flexible Constitution)
ब्रिटिश संविधान में संशोधन सामान्य कानून की तरह संसद द्वारा साधारण बहुमत से किया जा सकता है। इसलिए इसे लचीला संविधान कहा जाता है।
4. संसदीय शासन प्रणाली
ब्रिटेन में संसदात्मक शासन प्रणाली लागू है। प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है, जबकि राजा या रानी संवैधानिक प्रमुख होते हैं।
5. संसदीय सर्वोच्चता (Parliamentary Sovereignty)
ब्रिटिश संसद को सर्वोच्च माना जाता है। संसद कोई भी कानून बना, बदल या समाप्त कर सकती है।
6. कानून का शासन (Rule of Law)
ब्रिटेन में कानून का शासन लागू है। सभी नागरिक और शासक कानून के समक्ष समान हैं। कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।
7. संवैधानिक राजतंत्र (Constitutional Monarchy)
ब्रिटेन में राजा या रानी राष्ट्राध्यक्ष होते हैं, लेकिन वे संविधान और परंपराओं के अनुसार कार्य करते हैं। वास्तविक शासन प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल द्वारा चलाया जाता है।
8. द्विसदनीय संसद (Bicameral Legislature)
ब्रिटिश संसद दो सदनों से मिलकर बनी है—
- हाउस ऑफ कॉमन्स (House of Commons) – निम्न सदन
- हाउस ऑफ लॉर्ड्स (House of Lords) – उच्च सदन
9. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या करती है तथा नागरिकों को न्याय प्रदान करती है।
10. लोकतांत्रिक परंपराएँ
ब्रिटिश संविधान का एक बड़ा भाग संवैधानिक परंपराओं (Constitutional Conventions) पर आधारित है, जिनका शासन में महत्वपूर्ण स्थान है।
ब्रिटिश संविधान के गुण
- समय के अनुसार परिवर्तन करने में सक्षम।
- लोकतांत्रिक शासन को बढ़ावा।
- प्रशासन में लचीलापन।
- राजनीतिक स्थिरता।
- संवैधानिक परंपराओं का सम्मान।
ब्रिटिश संविधान के दोष
- एक ही लिखित दस्तावेज़ का अभाव।
- संसद की अत्यधिक सर्वोच्चता।
- नागरिक अधिकारों का एक स्थान पर स्पष्ट उल्लेख नहीं।
- कई परंपराएँ लिखित न होने के कारण भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
निष्कर्ष
ब्रिटिश संविधान अपनी अलिखित, विकसित, लचीली और संसदीय प्रकृति के कारण विश्व के सबसे विशिष्ट संविधानों में गिना जाता है। इसकी लोकतांत्रिक परंपराएँ, कानून का शासन और संसदीय सर्वोच्चता अनेक देशों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही हैं। यद्यपि इसमें कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी यह आज भी प्रभावी और सफल संवैधानिक व्यवस्था का उत्कृष्ट उदाहरण है।
प्रश्न 5. अमेरिका के संविधान की प्रमुख विशेषताओं पर आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिए। (19 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) का संविधान विश्व का सबसे पुराना लिखित संविधान माना जाता है। इसे 17 सितम्बर 1787 को तैयार किया गया तथा 1789 से लागू किया गया। यह लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता और कानून के शासन के सिद्धांतों पर आधारित है। इसकी अनेक विशेषताओं ने विश्व के कई देशों के संविधानों को प्रभावित किया है। यद्यपि यह अत्यंत प्रभावशाली संविधान है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं।
अमेरिका के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. विश्व का सबसे पुराना लिखित संविधान
अमेरिकी संविधान आधुनिक युग का पहला लिखित संविधान है। इसकी संरचना स्पष्ट और व्यवस्थित है।
2. संघीय शासन व्यवस्था
अमेरिका में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। दोनों सरकारें संविधान द्वारा निर्धारित अधिकारों के अनुसार कार्य करती हैं।
3. कठोर संविधान
संविधान में संशोधन करना कठिन है। संशोधन के लिए विशेष संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।
4. शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
सरकार की शक्तियों को तीन भागों में विभाजित किया गया है—
- विधायिका (Congress)
- कार्यपालिका (President)
- न्यायपालिका (Supreme Court)
5. नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances)
सरकार की तीनों शाखाएँ एक-दूसरे पर नियंत्रण रखती हैं ताकि कोई भी संस्था अत्यधिक शक्तिशाली न बन सके।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक है। उसे न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की शक्ति प्राप्त है।
7. मौलिक अधिकार (Bill of Rights)
संविधान के प्रथम दस संशोधनों में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की गई है।
8. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली
राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष और सरकार का प्रमुख दोनों होता है। उसका कार्यकाल निश्चित (4 वर्ष) होता है।
9. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। सभी कानून और सरकारी कार्य संविधान के अनुसार ही होते हैं।
अमेरिका के संविधान की आलोचनात्मक समीक्षा
सकारात्मक पक्ष
- लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
- संघीय व्यवस्था के माध्यम से राज्यों को पर्याप्त अधिकार देता है।
- शक्तियों के पृथक्करण से निरंकुशता पर रोक लगती है।
- स्वतंत्र न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है।
- दो शताब्दियों से अधिक समय से सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है।
आलोचनाएँ (सीमाएँ)
1. कठोर संविधान
संविधान में संशोधन करना कठिन होने के कारण बदलती परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन में समय लगता है।
2. राष्ट्रपति और कांग्रेस में टकराव
कार्यपालिका और विधायिका अलग होने के कारण कई बार दोनों के बीच मतभेद हो जाते हैं, जिससे निर्णय लेने में देरी होती है।
3. इलेक्टोरल कॉलेज प्रणाली
राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष न होकर इलेक्टोरल कॉलेज के माध्यम से होता है। कभी-कभी कम लोकप्रिय मत पाने वाला उम्मीदवार भी राष्ट्रपति बन सकता है।
4. न्यायपालिका की व्यापक शक्तियाँ
कुछ विद्वानों का मत है कि सर्वोच्च न्यायालय के पास अत्यधिक शक्तियाँ हैं, जिससे वह कई बार नीति-निर्माण को भी प्रभावित करता है।
5. दो-दलीय व्यवस्था का प्रभाव
अमेरिका की राजनीति में दो प्रमुख दलों का प्रभुत्व है, जिससे छोटे राजनीतिक दलों को सीमित अवसर मिलते हैं।
निष्कर्ष
अमेरिकी संविधान विश्व के सबसे सफल और प्रभावशाली संविधानों में से एक है। इसकी संघीय व्यवस्था, शक्तियों का पृथक्करण, नियंत्रण एवं संतुलन तथा स्वतंत्र न्यायपालिका इसे विशेष बनाते हैं। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक शासन की दृष्टि से इसका महत्व अत्यंत अधिक है।
Section B
प्रश्न 1. संविधानवाद को परिभाषित करते हुए संविधानवाद के तत्वों को स्पष्ट कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संविधानवाद (Constitutionalism) आधुनिक लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला है। इसका अर्थ केवल संविधान का होना नहीं, बल्कि संविधान के अनुसार शासन चलाना और सरकार की शक्तियों को संविधान द्वारा सीमित रखना है। संविधानवाद का उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना, कानून का शासन स्थापित करना तथा सरकार को उत्तरदायी बनाना है।
संविधानवाद की परिभाषा
संविधानवाद वह सिद्धांत है जिसके अनुसार राज्य की शासन व्यवस्था संविधान के अनुसार संचालित होती है तथा सरकार की सभी शक्तियाँ संविधान द्वारा नियंत्रित और सीमित रहती हैं।
कार्ल जे. फ्रेडरिक (Carl J. Friedrich) के अनुसार—
"संविधानवाद का अर्थ सीमित सरकार (Limited Government) की स्थापना है।"
संविधानवाद के प्रमुख तत्व
1. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है। सरकार के सभी अंग—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—संविधान के अनुसार कार्य करते हैं।
2. कानून का शासन (Rule of Law)
सभी नागरिक और शासक कानून के समक्ष समान होते हैं। कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होता।
3. सीमित सरकार (Limited Government)
सरकार की शक्तियाँ संविधान द्वारा निर्धारित होती हैं। सरकार मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकती।
4. मौलिक अधिकारों की रक्षा
संविधानवाद नागरिकों के मौलिक अधिकारों जैसे—
- समानता का अधिकार
- स्वतंत्रता का अधिकार
- धार्मिक स्वतंत्रता
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
की रक्षा करता है।
5. शक्तियों का पृथक्करण
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का विभाजन किया जाता है ताकि किसी एक संस्था में अत्यधिक शक्ति केंद्रित न हो।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है तथा नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण करती है।
7. उत्तरदायी सरकार
सरकार जनता और संविधान के प्रति उत्तरदायी होती है तथा अपने कार्यों के लिए जवाबदेह रहती है।
8. लोकतांत्रिक शासन
स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, जनप्रतिनिधित्व तथा नागरिकों की भागीदारी संविधानवाद के महत्वपूर्ण तत्व हैं।
संविधानवाद का महत्व
- लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
- नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।
- सरकार की निरंकुशता पर रोक लगाता है।
- शासन में स्थिरता और पारदर्शिता लाता है।
- न्याय और समानता की स्थापना करता है।
निष्कर्ष
संविधानवाद लोकतांत्रिक शासन का मूल सिद्धांत है। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार संविधान के अनुसार कार्य करे और नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहें। संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, सीमित सरकार तथा स्वतंत्र न्यायपालिका इसके प्रमुख आधार हैं। इन तत्वों के कारण संविधानवाद किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
प्रश्न 2. अमेरिकी संविधान में उल्लिखित सरकार की तीन शाखाओं की शक्तियों और कार्यों की तुलना कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत अपनाया गया है। इसके अनुसार सरकार को तीन स्वतंत्र शाखाओं में बाँटा गया है—
- विधायिका (Legislature) – कांग्रेस (Congress)
- कार्यपालिका (Executive) – राष्ट्रपति (President)
- न्यायपालिका (Judiciary) – सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)
इन तीनों शाखाओं के अलग-अलग कार्य और शक्तियाँ हैं, साथ ही Checks and Balances (नियंत्रण एवं संतुलन) की व्यवस्था के कारण कोई भी शाखा अत्यधिक शक्तिशाली नहीं बन सकती।
1. विधायिका (Legislature – Congress)
प्रमुख कार्य एवं शक्तियाँ
- देश के लिए कानून बनाना।
- राष्ट्रीय बजट एवं करों को स्वीकृति देना।
- युद्ध की घोषणा करना।
- राष्ट्रपति के वीटो को विशेष बहुमत से निरस्त करना।
- राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया चलाना।
2. कार्यपालिका (Executive – President)
प्रमुख कार्य एवं शक्तियाँ
- कानूनों को लागू करना।
- सरकार और प्रशासन का संचालन करना।
- सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति होना।
- विदेश नीति का संचालन करना।
- मंत्रियों, राजदूतों और न्यायाधीशों की नियुक्ति करना (सीनेट की स्वीकृति से)।
- विधेयकों पर वीटो (Veto) का प्रयोग करना।
3. न्यायपालिका (Judiciary – Supreme Court)
प्रमुख कार्य एवं शक्तियाँ
- संविधान की व्याख्या करना।
- कानूनों की संवैधानिकता की जाँच करना (Judicial Review)।
- नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना।
- केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का समाधान करना।
- अंतिम न्यायिक निर्णय देना।
तीनों शाखाओं की तुलना
| विधायिका (Congress) | कार्यपालिका (President) | न्यायपालिका (Supreme Court) |
|---|---|---|
| कानून बनाती है | कानून लागू करती है | कानूनों की व्याख्या करती है |
| बजट एवं करों की स्वीकृति | प्रशासन का संचालन | संविधान की रक्षा |
| राष्ट्रपति पर नियंत्रण | वीटो शक्ति | न्यायिक पुनरावलोकन |
| महाभियोग की प्रक्रिया | सेना का सर्वोच्च सेनापति | अंतिम न्यायालय |
नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances)
- राष्ट्रपति विधेयकों पर वीटो लगा सकता है।
- कांग्रेस विशेष बहुमत से राष्ट्रपति के वीटो को निरस्त कर सकती है।
- सर्वोच्च न्यायालय किसी कानून या राष्ट्रपति के आदेश को असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
- सीनेट राष्ट्रपति की महत्वपूर्ण नियुक्तियों और संधियों को स्वीकृति देती है।
निष्कर्ष
अमेरिकी संविधान में सरकार की तीनों शाखाओं के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। इससे शासन में संतुलन बना रहता है और किसी एक संस्था में अत्यधिक शक्ति केंद्रित नहीं होती। यही व्यवस्था अमेरिकी लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।
प्रश्न 3. ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में दल की भूमिका की संक्षिप्त में व्याख्या कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
ब्रिटेन विश्व के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देशों में से एक है। वहाँ की संसदात्मक शासन प्रणाली (Parliamentary System) में राजनीतिक दल (Political Parties) अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक दल सरकार का गठन करते हैं, नीतियाँ बनाते हैं, जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा सरकार को उत्तरदायी बनाए रखते हैं। ब्रिटेन में मुख्य रूप से लेबर पार्टी (Labour Party) और कंजरवेटिव पार्टी (Conservative Party) प्रमुख राजनीतिक दल हैं।
ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों की भूमिका
1. सरकार का गठन
संसद के चुनाव में जिस दल को हाउस ऑफ कॉमन्स में बहुमत प्राप्त होता है, वही सरकार बनाता है। उस दल का नेता प्रधानमंत्री बनता है।
2. जनप्रतिनिधित्व
राजनीतिक दल जनता की समस्याओं और अपेक्षाओं को संसद तक पहुँचाते हैं तथा उनके हितों की रक्षा करने का प्रयास करते हैं।
3. नीति निर्माण
राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणा-पत्र (Manifesto) के आधार पर देश की आर्थिक, सामाजिक, शिक्षा, स्वास्थ्य और विदेश नीति का निर्माण करते हैं।
4. सरकार और संसद के बीच समन्वय
सत्तारूढ़ दल संसद में सरकार के विधेयकों को पारित कराने तथा नीतियों को लागू करने में सहायता करता है।
5. विपक्ष की भूमिका
जो दल सरकार नहीं बनाते, वे विपक्ष का कार्य करते हैं। विपक्ष सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, उसकी गलतियों को उजागर करता है और सरकार को उत्तरदायी बनाए रखता है।
6. राजनीतिक शिक्षा
राजनीतिक दल चुनाव प्रचार, जनसभाओं और विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से जनता को राजनीतिक मुद्दों के प्रति जागरूक करते हैं।
7. लोकतंत्र को मजबूत बनाना
राजनीतिक दल जनता और सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करते हैं तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाते हैं।
ब्रिटिश दलीय व्यवस्था की विशेषताएँ
- मुख्यतः द्विदलीय व्यवस्था (Two-Party System)।
- अनुशासित राजनीतिक दल।
- सशक्त विपक्ष।
- शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन।
- लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन।
निष्कर्ष
ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दल लोकतंत्र की सफलता का प्रमुख आधार हैं। वे सरकार का गठन करते हैं, जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, नीतियों का निर्माण करते हैं और सरकार पर प्रभावी नियंत्रण रखते हैं। इसलिए ब्रिटिश लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य मानी जाती है।
प्रश्न 4. तुलनात्मक राजनीति के विषय-क्षेत्र में विकास के चरणों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) राजनीति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। समय के साथ इसका विषय-क्षेत्र लगातार विकसित हुआ है। प्रारम्भ में इसका अध्ययन केवल संविधान और सरकारी संस्थाओं तक सीमित था, लेकिन आज इसमें राजनीतिक व्यवहार, राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक विकास तथा सार्वजनिक नीतियों का भी अध्ययन किया जाता है।
तुलनात्मक राजनीति के विकास के प्रमुख चरण
1. प्रारम्भिक चरण
इस चरण में यूनान के दार्शनिक प्लेटो और अरस्तू ने विभिन्न शासन प्रणालियों का अध्ययन और तुलना की। अरस्तू को तुलनात्मक राजनीति का जनक (Father of Comparative Politics) माना जाता है।
2. परम्परागत चरण
इस चरण में मुख्य रूप से—
- संविधान
- विधायिका
- कार्यपालिका
- न्यायपालिका
जैसी औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन किया गया। अध्ययन का आधार कानूनी और ऐतिहासिक दृष्टिकोण था।
3. व्यवहारवादी चरण (Behavioural Stage)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद राजनीति विज्ञान में व्यवहारवादी आंदोलन का विकास हुआ। इस चरण में राजनीतिक दलों, दबाव समूहों, मतदाताओं के व्यवहार तथा राजनीतिक संस्कृति का वैज्ञानिक अध्ययन प्रारम्भ हुआ।
4. उत्तर-व्यवहारवादी चरण (Post-Behavioural Stage)
इस चरण में केवल तथ्यों का अध्ययन ही नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान पर भी बल दिया गया। राजनीति विज्ञान को अधिक व्यावहारिक और समाजोपयोगी बनाने का प्रयास किया गया।
5. आधुनिक चरण
वर्तमान समय में तुलनात्मक राजनीति का विषय-क्षेत्र अत्यंत व्यापक हो गया है। इसमें निम्नलिखित विषयों का अध्ययन किया जाता है—
- राजनीतिक विकास
- राजनीतिक संस्कृति
- सार्वजनिक नीति
- वैश्वीकरण
- मानवाधिकार
- लोकतंत्रीकरण
- विकासशील देशों की राजनीति
विकास के प्रमुख कारण
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नए राष्ट्रों का उदय।
- व्यवहारवादी आंदोलन का प्रभाव।
- सामाजिक विज्ञानों का विकास।
- वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धतियों का उपयोग।
- वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विस्तार।
निष्कर्ष
तुलनात्मक राजनीति का विषय-क्षेत्र समय के साथ लगातार विस्तृत होता गया है। आज यह केवल संवैधानिक संस्थाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक व्यवहार, संस्कृति, विकास और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों का भी अध्ययन करता है। इसलिए आधुनिक राजनीति विज्ञान में इसका महत्व अत्यधिक बढ़ गया है।
प्रश्न 5. संघीय सरकार की संरचना और विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
संघीय सरकार (Federal Government) वह शासन व्यवस्था है जिसमें केंद्रीय सरकार (Central Government) तथा राज्य सरकारों (State Governments) के बीच शक्तियों का विभाजन संविधान द्वारा किया जाता है। दोनों सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं। भारत, अमेरिका, स्विट्ज़रलैण्ड, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया संघीय शासन प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं।
संघीय सरकार की संरचना
संघीय शासन में सामान्यतः दो स्तर की सरकारें होती हैं—
1. केंद्रीय सरकार (Central Government)
- पूरे देश से संबंधित विषयों का संचालन करती है।
- रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, संचार और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों का दायित्व निभाती है।
2. राज्य सरकारें (State Governments)
- राज्य या प्रांत से संबंधित विषयों का संचालन करती हैं।
- शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, स्थानीय प्रशासन तथा कानून-व्यवस्था जैसे विषयों का प्रबंधन करती हैं (देश के संविधान के अनुसार विषयों में अंतर हो सकता है)।
संघीय सरकार की प्रमुख विशेषताएँ
1. दोहरी शासन व्यवस्था
संघीय प्रणाली में केंद्र और राज्यों की अलग-अलग सरकारें होती हैं।
2. शक्तियों का विभाजन
संविधान के अनुसार केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया जाता है।
3. लिखित संविधान
संघीय देशों में सामान्यतः लिखित संविधान होता है, जिससे दोनों स्तर की सरकारों की शक्तियाँ स्पष्ट रहती हैं।
4. कठोर संविधान
संविधान में संशोधन के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है, ताकि केंद्र और राज्यों के अधिकार सुरक्षित रहें।
5. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है। केंद्र और राज्य दोनों उसी के अनुसार कार्य करते हैं।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
सर्वोच्च न्यायालय संविधान की रक्षा करता है तथा केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का समाधान करता है।
7. द्विसदनीय विधायिका
अधिकांश संघीय देशों में संसद के दो सदन होते हैं—
- निचला सदन – जनता का प्रतिनिधित्व करता है।
- ऊपरी सदन – राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है।
संघीय सरकार के लाभ
- स्थानीय स्वायत्तता को बढ़ावा।
- बड़े देशों के लिए उपयुक्त।
- लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।
- सत्ता का विकेंद्रीकरण।
- राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों में संतुलन।
निष्कर्ष
संघीय सरकार की व्यवस्था बड़े और विविधतापूर्ण देशों के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है। इसमें केंद्र और राज्य दोनों को संविधान द्वारा निर्धारित अधिकार प्राप्त होते हैं। इससे राष्ट्रीय एकता बनाए रखते हुए स्थानीय आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाता है। इसलिए संघीय शासन प्रणाली लोकतंत्र और सुशासन की प्रभावी व्यवस्था मानी जाती है।
प्रश्न 6. संविधान में उल्लिखित चीनी राजनीतिक व्यवस्था के सिद्धांतों और संरचना पर चर्चा कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
चीन (People's Republic of China) एक समाजवादी गणराज्य (Socialist Republic) है। इसका वर्तमान संविधान 4 दिसंबर 1982 को लागू हुआ। चीन की राजनीतिक व्यवस्था मार्क्सवाद-लेनिनवाद, माओत्से तुंग विचार तथा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party of China - CPC) के नेतृत्व पर आधारित है। संविधान में शासन की संरचना, नागरिकों के अधिकार एवं कर्तव्य तथा राज्य के मूल सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है।
चीनी राजनीतिक व्यवस्था के प्रमुख सिद्धांत
1. समाजवादी राज्य
संविधान के अनुसार चीन एक समाजवादी राज्य है, जिसका उद्देश्य समाजवाद को मजबूत करना और राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा देना है।
2. कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) देश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति है और शासन के सभी महत्वपूर्ण निर्णयों में उसकी केंद्रीय भूमिका होती है।
3. लोकतांत्रिक केंद्रीकरण (Democratic Centralism)
चीन की राजनीतिक व्यवस्था लोकतांत्रिक केंद्रीकरण के सिद्धांत पर आधारित है। निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं, लेकिन निर्णय होने के बाद सभी को उनका पालन करना होता है।
4. जनता की सर्वोच्चता
संविधान के अनुसार राज्य की शक्ति जनता में निहित है और जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन में भाग लेती है।
5. राष्ट्रीय एकता
संविधान सभी जातीय समूहों की समानता तथा राष्ट्रीय एकता पर बल देता है।
चीनी राजनीतिक व्यवस्था की संरचना
1. राष्ट्रीय जन कांग्रेस (National People's Congress - NPC)
- यह चीन की सर्वोच्च विधायिका है।
- कानून बनाना, संविधान में संशोधन करना तथा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय निर्णय लेना इसका प्रमुख कार्य है।
2. राष्ट्रपति (President)
- राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष होता है।
- वह देश का औपचारिक प्रतिनिधित्व करता है तथा संविधान के अनुसार अपने कार्य करता है।
3. राज्य परिषद (State Council)
- यह चीन की सर्वोच्च कार्यपालिका (Executive) है।
- इसका नेतृत्व प्रधानमंत्री (Premier) करते हैं।
- यह प्रशासन और सरकारी नीतियों को लागू करती है।
4. सर्वोच्च जन न्यायालय (Supreme People's Court)
- यह चीन का सर्वोच्च न्यायालय है।
- न्याय प्रदान करना और कानूनों की व्याख्या करना इसका मुख्य कार्य है।
5. स्थानीय सरकारें
चीन में प्रांत, स्वायत्त क्षेत्र तथा नगरपालिकाएँ हैं, जो केंद्रीय सरकार के अधीन कार्य करती हैं।
चीनी राजनीतिक व्यवस्था की विशेषताएँ
- एक-दलीय व्यवस्था।
- समाजवादी शासन।
- एकात्मक शासन प्रणाली।
- कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व।
- राष्ट्रीय जन कांग्रेस की प्रमुख भूमिका।
- लोकतांत्रिक केंद्रीकरण का सिद्धांत।
निष्कर्ष
चीनी राजनीतिक व्यवस्था समाजवादी विचारधारा और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व पर आधारित है। संविधान के अनुसार राष्ट्रीय जन कांग्रेस, राज्य परिषद, राष्ट्रपति तथा सर्वोच्च जन न्यायालय शासन के प्रमुख अंग हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक विकास सुनिश्चित करना है।
प्रश्न 7. सरकार के एकात्मक स्वरूप को परिभाषित कीजिए और इसकी तुलना संघीय प्रणालियों से कीजिए। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
विश्व में मुख्य रूप से दो प्रकार की शासन व्यवस्थाएँ प्रचलित हैं—एकात्मक शासन प्रणाली (Unitary System) तथा संघीय शासन प्रणाली (Federal System)। एकात्मक शासन में सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं, जबकि संघीय शासन में शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच संविधान द्वारा किया जाता है।
एकात्मक शासन प्रणाली की परिभाषा
एकात्मक शासन प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें राज्य की सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार में निहित होती हैं। स्थानीय या प्रांतीय सरकारें यदि होती भी हैं, तो वे केंद्रीय सरकार के अधीन कार्य करती हैं।
उदाहरण: ब्रिटेन, फ्रांस, जापान।
एकात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
- सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के पास होती हैं।
- पूरे देश में एक समान प्रशासन और कानून लागू होते हैं।
- स्थानीय सरकारें केंद्र के अधीन कार्य करती हैं।
- निर्णय लेने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल और तेज होती है।
- राष्ट्रीय एकता और प्रशासनिक एकरूपता को बढ़ावा मिलता है।
एकात्मक एवं संघीय शासन प्रणाली की तुलना
| एकात्मक शासन प्रणाली | संघीय शासन प्रणाली |
|---|---|
| 1. सभी शक्तियाँ केंद्र के पास होती हैं। | 1. शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच होता है। |
| 2. एक ही प्रमुख सरकार होती है। | 2. दो स्तर की सरकारें होती हैं। |
| 3. स्थानीय सरकारें केंद्र के अधीन होती हैं। | 3. राज्यों को संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते हैं। |
| 4. संविधान लचीला या कठोर दोनों हो सकता है। | 4. सामान्यतः लिखित एवं कठोर संविधान होता है। |
| 5. छोटे देशों के लिए अधिक उपयुक्त। | 5. बड़े और विविध देशों के लिए अधिक उपयुक्त। |
| 6. प्रशासन में अधिक एकरूपता होती है। | 6. स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार प्रशासन संभव होता है। |
एकात्मक शासन प्रणाली के गुण
- मजबूत केंद्रीय सरकार।
- त्वरित निर्णय।
- प्रशासन में सरलता।
- कम प्रशासनिक खर्च।
- राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा।
एकात्मक शासन प्रणाली के दोष
- सत्ता का केंद्रीकरण।
- स्थानीय स्वायत्तता का अभाव।
- स्थानीय समस्याओं की उपेक्षा।
- बड़े देशों के लिए कम उपयुक्त।
निष्कर्ष
एकात्मक शासन प्रणाली में केंद्रीय सरकार सबसे शक्तिशाली होती है और पूरे देश की शासन व्यवस्था का संचालन करती है। इसके विपरीत, संघीय शासन प्रणाली में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन होता है। दोनों प्रणालियों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं, और किसी देश के लिए उपयुक्त व्यवस्था उसकी भौगोलिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
प्रश्न 8. स्विस शासन में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की भूमिका का विश्लेषण करें। (8 अंक)
उत्तर
प्रस्तावना
स्विट्ज़रलैण्ड (Switzerland) विश्व का ऐसा देश है जहाँ प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) सबसे सफल रूप में लागू है। यहाँ नागरिक केवल अपने प्रतिनिधियों का चुनाव ही नहीं करते, बल्कि कानून निर्माण और संविधान संशोधन जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भी सीधे भाग लेते हैं। यही कारण है कि स्विस लोकतंत्र को विश्व का आदर्श लोकतंत्र माना जाता है।
प्रत्यक्ष लोकतंत्र का अर्थ
प्रत्यक्ष लोकतंत्र वह शासन व्यवस्था है जिसमें जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से नहीं, बल्कि सीधे शासन संबंधी निर्णयों में भाग लेती है।
स्विट्ज़रलैण्ड में प्रत्यक्ष लोकतंत्र के मुख्य साधन हैं—
- जनमत संग्रह (Referendum)
- जन पहल (Popular Initiative)
स्विस शासन में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की भूमिका
1. जनमत संग्रह (Referendum)
स्विट्ज़रलैण्ड में महत्वपूर्ण कानूनों तथा संविधान संशोधन को जनता की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता है। यदि जनता बहुमत से समर्थन देती है, तभी वे लागू होते हैं।
2. जन पहल (Popular Initiative)
यदि नागरिक संविधान में संशोधन चाहते हैं, तो वे निर्धारित संख्या में हस्ताक्षर एकत्र करके संशोधन का प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके बाद उस पर जनमत कराया जाता है।
3. जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी
नागरिक शासन और नीति निर्माण में सीधे भाग लेते हैं, जिससे लोकतंत्र अधिक मजबूत बनता है।
4. सरकार की जवाबदेही
सरकार जनता की इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य रहती है, क्योंकि महत्वपूर्ण निर्णयों पर जनता की स्वीकृति आवश्यक होती है।
5. लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा
प्रत्यक्ष लोकतंत्र नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता, उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक भावना को विकसित करता है।
6. राष्ट्रीय एकता
जनता की भागीदारी से सरकार के निर्णयों को व्यापक स्वीकार्यता मिलती है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है।
प्रत्यक्ष लोकतंत्र के लाभ
- जनता की सीधी भागीदारी।
- सरकार की जवाबदेही बढ़ती है।
- लोकतंत्र मजबूत होता है।
- निर्णयों की वैधता बढ़ती है।
- नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता विकसित होती है।
प्रत्यक्ष लोकतंत्र की सीमाएँ
- निर्णय प्रक्रिया में अधिक समय लग सकता है।
- बार-बार मतदान कराने में अधिक खर्च होता है।
- जटिल विषयों पर सभी मतदाताओं के लिए सही निर्णय लेना कठिन हो सकता है।
- बड़े देशों में इसे लागू करना कठिन होता है।
निष्कर्ष
स्विट्ज़रलैण्ड की प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था विश्व के लिए एक आदर्श मानी जाती है। जनमत संग्रह और जन पहल जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से नागरिक शासन में सक्रिय भाग लेते हैं। इससे लोकतंत्र अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और जनहितकारी बनता है। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी स्विट्ज़रलैण्ड में यह व्यवस्था अत्यंत सफल सिद्ध हुई है।




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