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इकाई–1 : तुलनात्मक राजनीति : महत्व, अर्थ एवं क्षेत्र
प्रश्न 1. तुलनात्मक राजनीति के अर्थ एवं प्रकृति की विवेचना कीजिये।
प्रस्तावना
राजनीति विज्ञान के विकास के साथ-साथ विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं, संस्थाओं तथा राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन महत्वपूर्ण हो गया। इसी अध्ययन को तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) कहा जाता है। तुलनात्मक राजनीति आधुनिक राजनीति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं की समानताओं और असमानताओं का अध्ययन करती है।
तुलनात्मक राजनीति का अर्थ
तुलनात्मक राजनीति वह अध्ययन है जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक संस्थाओं, प्रक्रियाओं, व्यवस्थाओं और राजनीतिक व्यवहारों की तुलना की जाती है ताकि उनके बीच समानताओं और भिन्नताओं को समझा जा सके।
प्रमुख परिभाषाएँ
जी. के. रॉबर्ट्स के अनुसार:
तुलनात्मक राजनीति एक व्यापक विषय है, जिसके अंतर्गत विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं और उनके व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
माइकल कर्टिस के अनुसार:
तुलनात्मक राजनीति का संबंध राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक व्यवहार में पाई जाने वाली समानताओं एवं असमानताओं के अध्ययन से है।
तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति
तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है:
1. तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित
यह विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना करती है।
2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति तथ्यों, आंकड़ों और वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित होती है।
3. राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन
यह केवल संस्थाओं का ही नहीं बल्कि राजनीतिक व्यवहार, राजनीतिक संस्कृति और राजनीतिक प्रक्रियाओं का भी अध्ययन करती है।
4. व्यापक विषय
इसका क्षेत्र केवल सरकार तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीतिक दल, दबाव समूह, चुनाव, राजनीतिक संस्कृति आदि भी इसमें शामिल हैं।
5. गतिशील प्रकृति
समय और परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक व्यवस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन भी किया जाता है।
6. अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण
यह विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का वैश्विक स्तर पर अध्ययन करती है।
तुलनात्मक राजनीति का महत्व
1. विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं को समझने में सहायता
2. राजनीतिक व्यवहार का विश्लेषण
3. राजनीतिक सिद्धांतों के निर्माण में सहायता
4. राजनीतिक संस्थाओं की सफलता एवं असफलता का अध्ययन
5. राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करना
6. लोकतंत्र एवं शासन प्रणालियों को बेहतर समझना
तुलनात्मक राजनीति राजनीतिक व्यवहार को समझने, सिद्धांत निर्माण करने तथा राजनीति विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक बनाने में सहायक होती है।
तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र
तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन क्षेत्र में निम्न विषय शामिल हैं—
- राजनीतिक व्यवस्था
- राजनीतिक संस्थाएँ
- संविधान
- राजनीतिक दल
- दबाव समूह
- चुनाव प्रणाली
- राजनीतिक संस्कृति
- राजनीतिक विकास
- राजनीतिक आधुनिकीकरण
- राजनीतिक समाजीकरण
निष्कर्ष
तुलनात्मक राजनीति राजनीति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं, संस्थाओं और व्यवहारों का तुलनात्मक अध्ययन करती है। इसका उद्देश्य राजनीतिक घटनाओं को वैज्ञानिक ढंग से समझना तथा सामान्य सिद्धांतों का विकास करना है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में इसका विशेष महत्व है क्योंकि यह राजनीतिक व्यवस्थाओं की वास्तविकताओं को समझने का प्रभावी माध्यम प्रदान करती है।
इकाई–2 : तुलनात्मक राजनीति का स्वरूप : परम्परागत और आधुनिक
प्रश्न 1. परम्परागत तुलनात्मक राजनीति की विशेषताओं की विवेचना कीजिये।
प्रस्तावना
तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन का प्रारम्भ प्राचीन काल से माना जाता है। प्रारम्भिक विद्वानों जैसे अरस्तू, मैक्यावेली और मॉन्टेस्क्यू ने विभिन्न शासन व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया। इस अध्ययन पद्धति को परम्परागत तुलनात्मक राजनीति कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से राज्य, सरकार, संविधान तथा राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन किया जाता था।
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति का अर्थ
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति वह अध्ययन पद्धति है जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक संस्थाओं, संविधानों और शासन व्यवस्थाओं का औपचारिक एवं कानूनी आधार पर तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति की प्रमुख विशेषताएँ
1. संस्थागत अध्ययन पर बल
इस पद्धति में राजनीतिक संस्थाओं जैसे—
- राज्य
- सरकार
- संसद
- न्यायपालिका
- संविधान
का अध्ययन किया जाता था।
2. कानूनी दृष्टिकोण
राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन मुख्यतः संवैधानिक और कानूनी आधार पर किया जाता था।
3. वर्णनात्मक स्वरूप
इसमें राजनीतिक संस्थाओं का केवल वर्णन किया जाता था, उनका व्यवहारिक विश्लेषण नहीं किया जाता था।
4. आदर्शवादी दृष्टिकोण
परम्परागत विद्वान आदर्श शासन व्यवस्था की खोज पर अधिक बल देते थे।
5. राजनीतिक व्यवहार की उपेक्षा
जनता, राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और राजनीतिक संस्कृति के अध्ययन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता था।
6. राज्य केन्द्रित अध्ययन
राज्य को राजनीतिक अध्ययन का मुख्य विषय माना जाता था।
7. ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग
राजनीतिक संस्थाओं के विकास को समझने के लिए ऐतिहासिक घटनाओं का अध्ययन किया जाता था।
8. सीमित अध्ययन क्षेत्र
अध्ययन मुख्यतः पश्चिमी देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं तक सीमित था।
9. तुलनात्मकता का अभाव
यद्यपि इसे तुलनात्मक राजनीति कहा जाता था, फिर भी वास्तविक तुलना अपेक्षाकृत कम की जाती थी।
10. वैज्ञानिकता का अभाव
तथ्यों, आंकड़ों और वैज्ञानिक शोध विधियों का प्रयोग बहुत कम किया जाता था।
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति के गुण
1. राजनीतिक संस्थाओं की जानकारी प्रदान करती है।
2. संवैधानिक विकास को समझने में सहायक है।
3. शासन व्यवस्थाओं के ऐतिहासिक अध्ययन में उपयोगी है।
4. आधुनिक तुलनात्मक राजनीति की आधारशिला है।
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति की सीमाएँ
1. राजनीतिक व्यवहार की उपेक्षा
2. गैर-राजनीतिक कारकों की अनदेखी
3. वैज्ञानिक अध्ययन का अभाव
4. केवल औपचारिक संस्थाओं पर ध्यान
5. पश्चिमी देशों तक सीमित दृष्टिकोण
निष्कर्ष
परम्परागत तुलनात्मक राजनीति राजनीतिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्थाओं के अध्ययन पर आधारित थी। यद्यपि इसमें वैज्ञानिकता और व्यवहारिक विश्लेषण का अभाव था, फिर भी इसने तुलनात्मक राजनीति के विकास की मजबूत नींव रखी। आधुनिक तुलनात्मक राजनीति का विकास इसी परम्परागत अध्ययन पद्धति के आधार पर हुआ।
प्रश्न 2. तुलनात्मक राजनीति के आधुनिक उपागम की विशेषताओं की विवेचना कीजिये।
प्रस्तावना
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। परम्परागत दृष्टिकोण की सीमाओं को दूर करने के लिए आधुनिक उपागम (Modern Approach) का विकास हुआ। इस उपागम ने राजनीतिक संस्थाओं के साथ-साथ राजनीतिक व्यवहार, राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक विकास तथा सामाजिक एवं आर्थिक कारकों के अध्ययन पर भी बल दिया।
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति का अर्थ
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति वह अध्ययन पद्धति है जिसमें विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं, राजनीतिक प्रक्रियाओं, राजनीतिक व्यवहारों तथा सामाजिक-आर्थिक कारकों का वैज्ञानिक और तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति की प्रमुख विशेषताएँ
1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक उपागम तथ्यों, आंकड़ों, सर्वेक्षणों तथा वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धतियों पर आधारित है।
2. राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन
इसमें केवल संस्थाओं का नहीं बल्कि व्यक्तियों और समूहों के राजनीतिक व्यवहार का भी अध्ययन किया जाता है।
उदाहरण
- मतदान व्यवहार
- राजनीतिक भागीदारी
- नेतृत्व व्यवहार
3. व्यापक अध्ययन क्षेत्र
इसका क्षेत्र बहुत विस्तृत है।
अध्ययन विषय
- राजनीतिक संस्कृति
- राजनीतिक विकास
- राजनीतिक समाजीकरण
- दबाव समूह
- राजनीतिक दल
आदि।
4. अंतःविषय (Interdisciplinary) दृष्टिकोण
यह समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र और मानवशास्त्र से भी सहायता लेता है।
5. तुलनात्मक विश्लेषण पर बल
विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं की व्यवस्थित तुलना की जाती है।
6. विकासशील देशों का अध्ययन
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है बल्कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों का भी अध्ययन करती है।
7. वास्तविकता पर आधारित अध्ययन
यह आदर्शवादी दृष्टिकोण के बजाय वास्तविक राजनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन करती है।
8. राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन
डेविड ईस्टन आदि विद्वानों ने राजनीतिक व्यवस्था (Political System) को अध्ययन का प्रमुख विषय बनाया।
9. परिमाणात्मक तकनीकों का प्रयोग
सांख्यिकीय विश्लेषण, सर्वेक्षण और शोध विधियों का उपयोग किया जाता है।
10. सिद्धांत निर्माण पर बल
राजनीतिक घटनाओं को समझकर सामान्य सिद्धांत विकसित करने का प्रयास किया जाता है।
आधुनिक उपागम के प्रमुख विद्वान
1. डेविड ईस्टन
2. गैब्रियल आल्मंड
3. सिडनी वर्बा
4. ल्यूसियन पाई
5. कार्ल ड्यूश
इन विद्वानों ने आधुनिक तुलनात्मक राजनीति को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया।
आधुनिक उपागम के गुण
1. वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ अध्ययन
2. राजनीतिक व्यवहार की व्याख्या
3. व्यापक अध्ययन क्षेत्र
4. राजनीतिक विकास को समझने में सहायक
5. सिद्धांत निर्माण में उपयोगी
आधुनिक उपागम की सीमाएँ
1. अत्यधिक वैज्ञानिकता पर बल
2. मूल्य एवं नैतिकता की उपेक्षा
3. जटिल अनुसंधान पद्धतियाँ
4. सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं
निष्कर्ष
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति ने राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक और व्यवहारिक आधार प्रदान किया। इसने राजनीतिक संस्थाओं के साथ-साथ राजनीतिक व्यवहार, संस्कृति और विकास का अध्ययन करके तुलनात्मक राजनीति के क्षेत्र को अत्यंत व्यापक बना दिया। आज आधुनिक उपागम तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन की सबसे प्रभावशाली पद्धति माना जाता है।
इकाई–3 : संविधान एवं संवैधानिक सरकार
प्रश्न 1. संविधानवाद का अर्थ एवं परिभाषा बतलाते हुए संविधानों के वर्गीकरण को स्पष्ट करें।
प्रस्तावना
आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में संविधान और संविधानवाद का विशेष महत्व है। संविधान राज्य की मूल संरचना, शासन संस्थाओं और नागरिकों के अधिकारों का निर्धारण करता है, जबकि संविधानवाद शासन शक्ति को सीमित करके नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
संविधानवाद का अर्थ
संविधानवाद (Constitutionalism) का अर्थ ऐसी शासन व्यवस्था से है जिसमें सरकार संविधान के अनुसार कार्य करती है तथा उसकी शक्तियाँ सीमित और नियंत्रित रहती हैं।
संविधानवाद का मूल उद्देश्य निरंकुश शासन को रोकना तथा कानून के शासन (Rule of Law) की स्थापना करना है।
संविधानवाद की परिभाषाएँ
पिनॉक एवं स्मिथ के अनुसार –
संविधानवाद उन विचारों और सिद्धांतों की व्यवस्था है जो राजनीतिक शक्ति पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करती है।
कार्टर एवं हर्ज के अनुसार –
संविधानवाद का तात्पर्य सरकार की सीमित शक्तियों और उत्तरदायित्वपूर्ण शासन से है।
संविधानवाद के प्रमुख तत्व
1. सीमित सरकार
सरकार की शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित होती हैं।
2. विधि का शासन
देश में कानून सर्वोच्च होता है।
3. मौलिक अधिकारों की सुरक्षा
नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जाती है।
4. शक्तियों का विभाजन
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति विभाजन होता है।
5. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है।
संविधानों का वर्गीकरण
1. लिखित एवं अलिखित संविधान
(क) लिखित संविधान
जिस संविधान के नियम एक लिखित दस्तावेज़ में संकलित होते हैं।
उदाहरण: भारत, अमेरिका।
(ख) अलिखित संविधान
जिसके नियम विभिन्न परंपराओं, रीति-रिवाजों और कानूनों में बिखरे होते हैं।
उदाहरण: ब्रिटेन।
2. कठोर एवं लचीला संविधान
(क) कठोर संविधान
जिसमें संशोधन करना कठिन होता है।
उदाहरण: अमेरिका।
(ख) लचीला संविधान
जिसमें संशोधन अपेक्षाकृत सरल होता है।
उदाहरण: ब्रिटेन।
3. विकसित एवं निर्मित संविधान
(क) विकसित संविधान
जो धीरे-धीरे ऐतिहासिक विकास के फलस्वरूप विकसित होता है।
उदाहरण: ब्रिटेन।
(ख) निर्मित संविधान
जो किसी संविधान सभा द्वारा निर्मित किया जाता है।
उदाहरण: भारत।
4. संघात्मक एवं एकात्मक संविधान
(क) संघात्मक संविधान
जिसमें शक्तियाँ केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित होती हैं।
उदाहरण: भारत, अमेरिका।
(ख) एकात्मक संविधान
जिसमें संपूर्ण शक्ति केंद्र के पास होती है।
उदाहरण: ब्रिटेन।
निष्कर्ष
संविधानवाद लोकतांत्रिक शासन का आधार है, जो सरकार को संविधान के अधीन रखता है। विभिन्न देशों के संविधान उनकी आवश्यकताओं और ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं, किन्तु उनका उद्देश्य सुशासन और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना होता है।
प्रश्न 2. संविधान की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए संविधान के विकास की व्याख्या करें।
प्रस्तावना
संविधान किसी भी राज्य का मूल कानून होता है। यह शासन व्यवस्था का ढाँचा निर्धारित करता है तथा सरकार और नागरिकों के बीच संबंधों को नियंत्रित करता है। संविधान के बिना संगठित और स्थिर शासन की कल्पना नहीं की जा सकती।
संविधान की आवश्यकता
1. शासन व्यवस्था का आधार
संविधान सरकार की संरचना और कार्यों का निर्धारण करता है।
2. नागरिक अधिकारों की सुरक्षा
मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है।
3. शक्तियों का वितरण
सरकारी अंगों के बीच शक्तियों का विभाजन करता है।
4. राजनीतिक स्थिरता
शासन में स्थिरता और निरंतरता बनाए रखता है।
5. कानून के शासन की स्थापना
सभी व्यक्तियों को कानून के अधीन रखता है।
6. लोकतंत्र की रक्षा
जनता के अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करता है।
संविधान का विकास
1. प्राचीन काल
प्राचीन यूनान और रोम में संवैधानिक विचारों का प्रारंभ हुआ।
अरस्तू का योगदान
अरस्तू ने विभिन्न संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया।
2. मध्यकाल
राजाओं की निरंकुशता के विरुद्ध संवैधानिक नियंत्रण की मांग उठी।
मैग्नाकार्टा (1215)
इंग्लैंड के राजा की शक्तियों पर पहली बार नियंत्रण स्थापित किया गया।
3. आधुनिक काल
गौरवपूर्ण क्रांति (1688)
ब्रिटेन में संसदीय सर्वोच्चता स्थापित हुई।
अमेरिकी संविधान (1787)
विश्व का पहला लिखित संविधान बना।
फ्रांसीसी क्रांति (1789)
स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को बढ़ावा मिला।
4. समकालीन काल
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अनेक देशों ने लोकतांत्रिक संविधान अपनाए।
भारत का संविधान
26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान बना।
निष्कर्ष
संविधान राज्य की राजनीतिक व्यवस्था की आधारशिला है। इसका विकास एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। आधुनिक लोकतंत्र में संविधान नागरिक अधिकारों, शासन व्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता का प्रमुख आधार है।
प्रश्न 3. संवैधानिक सरकार व संविधानवाद की व्याख्या करें।
प्रस्तावना
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में संवैधानिक सरकार और संविधानवाद दो अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। दोनों का उद्देश्य शासन शक्ति को नियंत्रित करना और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करना है।
संवैधानिक सरकार का अर्थ
संवैधानिक सरकार वह सरकार है जो संविधान के अनुसार कार्य करती है तथा जिसकी शक्तियाँ संविधान द्वारा निर्धारित और सीमित होती हैं।
ऐसी सरकार मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकती।
संवैधानिक सरकार की विशेषताएँ
1. संविधान की सर्वोच्चता
2. सीमित सरकार
3. विधि का शासन
4. नागरिक अधिकारों की सुरक्षा
5. उत्तरदायी शासन
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
संविधानवाद का अर्थ
संविधानवाद एक राजनीतिक सिद्धांत है जो सरकार की शक्तियों को सीमित करके नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।
संविधानवाद की विशेषताएँ
1. शक्ति पर नियंत्रण
2. कानून की सर्वोच्चता
3. लोकतांत्रिक शासन
4. मानव अधिकारों की सुरक्षा
5. शक्तियों का पृथक्करण
संवैधानिक सरकार और संविधानवाद का संबंध
- संवैधानिक सरकार संविधानवाद का व्यावहारिक रूप है।
- संविधानवाद सिद्धांत है, जबकि संवैधानिक सरकार उसका व्यवहारिक क्रियान्वयन है।
- दोनों का उद्देश्य निरंकुशता को रोकना और लोकतंत्र की रक्षा करना है।
निष्कर्ष
संवैधानिक सरकार और संविधानवाद आधुनिक लोकतंत्र की आधारशिला हैं। ये शासन को कानून के अधीन रखते हैं, नागरिक अधिकारों की रक्षा करते हैं तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाते हैं।
इकाई–4 : संविधानवाद – पाश्चात्य एवं मार्क्सवादी दृष्टिकोण
प्रश्न 1. संवैधानिक सरकार व संविधानवाद की व्याख्या करें।
प्रस्तावना
आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का आधार संविधान और संविधानवाद है। संविधान शासन की संरचना और शक्तियों को निर्धारित करता है, जबकि संविधानवाद उन सिद्धांतों का समूह है जो शासन शक्ति को सीमित करके नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करता है।
संवैधानिक सरकार का अर्थ
संवैधानिक सरकार वह सरकार है जो संविधान के अनुसार कार्य करती है और जिसकी शक्तियाँ संविधान द्वारा नियंत्रित एवं सीमित होती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ
- संविधान की सर्वोच्चता
- विधि का शासन
- सीमित सरकार
- नागरिक अधिकारों की सुरक्षा
- स्वतंत्र न्यायपालिका
- उत्तरदायी शासन
संविधानवाद का अर्थ
संविधानवाद वह राजनीतिक सिद्धांत है जो यह मानता है कि सरकार की शक्तियाँ सीमित होनी चाहिए तथा शासन संविधान के अनुसार चलना चाहिए।
संविधानवाद के उद्देश्य
1. निरंकुश शासन पर नियंत्रण
2. नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा
3. लोकतंत्र की स्थापना
4. विधि के शासन को बढ़ावा
5. सत्ता के दुरुपयोग को रोकना
संवैधानिक सरकार और संविधानवाद का संबंध
- संवैधानिक सरकार संविधानवाद का व्यावहारिक स्वरूप है।
- संविधानवाद सिद्धांत है जबकि संवैधानिक सरकार उसका अनुप्रयोग है।
- दोनों का लक्ष्य नागरिक अधिकारों की रक्षा करना है।
निष्कर्ष
संवैधानिक सरकार और संविधानवाद आधुनिक लोकतंत्र के मूल आधार हैं। इनके माध्यम से शासन को सीमित एवं उत्तरदायी बनाया जाता है तथा नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा की जाती है।
प्रश्न 2. संविधानवाद का अर्थ एवं परिभाषा बतलाते हुए संविधानवाद की अवधारणाएँ बतलाइये।
प्रस्तावना
संविधानवाद लोकतांत्रिक शासन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका उद्देश्य राजनीतिक शक्ति को नियंत्रित करना तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है।
संविधानवाद का अर्थ
संविधानवाद का आशय ऐसी व्यवस्था से है जिसमें सरकार संविधान के अधीन कार्य करती है और उसकी शक्तियाँ सीमित रहती हैं।
प्रमुख परिभाषाएँ
पिनॉक एवं स्मिथ के अनुसार
संविधानवाद राजनीतिक शक्ति पर प्रभावी नियंत्रण की व्यवस्था है।
कार्ल फ्रेडरिक के अनुसार
संविधानवाद शक्ति विभाजन और सीमित सरकार का सिद्धांत है।
संविधानवाद की प्रमुख अवधारणाएँ
1. सीमित सरकार की अवधारणा
सरकार की शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित होती हैं।
2. कानून की सर्वोच्चता
देश में संविधान और कानून सर्वोच्च होते हैं।
3. शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग-अलग शक्तियाँ दी जाती हैं।
4. नागरिक अधिकारों की सुरक्षा
मौलिक अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण दिया जाता है।
5. जनसहमति की अवधारणा
सरकार जनता की सहमति और समर्थन पर आधारित होती है।
6. उत्तरदायित्व की अवधारणा
सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है।
7. न्यायिक पुनरावलोकन
न्यायपालिका संविधान के विरुद्ध बनाए गए कानूनों को निरस्त कर सकती है।
निष्कर्ष
संविधानवाद लोकतांत्रिक शासन की आत्मा है। इसकी विभिन्न अवधारणाएँ शासन को उत्तरदायी, सीमित तथा जनहितकारी बनाने में सहायता करती हैं।
प्रश्न 3. संविधानवाद की परिभाषा देते हुए संविधानवाद के तत्वों को स्पष्ट करें।
प्रस्तावना
संविधानवाद आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है। इसका उद्देश्य राजनीतिक शक्ति को नियंत्रित करना और नागरिकों की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना है।
संविधानवाद की परिभाषा
संविधानवाद ऐसी व्यवस्था है जिसमें शासन संविधान द्वारा संचालित होता है तथा सरकारी शक्तियों पर प्रभावी नियंत्रण रहता है।
संविधानवाद के प्रमुख तत्व
1. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान राज्य का सर्वोच्च कानून होता है।
2. सीमित सरकार
सरकार संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर कार्य करती है।
3. विधि का शासन (Rule of Law)
सभी नागरिक और शासक कानून के अधीन होते हैं।
4. मौलिक अधिकार
नागरिकों के अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होता है।
5. शक्तियों का पृथक्करण
सरकारी अंगों के बीच शक्तियों का विभाजन किया जाता है।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका संविधान की संरक्षक होती है।
7. लोकतांत्रिक शासन
जनता शासन की अंतिम स्रोत मानी जाती है।
8. उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता
सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है।
निष्कर्ष
संविधानवाद के तत्व लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं तथा नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करते हैं।
प्रश्न 4. संविधानवाद की परिभाषा दीजिए एवं संविधानवाद की विशेषताएँ बताइये।
प्रस्तावना
संविधानवाद लोकतांत्रिक शासन का आधारभूत सिद्धांत है। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार संविधान के अनुसार कार्य करे और उसकी शक्तियाँ नियंत्रित रहें।
संविधानवाद की परिभाषा
संविधानवाद वह सिद्धांत है जिसके अनुसार शासन संविधान के अधीन रहता है तथा सरकारी शक्तियों पर कानूनी नियंत्रण स्थापित किया जाता है।
संविधानवाद की प्रमुख विशेषताएँ
1. संविधान की सर्वोच्चता
संविधान राज्य का सर्वोच्च कानून होता है।
2. सीमित शासन
सरकार की शक्तियाँ सीमित होती हैं।
3. कानून का शासन
कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है।
4. नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा
व्यक्ति के अधिकारों को संरक्षण प्रदान किया जाता है।
5. शक्तियों का पृथक्करण
सत्ता के केंद्रीकरण को रोका जाता है।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है।
7. उत्तरदायी सरकार
सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है।
8. लोकतांत्रिक मूल्य
स्वतंत्रता, समानता और न्याय को बढ़ावा दिया जाता है।
9. निरंकुशता का विरोध
शासन को मनमानी करने से रोका जाता है।
10. राजनीतिक स्थिरता
देश में स्थिर एवं व्यवस्थित शासन स्थापित होता है।
निष्कर्ष
संविधानवाद आधुनिक लोकतंत्र का मूल आधार है। इसकी विशेषताएँ शासन को उत्तरदायी, सीमित और जनकल्याणकारी बनाती हैं तथा नागरिक अधिकारों की प्रभावी रक्षा सुनिश्चित करती हैं।
इकाई–5 : संसदात्मक शासन प्रणाली
प्रश्न 1. संसदात्मक शासन प्रणाली को स्पष्ट करते हुए इसके गुण-दोषों को स्पष्ट कीजिए।
प्रस्तावना
संसदात्मक शासन प्रणाली (Parliamentary System of Government) आधुनिक लोकतांत्रिक शासन की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है। इस प्रणाली में कार्यपालिका अपनी वैधता और अस्तित्व के लिए विधायिका पर निर्भर रहती है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। ब्रिटेन इस प्रणाली का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है, जबकि भारत ने भी इसी प्रणाली को अपनाया है।
संसदात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
संसदात्मक शासन प्रणाली वह शासन व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका और विधायिका के बीच घनिष्ठ संबंध होता है तथा मंत्रिपरिषद संसद के प्रति उत्तरदायी रहती है।
इस प्रणाली में वास्तविक कार्यपालिका प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल होते हैं, जबकि राष्ट्राध्यक्ष केवल नाममात्र का प्रमुख होता है।
प्रमुख परिभाषाएँ
गार्नर के अनुसार
संसदात्मक शासन वह प्रणाली है जिसमें मंत्रिमंडल विधायिका के प्रति उत्तरदायी होता है।
बैजहॉट के अनुसार
संसदात्मक शासन में कार्यपालिका और विधायिका का घनिष्ठ समन्वय पाया जाता है।
संसदात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. नाममात्र एवं वास्तविक कार्यपालिका
- नाममात्र कार्यपालिका – राष्ट्रपति/राजा
- वास्तविक कार्यपालिका – प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद
2. मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्व
मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होती है।
3. कार्यपालिका और विधायिका का घनिष्ठ संबंध
मंत्री सामान्यतः संसद के सदस्य होते हैं।
4. प्रधानमंत्री का नेतृत्व
प्रधानमंत्री शासन का वास्तविक प्रमुख होता है।
5. अविश्वास प्रस्ताव
संसद अविश्वास प्रस्ताव पारित करके सरकार को हटा सकती है।
6. लचीली कार्यपालिका
सरकार संसद के विश्वास पर आधारित होती है।
संसदात्मक शासन प्रणाली के गुण
1. उत्तरदायी शासन
सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी रहती है।
2. लोकतांत्रिक व्यवस्था
जनता के प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन संचालित होता है।
3. कार्यपालिका पर नियंत्रण
संसद सरकार के कार्यों की निगरानी करती है।
4. जनमत का सम्मान
सरकार जनता की इच्छाओं के अनुसार कार्य करने का प्रयास करती है।
5. समन्वय और सहयोग
कार्यपालिका और विधायिका के बीच सहयोग बना रहता है।
6. निरंकुशता पर नियंत्रण
शासन शक्ति एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित नहीं होती।
संसदात्मक शासन प्रणाली के दोष
1. राजनीतिक अस्थिरता
बहुमत खोने पर सरकार गिर सकती है।
2. दलीय राजनीति का प्रभाव
राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा दलगत हितों को प्राथमिकता मिल सकती है।
3. मंत्रिमंडलीय तानाशाही
बहुमत वाली सरकार संसद पर प्रभाव स्थापित कर सकती है।
4. निर्णय लेने में विलंब
विभिन्न स्तरों पर विचार-विमर्श के कारण निर्णय लेने में समय लग सकता है।
5. गठबंधन सरकार की समस्याएँ
गठबंधन सरकारों में स्थिरता की कमी हो सकती है।
मूल्यांकन
संसदात्मक प्रणाली लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और जनप्रतिनिधित्व को बढ़ावा देती है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और दलीय राजनीति इसकी प्रमुख कमजोरियाँ हैं।
निष्कर्ष
संसदात्मक शासन प्रणाली लोकतंत्र की एक प्रभावी व्यवस्था है जिसमें सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी रहती है। इसके कुछ दोष होने के बावजूद यह लोकतांत्रिक मूल्यों और उत्तरदायित्वपूर्ण शासन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
प्रश्न 2. संसदात्मक शासन प्रणाली की अर्थ एवं परिभाषा को स्पष्ट करते हुए इसकी विशेषताओं की विस्तार से चर्चा कीजिए।
प्रस्तावना
विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों जैसे ब्रिटेन, भारत, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में संसदात्मक शासन प्रणाली अपनाई गई है। यह प्रणाली उत्तरदायी सरकार और जनप्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर आधारित है।
संसदात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
संसदात्मक शासन प्रणाली वह शासन व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका संसद के प्रति उत्तरदायी होती है तथा उसका अस्तित्व संसद के विश्वास पर निर्भर करता है।
परिभाषाएँ
गिलक्राइस्ट के अनुसार
संसदात्मक शासन वह प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
गार्नर के अनुसार
यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें मंत्रिपरिषद संसद के विश्वास पर आधारित होती है।
संसदात्मक शासन प्रणाली की विस्तृत विशेषताएँ
1. द्वैध कार्यपालिका (Dual Executive)
(क) नाममात्र कार्यपालिका
- राष्ट्रपति या सम्राट
- औपचारिक शक्तियाँ
(ख) वास्तविक कार्यपालिका
- प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद
- वास्तविक शासन संचालन
2. मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्व
मंत्रिपरिषद संसद के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
3. कार्यपालिका और विधायिका का समन्वय
दोनों संस्थाओं के बीच घनिष्ठ संबंध होता है।
4. प्रधानमंत्री का प्रमुख स्थान
प्रधानमंत्री शासन का वास्तविक नेता होता है।
5. मंत्रियों का संसद सदस्य होना
अधिकांश मंत्री संसद के सदस्य होते हैं।
6. अविश्वास प्रस्ताव की व्यवस्था
संसद सरकार को पद से हटा सकती है।
7. बहुमत दल का शासन
जिस दल को संसद में बहुमत प्राप्त होता है, वही सरकार बनाता है।
8. विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका
विपक्ष सरकार की नीतियों की आलोचना एवं समीक्षा करता है।
9. लचीलापन
यह प्रणाली परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल सकती है।
10. लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व
सरकार जनता के प्रतिनिधियों के माध्यम से उत्तरदायी रहती है।
संसदात्मक शासन प्रणाली का महत्व
1. उत्तरदायी शासन
2. लोकतांत्रिक नियंत्रण
3. जनता की भागीदारी
4. राजनीतिक शिक्षा
5. प्रशासनिक समन्वय
निष्कर्ष
संसदात्मक शासन प्रणाली लोकतांत्रिक शासन का एक सफल मॉडल है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ जैसे सामूहिक उत्तरदायित्व, प्रधानमंत्री का नेतृत्व और कार्यपालिका-विधायिका का समन्वय इसे उत्तरदायी एवं जनहितकारी बनाते हैं। इसी कारण भारत सहित अनेक लोकतांत्रिक देशों ने इसे अपनाया है।
इकाई–6 : अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली
प्रश्न 1. अध्यक्षीय शासन प्रणाली से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए इसके गुण-दोष बताइये।
प्रस्तावना
अध्यक्षीय शासन प्रणाली (Presidential System of Government) आधुनिक शासन व्यवस्थाओं की एक महत्वपूर्ण प्रणाली है। इसमें कार्यपालिका और विधायिका के बीच स्पष्ट पृथक्करण पाया जाता है। राष्ट्रपति राज्य का प्रमुख तथा वास्तविक कार्यपालिका दोनों होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका इस प्रणाली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
अध्यक्षीय शासन प्रणाली का अर्थ
अध्यक्षीय शासन प्रणाली वह शासन व्यवस्था है जिसमें राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका होता है और वह विधायिका से स्वतंत्र होकर कार्य करता है।
इस प्रणाली में राष्ट्रपति जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और वह अपने कार्यकाल के दौरान विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
परिभाषाएँ
गार्नर के अनुसार
अध्यक्षीय शासन प्रणाली वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका विधायिका से स्वतंत्र होती है।
गेटेल के अनुसार
इस प्रणाली में राष्ट्रपति शासन का वास्तविक प्रमुख होता है तथा अपने अधिकार संविधान से प्राप्त करता है।
अध्यक्षीय शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. शक्तियों का पृथक्करण
कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट शक्ति विभाजन होता है।
2. राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका
राष्ट्रपति ही राज्य एवं सरकार दोनों का प्रमुख होता है।
3. निश्चित कार्यकाल
राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है।
उदाहरण
अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल 4 वर्ष होता है।
4. विधायिका से स्वतंत्रता
राष्ट्रपति विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
5. मंत्रिमंडल की स्थिति
मंत्री राष्ट्रपति के सलाहकार होते हैं और संसद के सदस्य नहीं होते।
6. अविश्वास प्रस्ताव का अभाव
विधायिका राष्ट्रपति को अविश्वास प्रस्ताव द्वारा नहीं हटा सकती।
7. न्यायपालिका की स्वतंत्रता
न्यायपालिका स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होती है।
8. नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances)
सरकार के विभिन्न अंग एक-दूसरे पर नियंत्रण रखते हैं।
अध्यक्षीय शासन प्रणाली के गुण
1. स्थिर सरकार
निश्चित कार्यकाल के कारण राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है।
2. मजबूत नेतृत्व
राष्ट्रपति के पास पर्याप्त अधिकार होते हैं।
3. त्वरित निर्णय
निर्णय लेने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेज होती है।
4. प्रशासनिक दक्षता
कार्यपालिका स्वतंत्र होने के कारण प्रभावी ढंग से कार्य करती है।
5. दलीय संघर्षों का कम प्रभाव
सरकार का अस्तित्व संसद के बहुमत पर निर्भर नहीं करता।
अध्यक्षीय शासन प्रणाली के दोष
1. निरंकुशता की संभावना
अधिक शक्तियाँ राष्ट्रपति को निरंकुश बना सकती हैं।
2. कार्यपालिका और विधायिका में संघर्ष
दोनों के बीच मतभेद होने पर शासन प्रभावित हो सकता है।
3. उत्तरदायित्व की कमी
राष्ट्रपति संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
4. महाभियोग की जटिल प्रक्रिया
राष्ट्रपति को हटाना कठिन होता है।
5. जनमत की उपेक्षा
कार्यकाल पूरा होने तक राष्ट्रपति पद पर बना रहता है।
मूल्यांकन
अध्यक्षीय प्रणाली स्थिरता और मजबूत नेतृत्व प्रदान करती है, लेकिन शक्ति के केंद्रीकरण और कार्यपालिका-विधायिका संघर्ष की संभावना भी उत्पन्न करती है।
निष्कर्ष
अध्यक्षीय शासन प्रणाली आधुनिक लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण मॉडल है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ जैसे शक्तियों का पृथक्करण, निश्चित कार्यकाल और मजबूत नेतृत्व इसे प्रभावी बनाते हैं। हालांकि निरंकुशता की संभावना तथा उत्तरदायित्व की कमी इसके प्रमुख दोष हैं।
प्रश्न 2. संसदात्मक व अध्यक्षात्मक शासन प्रणालियों को स्पष्ट करते हुए, दोनों शासन प्रणालियों में अंतर को स्पष्ट करें।
प्रस्तावना
विश्व में मुख्यतः दो प्रकार की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्थाएँ प्रचलित हैं—संसदात्मक शासन प्रणाली और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली। दोनों का उद्देश्य लोकतांत्रिक शासन स्थापित करना है, किन्तु उनकी संरचना, कार्यप्रणाली तथा शक्तियों के वितरण में महत्वपूर्ण अंतर पाया जाता है।
संसदात्मक शासन प्रणाली
संसदात्मक प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है और सरकार संसद के विश्वास पर आधारित होती है।
उदाहरण
- भारत
- ब्रिटेन
- कनाडा
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली
अध्यक्षात्मक प्रणाली में राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका होता है और विधायिका से स्वतंत्र रूप से कार्य करता है।
Example
- संयुक्त राज्य अमेरिका
संसदात्मक एवं अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में अंतर
| आधार | संसदात्मक शासन प्रणाली | अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली |
|---|---|---|
| कार्यपालिका | द्वैध कार्यपालिका | एकल कार्यपालिका |
| वास्तविक प्रमुख | प्रधानमंत्री | राष्ट्रपति |
| उत्तरदायित्व | संसद के प्रति उत्तरदायी | संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं |
| कार्यकाल | अनिश्चित | निश्चित |
| अविश्वास प्रस्ताव | संभव | नहीं |
| शक्तियों का संबंध | घनिष्ठ संबंध | स्पष्ट पृथक्करण |
| मंत्रियों की स्थिति | संसद सदस्य होते हैं | संसद सदस्य नहीं होते |
| स्थिरता | अपेक्षाकृत कम | अधिक |
| निर्णय प्रक्रिया | अपेक्षाकृत धीमी | अपेक्षाकृत तेज |
| उदाहरण | भारत, ब्रिटेन | अमेरिका |
संसदात्मक प्रणाली के लाभ
1. उत्तरदायी शासन
2. लोकतांत्रिक नियंत्रण
3. जनमत का सम्मान
अध्यक्षात्मक प्रणाली के लाभ
1. स्थिर सरकार
2. मजबूत नेतृत्व
3. त्वरित निर्णय
तुलनात्मक मूल्यांकन
संसदात्मक प्रणाली लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को अधिक महत्व देती है, जबकि अध्यक्षात्मक प्रणाली राजनीतिक स्थिरता और मजबूत नेतृत्व पर बल देती है। दोनों प्रणालियों की सफलता संबंधित देश की राजनीतिक परिस्थितियों और परंपराओं पर निर्भर करती है।
निष्कर्ष
संसदात्मक और अध्यक्षात्मक दोनों शासन प्रणालियाँ लोकतांत्रिक शासन की महत्वपूर्ण व्यवस्थाएँ हैं। संसदात्मक प्रणाली उत्तरदायित्व और जनप्रतिनिधित्व को बढ़ावा देती है, जबकि अध्यक्षात्मक प्रणाली स्थिरता और प्रभावी नेतृत्व प्रदान करती है। प्रत्येक प्रणाली के अपने गुण और सीमाएँ हैं।
इकाई–7 : एकात्मक शासन प्रणाली
प्रश्न 1. एकात्मक शासन प्रणाली के अर्थ एवं परिभाषा को स्पष्ट करते हुए इसके गुण-दोष बतलाइये।
प्रस्तावना
एकात्मक शासन प्रणाली (Unitary Government) वह शासन व्यवस्था है जिसमें समस्त शासन शक्ति एक ही केंद्रीय सरकार में निहित होती है। स्थानीय या प्रादेशिक इकाइयाँ अपनी शक्तियाँ केंद्र से प्राप्त करती हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और जापान एकात्मक शासन प्रणाली के प्रमुख उदाहरण हैं।
एकात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
एकात्मक शासन प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें शासन की सभी प्रमुख शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के हाथों में केंद्रित रहती हैं और पूरे देश में एक समान प्रशासन चलता है।
परिभाषा
गार्नर के अनुसार
एकात्मक शासन वह व्यवस्था है जिसमें राज्य की सर्वोच्च शक्ति एक केंद्रीय सत्ता में निहित होती है।
स्ट्रांग के अनुसार
एकात्मक राज्य में संपूर्ण विधायी, कार्यकारी तथा न्यायिक शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के अधीन रहती हैं।
एकात्मक शासन प्रणाली की विशेषताएँ
1. शक्ति का केंद्रीकरण
2. एक संविधान
3. एक नागरिकता
4. प्रशासनिक एकरूपता
5. केंद्रीय सरकार की सर्वोच्चता
6. स्थानीय निकायों पर नियंत्रण
एकात्मक शासन प्रणाली के गुण
1. मजबूत एवं प्रभावी शासन
निर्णय शीघ्र लिए जा सकते हैं।
2. प्रशासनिक एकरूपता
पूरे देश में समान कानून और नीतियाँ लागू होती हैं।
3. राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा
क्षेत्रीय विभाजन की संभावना कम होती है।
4. कम खर्चीली व्यवस्था
दोहरी सरकार की आवश्यकता नहीं होती।
5. संकट के समय उपयोगी
युद्ध या आपातकाल जैसी परिस्थितियों में शीघ्र निर्णय लिए जा सकते हैं।
एकात्मक शासन प्रणाली के दोष
1. शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण
निरंकुशता की संभावना बढ़ सकती है।
2. स्थानीय आवश्यकताओं की उपेक्षा
स्थानीय समस्याओं का उचित समाधान नहीं हो पाता।
3. लोकतांत्रिक भागीदारी में कमी
स्थानीय इकाइयों की स्वायत्तता सीमित रहती है।
4. बड़े देशों के लिए अनुपयुक्त
विशाल एवं विविधतापूर्ण देशों में इसका संचालन कठिन होता है।
5. प्रशासनिक बोझ
सभी निर्णय केंद्र द्वारा लिए जाने से कार्यभार बढ़ जाता है।
निष्कर्ष
एकात्मक शासन प्रणाली छोटे और अपेक्षाकृत समरूप देशों के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती है। यह प्रशासनिक एकता और दक्षता प्रदान करती है, किंतु अत्यधिक केंद्रीकरण के कारण स्थानीय स्वायत्तता सीमित हो सकती है।
प्रश्न 2. एकात्मक शासन प्रणाली की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये।
प्रस्तावना
एकात्मक शासन प्रणाली विश्व की प्रमुख शासन व्यवस्थाओं में से एक है। इसमें संपूर्ण शासन व्यवस्था का संचालन केंद्रीय सरकार द्वारा किया जाता है।
एकात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. केंद्रीय सत्ता की सर्वोच्चता
देश की समस्त प्रमुख शक्तियाँ केंद्र सरकार के पास होती हैं।
2. शक्तियों का केंद्रीकरण
राज्यों या प्रांतों को स्वतंत्र संवैधानिक शक्तियाँ प्राप्त नहीं होतीं।
3. एक संविधान
पूरे देश के लिए एक ही संविधान लागू होता है।
4. एक नागरिकता
देश के सभी नागरिकों की एक ही नागरिकता होती है।
5. प्रशासनिक एकरूपता
कानून एवं प्रशासन पूरे देश में समान रूप से लागू होते हैं।
6. एकीकृत न्यायपालिका
पूरे देश के लिए एक न्यायिक व्यवस्था होती है।
7. स्थानीय सरकारों पर नियंत्रण
स्थानीय संस्थाएँ केंद्र के अधीन कार्य करती हैं।
8. नीति निर्माण में एकरूपता
राष्ट्रीय नीतियाँ पूरे देश में समान रूप से लागू होती हैं।
निष्कर्ष
एकात्मक शासन प्रणाली की मुख्य विशेषता शक्ति का केंद्रीकरण और प्रशासनिक एकता है। यह राष्ट्रीय एकता और प्रभावी प्रशासन को बढ़ावा देती है।
इकाई–8 : संघात्मक शासन प्रणाली
प्रश्न 1. संघात्मक शासन प्रणाली से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए इसके गुण-दोष बतलाइये।
प्रस्तावना
संघात्मक शासन प्रणाली (Federal Government) वह व्यवस्था है जिसमें शासन शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच संविधान द्वारा किया जाता है। अमेरिका, भारत, स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रेलिया इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
संघात्मक शासन प्रणाली का अर्थ
संघात्मक शासन वह व्यवस्था है जिसमें केंद्र और राज्य दोनों सरकारें संवैधानिक रूप से स्थापित होती हैं और दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।
परिभाषा
गार्नर के अनुसार
संघात्मक शासन ऐसी प्रणाली है जिसमें शक्तियाँ केंद्रीय तथा प्रादेशिक सरकारों के बीच विभाजित रहती हैं।
संघात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
1. दोहरी सरकार
- केंद्रीय सरकार
- राज्य सरकारें
2. शक्तियों का संवैधानिक विभाजन
संविधान द्वारा अधिकारों का स्पष्ट विभाजन किया जाता है।
3. संविधान की सर्वोच्चता
केंद्र और राज्य दोनों संविधान के अधीन होते हैं।
4. लिखित संविधान
अधिकांश संघीय राज्यों में लिखित संविधान होता है।
5. कठोर संविधान
संविधान संशोधन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत कठिन होती है।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
संविधान की रक्षा और विवादों का समाधान करती है।
7. द्विसदनीय विधायिका
अधिकांश संघीय देशों में द्विसदनीय संसद होती है।
संघात्मक शासन प्रणाली के गुण
1. विशाल देशों के लिए उपयुक्त
2. स्थानीय स्वायत्तता
3. लोकतंत्र को प्रोत्साहन
4. शक्ति के केंद्रीकरण पर रोक
5. विविधता में एकता
संघात्मक शासन प्रणाली के दोष
1. केंद्र एवं राज्यों में संघर्ष
2. प्रशासनिक जटिलता
3. अधिक खर्चीली व्यवस्था
4. निर्णय लेने में विलंब
5. राष्ट्रीय एकता पर संभावित खतरा
निष्कर्ष
संघात्मक शासन प्रणाली विविधता वाले बड़े देशों के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह स्थानीय स्वायत्तता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन स्थापित करती है, यद्यपि इसमें कुछ प्रशासनिक कठिनाइयाँ भी होती हैं।
प्रश्न 2. एकात्मक व संघात्मक शासन प्रणाली को स्पष्ट करते हुए एकात्मक व संघात्मक शासन प्रणाली में अंतर को स्पष्ट करें।
प्रस्तावना
एकात्मक और संघात्मक शासन प्रणाली विश्व की दो प्रमुख शासन व्यवस्थाएँ हैं। दोनों का उद्देश्य प्रभावी शासन स्थापित करना है, लेकिन उनकी संरचना और कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण अंतर पाया जाता है।
एकात्मक एवं संघात्मक शासन प्रणाली में अंतर
| आधार | एकात्मक शासन प्रणाली | संघात्मक शासन प्रणाली |
|---|---|---|
| शक्ति का स्वरूप | केंद्र में केंद्रित | केंद्र और राज्यों में विभाजित |
| सरकारों की संख्या | एक | दो |
| संविधान | सामान्यतः लचीला | सामान्यतः कठोर |
| संविधान की प्रकृति | एकात्मक | संघात्मक |
| न्यायपालिका | अपेक्षाकृत कम स्वतंत्र | स्वतंत्र |
| नागरिकता | एक नागरिकता | एक या दोहरी नागरिकता |
| स्थानीय इकाइयों की स्थिति | केंद्र पर निर्भर | संवैधानिक दर्जा प्राप्त |
| उदाहरण | ब्रिटेन, फ्रांस | अमेरिका, भारत, स्विट्ज़रलैंड |
एकात्मक प्रणाली की विशेष श्रेष्ठताएँ
- प्रशासनिक एकता
- त्वरित निर्णय
- कम खर्च
संघात्मक प्रणाली की विशेष श्रेष्ठताएँ
- स्थानीय स्वायत्तता
- लोकतांत्रिक भागीदारी
- विविधता का संरक्षण
निष्कर्ष
एकात्मक शासन प्रणाली केंद्रीकरण और प्रशासनिक एकता पर आधारित है, जबकि संघात्मक शासन प्रणाली शक्ति-वितरण और स्थानीय स्वायत्तता पर आधारित है। दोनों व्यवस्थाओं की सफलता संबंधित देश की भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
इकाई–9 : ब्रिटिश संविधान – I
(संविधान की मूलभूत विशेषताएँ, ब्रिटिश संसद)
प्रश्न 1. ब्रिटेन के संविधान की विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।
प्रस्तावना
ब्रिटेन का संविधान विश्व के सबसे प्राचीन संविधानों में से एक है। यह लोकतांत्रिक शासन का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। ब्रिटिश संविधान की विशेषता यह है कि यह किसी एक लिखित दस्तावेज़ में संकलित नहीं है, बल्कि विभिन्न कानूनों, परंपराओं और न्यायिक निर्णयों पर आधारित है।
ब्रिटेन के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. अलिखित संविधान
ब्रिटेन का संविधान पूर्णतः लिखित नहीं है। इसके नियम विभिन्न स्रोतों में बिखरे हुए हैं।
2. प्राचीन संविधान
यह विश्व का सबसे पुराना संविधान माना जाता है, जिसका विकास कई शताब्दियों में हुआ है।
3. विकसित संविधान
यह किसी संविधान सभा द्वारा निर्मित नहीं किया गया बल्कि ऐतिहासिक विकास का परिणाम है।
4. लचीला संविधान
ब्रिटिश संविधान में संशोधन सामान्य कानून की तरह किया जा सकता है।
5. संसद की सर्वोच्चता
ब्रिटेन में संसद सर्वोच्च विधायी संस्था है।
विशेष तथ्य
संसद किसी भी कानून को बना, बदल या समाप्त कर सकती है।
6. संसदीय शासन प्रणाली
ब्रिटेन संसदीय शासन प्रणाली का जन्मदाता माना जाता है।
7. विधि का शासन (Rule of Law)
ब्रिटेन में सभी व्यक्ति कानून के समक्ष समान हैं।
8. द्विदलीय व्यवस्था
मुख्य रूप से दो प्रमुख राजनीतिक दल शासन में भूमिका निभाते हैं।
- कंजर्वेटिव पार्टी
- लेबर पार्टी
9. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से कार्य करती है।
10. संवैधानिक राजतंत्र
राजा या रानी नाममात्र के शासक होते हैं, जबकि वास्तविक शक्ति मंत्रिमंडल के पास होती है।
निष्कर्ष
ब्रिटिश संविधान अपनी प्राचीनता, लचीलेपन, संसदीय सर्वोच्चता और लोकतांत्रिक परंपराओं के कारण विश्व में विशिष्ट स्थान रखता है। अनेक देशों ने अपने संविधानों के निर्माण में ब्रिटेन से प्रेरणा ली है।
प्रश्न 2. ब्रिटेन के संविधान के प्रमुख स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
प्रस्तावना
ब्रिटेन का संविधान किसी एक दस्तावेज़ में संकलित नहीं है। इसके नियम अनेक स्रोतों से प्राप्त होते हैं। यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
ब्रिटिश संविधान के प्रमुख स्रोत
1. संसदीय अधिनियम (Acts of Parliament)
संसद द्वारा बनाए गए कानून संविधान के प्रमुख स्रोत हैं।
उदाहरण
- Magna Carta (1215)
- Bill of Rights (1689)
- Act of Settlement (1701)
2. सामान्य कानून (Common Law)
न्यायालयों के निर्णयों से विकसित नियम।
3. संवैधानिक परंपराएँ (Constitutional Conventions)
ऐसी परंपराएँ जो लिखित नहीं हैं लेकिन उनका पालन अनिवार्य माना जाता है।
उदाहरण
प्रधानमंत्री का लोकसभा (House of Commons) से होना।
4. न्यायिक निर्णय
न्यायालयों द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय संविधान का स्रोत हैं।
5. विद्वानों की टीकाएँ
संवैधानिक विशेषज्ञों द्वारा लिखी गई पुस्तकों को भी स्रोत माना जाता है।
प्रमुख विद्वान
- ए. वी. डाइसी
- बैजहॉट
6. ऐतिहासिक दस्तावेज
प्रमुख दस्तावेज
- Magna Carta (1215)
- Petition of Right (1628)
- Bill of Rights (1689)
निष्कर्ष
ब्रिटिश संविधान का विकास अनेक स्रोतों के माध्यम से हुआ है। संसदीय अधिनियम, परंपराएँ, न्यायिक निर्णय तथा ऐतिहासिक दस्तावेज इसके प्रमुख आधार हैं।
प्रश्न 3. लार्ड सभा (House of Lords) के गठन एवं शक्तियों पर प्रकाश डालिये।
प्रस्तावना
लार्ड सभा ब्रिटिश संसद का उच्च सदन (Upper House) है। यह विश्व की सबसे पुरानी विधायी संस्थाओं में से एक है।
लार्ड सभा का गठन
लार्ड सभा के सदस्य निर्वाचित नहीं होते।
इनमें मुख्यतः शामिल होते हैं—
1. आजीवन सदस्य (Life Peers)
2. धार्मिक सदस्य (Bishops)
3. वंशानुगत सदस्य (Hereditary Peers)
लार्ड सभा की शक्तियाँ
1. विधायी शक्ति
विधेयकों पर विचार और संशोधन कर सकती है।
2. पुनर्विचार शक्ति
लोकसभा द्वारा पारित विधेयकों की समीक्षा करती है।
3. न्यायिक शक्ति (ऐतिहासिक)
पूर्व में सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय के रूप में कार्य करती थी।
4. विचार-विमर्श का मंच
राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर चर्चा करती है।
5. विशेषज्ञ सलाह
अनुभवी व्यक्तियों के कारण संसद को उपयोगी सुझाव प्राप्त होते हैं।
लार्ड सभा की सीमाएँ
1. वित्त विधेयक को रोक नहीं सकती।
2. अंतिम शक्ति कामन सभा के पास होती है।
3. सरकार को नहीं गिरा सकती।
निष्कर्ष
लार्ड सभा ब्रिटिश संसद का महत्वपूर्ण उच्च सदन है। यद्यपि इसकी शक्तियाँ सीमित हैं, फिर भी यह विधायी प्रक्रिया में समीक्षा एवं परामर्श की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रश्न 4. कामन सभा (House of Commons) के गठन एवं शक्तियों पर प्रकाश डालिये।
प्रस्तावना
कामन सभा ब्रिटिश संसद का निम्न सदन (Lower House) है। यह ब्रिटिश लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है क्योंकि वास्तविक विधायी शक्ति इसी के पास होती है।
कामन सभा का गठन
1. प्रत्यक्ष निर्वाचन
सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं।
2. कार्यकाल
सामान्यतः 5 वर्ष।
3. सदस्य संख्या
लगभग 650 सदस्य।
4. निर्वाचन क्षेत्र
देश को विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।
कामन सभा की शक्तियाँ
1. विधायी शक्ति
सभी प्रमुख कानूनों का निर्माण करती है।
2. वित्तीय शक्ति
वित्त विधेयक केवल कामन सभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।
3. कार्यपालिका पर नियंत्रण
मंत्रिमंडल कामन सभा के प्रति उत्तरदायी होता है।
4. अविश्वास प्रस्ताव
सरकार को पद से हटा सकती है।
5. नीति निर्माण
राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाती है।
6. जनता का प्रतिनिधित्व
जनता की इच्छाओं और समस्याओं को संसद तक पहुँचाती है।
कामन सभा का महत्व
1. संसद का सबसे शक्तिशाली सदन
2. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का आधार
3. सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करती है
4. राष्ट्रीय वित्त पर नियंत्रण रखती है
निष्कर्ष
कामन सभा ब्रिटिश संसद का सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली अंग है। यह कानून निर्माण, वित्तीय नियंत्रण और कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करके ब्रिटिश लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में कार्य करती है।
इकाई–10 : ब्रिटिश संविधान – II
(कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं दल प्रणाली)
प्रश्न 1. ब्रिटिश दल पद्धति के उद्भव को स्पष्ट कीजिये।
प्रस्तावना
ब्रिटेन को आधुनिक दलीय प्रणाली (Party System) का जन्मदाता माना जाता है। लोकतांत्रिक शासन की सफलता में राजनीतिक दलों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ब्रिटिश दलीय व्यवस्था का विकास धीरे-धीरे ऐतिहासिक घटनाओं और राजनीतिक संघर्षों के परिणामस्वरूप हुआ।
ब्रिटिश दल पद्धति का उद्भव
ब्रिटेन में राजनीतिक दलों का विकास 17वीं शताब्दी में प्रारम्भ हुआ।
1. गौरवपूर्ण क्रांति (1688) का प्रभाव
राजा और संसद के बीच संघर्ष के दौरान दो प्रमुख समूह उभरे—
- व्हिग (Whigs)
- टोरी (Tories)
इन्हीं से आधुनिक दलों का विकास हुआ।
2. व्हिग दल
यह दल संसद की सर्वोच्चता, नागरिक अधिकारों और उदार विचारों का समर्थक था।
3. टोरी दल
यह दल राजशाही, चर्च तथा परंपराओं का समर्थक था।
4. आधुनिक दलों का विकास
समय के साथ—
- व्हिग दल → लिबरल पार्टी
- टोरी दल → कंजर्वेटिव पार्टी
में परिवर्तित हो गया।
5. श्रमिक आंदोलन का प्रभाव
19वीं और 20वीं शताब्दी में श्रमिक वर्ग के उदय से लेबर पार्टी का गठन हुआ।
वर्तमान ब्रिटिश दल व्यवस्था
आज ब्रिटेन में मुख्य रूप से दो दल प्रमुख हैं—
1. कंजर्वेटिव पार्टी
2. लेबर पार्टी
ब्रिटिश दल पद्धति की विशेषताएँ
1. द्विदलीय व्यवस्था
2. संगठित दल संरचना
3. अनुशासित दल प्रणाली
4. लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली
5. शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन
निष्कर्ष
ब्रिटिश दलीय व्यवस्था का विकास ऐतिहासिक घटनाओं और लोकतांत्रिक परंपराओं का परिणाम है। यह विश्व की सबसे स्थिर और प्रभावशाली दलीय व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है।
प्रश्न 2. ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में दल की भूमिका की विवेचना कीजिये।
प्रस्तावना
ब्रिटिश लोकतंत्र की सफलता में राजनीतिक दलों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। राजनीतिक दल सरकार और जनता के बीच सेतु का कार्य करते हैं तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाते हैं।
ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में दलों की भूमिका
1. सरकार का गठन
जिस दल को कामन सभा में बहुमत प्राप्त होता है, वही सरकार बनाता है।
2. जनमत का निर्माण
दल जनता को राजनीतिक मुद्दों के प्रति जागरूक करते हैं।
3. राजनीतिक शिक्षा
राजनीतिक दल नागरिकों को लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा देते हैं।
4. विपक्ष की भूमिका
विपक्ष सरकार की नीतियों की आलोचना एवं समीक्षा करता है।
5. नेतृत्व का विकास
राजनीतिक दल योग्य नेताओं को विकसित करते हैं।
6. नीति निर्माण
राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण में दलों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
7. सरकार पर नियंत्रण
विपक्ष सरकार को उत्तरदायी बनाए रखता है।
8. लोकतंत्र की सफलता
दल लोकतांत्रिक शासन को स्थिरता प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष
ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दल लोकतंत्र की आधारशिला हैं। इनके बिना संसदीय शासन प्रणाली की सफलता की कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रश्न 3. ब्रिटिश मंत्रिमण्डल के गठन तथा उसकी शक्तियों पर प्रकाश डालिये।
प्रस्तावना
ब्रिटिश मंत्रिमंडल शासन का वास्तविक केंद्र है। यद्यपि राजा या रानी संवैधानिक प्रमुख होते हैं, परंतु वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के हाथों में होती है।
मंत्रिमंडल का गठन
1. प्रधानमंत्री की नियुक्ति
राजा/रानी उस व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है जो कामन सभा में बहुमत दल का नेता होता है।
2. मंत्रियों की नियुक्ति
प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों को मंत्री नियुक्त करता है।
3. सामूहिक उत्तरदायित्व
मंत्रिमंडल सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होता है।
4. संसद सदस्यता
अधिकांश मंत्री संसद के सदस्य होते हैं।
ब्रिटिश मंत्रिमंडल की शक्तियाँ
1. कार्यपालिका शक्ति
देश का प्रशासन संचालित करता है।
2. विधायी शक्ति
अधिकांश विधेयक मंत्रिमंडल द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं।
3. वित्तीय शक्ति
राष्ट्रीय बजट तैयार करता है।
4. विदेश नीति
विदेश नीति का निर्धारण करता है।
5. रक्षा संबंधी शक्ति
राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा नीति का संचालन करता है।
6. संसद पर प्रभाव
बहुमत दल होने के कारण संसद को प्रभावित करता है।
मंत्रिमंडल का महत्व
1. वास्तविक कार्यपालिका
2. शासन का केंद्र
3. नीति निर्माण का प्रमुख अंग
निष्कर्ष
ब्रिटिश मंत्रिमंडल शासन का सबसे शक्तिशाली अंग है। यह प्रशासन, कानून निर्माण, वित्त तथा विदेश नीति जैसे क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाता है।
प्रश्न 4. ब्रिटिश न्यायपालिका की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
प्रस्तावना
ब्रिटिश न्यायपालिका विश्व की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित न्यायिक व्यवस्थाओं में से एक है। यह नागरिक अधिकारों की रक्षा तथा कानून के शासन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
ब्रिटिश न्यायपालिका की प्रमुख विशेषताएँ
1. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका से स्वतंत्र होती है।
2. विधि का शासन (Rule of Law)
सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं।
3. सामान्य कानून (Common Law)
ब्रिटिश न्याय व्यवस्था मुख्यतः कॉमन लॉ पर आधारित है।
4. न्यायिक निष्पक्षता
न्यायाधीश निष्पक्ष एवं स्वतंत्र रूप से निर्णय देते हैं।
5. एकीकृत न्यायिक व्यवस्था
पूरे देश में एकीकृत न्यायिक प्रणाली कार्य करती है।
6. नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा
न्यायपालिका नागरिक अधिकारों की सुरक्षा करती है।
7. न्यायिक परंपराओं का महत्व
न्यायिक निर्णय भविष्य के मामलों के लिए उदाहरण (Precedent) बनते हैं।
8. खुली न्यायिक प्रक्रिया
न्यायिक कार्यवाही सामान्यतः सार्वजनिक होती है।
ब्रिटिश न्यायपालिका का महत्व
1. संविधान की भावना की रक्षा
2. नागरिक अधिकारों की सुरक्षा
3. कानून के शासन को मजबूत बनाना
4. लोकतंत्र की रक्षा
निष्कर्ष
ब्रिटिश न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता, निष्पक्षता और विधि के शासन के सिद्धांत के कारण विश्वभर में सम्मानित है। यह ब्रिटिश लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण आधारशिला है।
इकाई–11 : संयुक्त राज्य अमेरिका – I
(संविधान की मूलभूत विशेषताएँ, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि)
प्रश्न 1. अमेरिका के संविधान की प्रमुख विशेषताओं पर आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिए।
प्रस्तावना
संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान विश्व का पहला लिखित संविधान माना जाता है। यह 1787 में निर्मित हुआ और 1789 से लागू हुआ। अमेरिकी संविधान ने आधुनिक लोकतांत्रिक शासन, संघवाद और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
अमेरिकी संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. विश्व का प्रथम लिखित संविधान
अमेरिकी संविधान आधुनिक युग का पहला लिखित संविधान है।
2. संघात्मक शासन व्यवस्था
अमेरिका में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है।
3. कठोर संविधान
संविधान में संशोधन की प्रक्रिया कठिन है।
4. शक्तियों का पृथक्करण
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट शक्ति विभाजन है।
5. नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances)
सरकार का कोई भी अंग निरंकुश न हो, इसके लिए पारस्परिक नियंत्रण की व्यवस्था की गई है।
6. अध्यक्षीय शासन प्रणाली
राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका होता है।
7. स्वतंत्र न्यायपालिका
सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक है।
8. मौलिक अधिकारों की व्यवस्था
नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हेतु अधिकार-पत्र (Bill of Rights) जोड़ा गया।
9. जनसत्ता का सिद्धांत
संविधान जनता की संप्रभुता पर आधारित है।
10. धर्मनिरपेक्ष राज्य
राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है।
अमेरिकी संविधान की आलोचना
1. संशोधन प्रक्रिया अत्यधिक कठिन
2. राष्ट्रपति को अत्यधिक शक्तियाँ
3. अप्रत्यक्ष लोकतंत्र के तत्व
4. कुछ प्रावधान समयानुकूल नहीं माने जाते
निष्कर्ष
अमेरिकी संविधान अपनी स्थिरता, संघवाद, स्वतंत्र न्यायपालिका और लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण विश्व का एक आदर्श संविधान माना जाता है। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी यह आधुनिक संवैधानिक शासन का उत्कृष्ट उदाहरण है।
प्रश्न 2. अमेरिकी संविधान के उदय एवं विकास पर टिप्पणी कीजिए।
प्रस्तावना
अमेरिकी संविधान का निर्माण एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। यह स्वतंत्रता संग्राम, उपनिवेशवाद के विरोध तथा लोकतांत्रिक आदर्शों की पृष्ठभूमि में विकसित हुआ।
अमेरिकी संविधान का उदय
1. ब्रिटिश उपनिवेशों की स्थापना
अमेरिका में 13 ब्रिटिश उपनिवेश स्थापित थे।
2. ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष
ब्रिटेन द्वारा लगाए गए करों और प्रतिबंधों से उपनिवेशों में असंतोष बढ़ा।
3. स्वतंत्रता की घोषणा (1776)
4 जुलाई 1776 को स्वतंत्रता की घोषणा की गई।
4. परिसंघ के लेख (Articles of Confederation)
स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक शासन व्यवस्था बनाई गई, लेकिन यह कमजोर सिद्ध हुई।
5. फिलाडेल्फिया सम्मेलन (1787)
संविधान निर्माण हेतु सम्मेलन आयोजित किया गया।
6. संविधान का निर्माण
1787 में संविधान तैयार किया गया।
7. संविधान लागू होना
1789 में संविधान लागू हुआ।
अमेरिकी संविधान का विकास
1. अधिकार-पत्र (Bill of Rights) – 1791
पहले दस संशोधन नागरिक अधिकारों की रक्षा हेतु जोड़े गए।
2. गृह युद्ध और संशोधन
दास प्रथा समाप्त करने तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा हेतु महत्वपूर्ण संशोधन हुए।
3. न्यायिक व्याख्या
सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4. आधुनिक संशोधन
समय-समय पर आवश्यक सुधार किए गए।
निष्कर्ष
अमेरिकी संविधान स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संघवाद के सिद्धांतों पर आधारित है। इसका विकास ऐतिहासिक संघर्षों तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का परिणाम है।
प्रश्न 3. अमेरिका के संविधान की संशोधन प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए।
प्रस्तावना
संविधान की स्थिरता बनाए रखते हुए समयानुकूल परिवर्तन करना आवश्यक होता है। अमेरिकी संविधान ने संशोधन की एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित की है।
संशोधन प्रक्रिया
अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद V (Article 5) में संशोधन की प्रक्रिया दी गई है।
प्रथम चरण : संशोधन प्रस्ताव
संशोधन प्रस्ताव दो प्रकार से प्रस्तुत किया जा सकता है—
1. कांग्रेस द्वारा
सीनेट और प्रतिनिधि सभा के दो-तिहाई बहुमत से।
2. राज्यों की मांग पर
दो-तिहाई राज्यों की मांग पर विशेष सम्मेलन बुलाया जा सकता है।
द्वितीय चरण : अनुमोदन
प्रस्तावित संशोधन को स्वीकृति प्राप्त करनी होती है।
1. राज्यों की विधानसभाओं द्वारा
तीन-चौथाई राज्यों की स्वीकृति।
2. विशेष राज्य सम्मेलनों द्वारा
तीन-चौथाई राज्यों की स्वीकृति।
संशोधन प्रक्रिया की विशेषताएँ
1. कठोर प्रक्रिया
2. संघीय सिद्धांत की रक्षा
3. राज्यों की भागीदारी
4. संविधान की स्थिरता
संशोधन प्रक्रिया के गुण
1. जल्दबाजी में संशोधन नहीं होते
2. संविधान की गरिमा बनी रहती है
3. राष्ट्रीय सहमति सुनिश्चित होती है
दोष
1. अत्यधिक कठिन
2. परिवर्तन की गति धीमी
निष्कर्ष
अमेरिकी संविधान की संशोधन प्रक्रिया संविधान की स्थिरता और लोकतांत्रिक सहमति दोनों को सुनिश्चित करती है। यही कारण है कि 1789 से अब तक इसमें अपेक्षाकृत कम संशोधन हुए हैं।
प्रश्न 4. अमेरिका के संविधान में नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances) के सिद्धान्त को किस प्रकार अपनाया गया है? टिप्पणी कीजिए।
प्रस्तावना
अमेरिकी संविधान निर्माताओं का उद्देश्य किसी एक संस्था में शक्ति का केंद्रीकरण रोकना था। इसी कारण उन्होंने शक्तियों के पृथक्करण के साथ-साथ नियंत्रण एवं संतुलन का सिद्धांत अपनाया।
नियंत्रण एवं संतुलन का अर्थ
यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें शासन के प्रत्येक अंग को कुछ शक्तियाँ दी जाती हैं ताकि वह अन्य अंगों पर नियंत्रण रख सके।
अमेरिका में नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था
1. राष्ट्रपति पर कांग्रेस का नियंत्रण
(क) महाभियोग
कांग्रेस राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा हटा सकती है।
(ख) बजट नियंत्रण
वित्तीय शक्तियाँ कांग्रेस के पास होती हैं।
2. कांग्रेस पर राष्ट्रपति का नियंत्रण
(क) वीटो शक्ति
राष्ट्रपति विधेयकों को वीटो कर सकता है।
(ख) विशेष अधिवेशन बुलाना
राष्ट्रपति कांग्रेस का विशेष सत्र बुला सकता है।
3. न्यायपालिका का नियंत्रण
न्यायिक पुनरावलोकन
सर्वोच्च न्यायालय असंवैधानिक कानूनों को निरस्त कर सकता है।
4. न्यायपालिका पर नियंत्रण
न्यायाधीशों की नियुक्ति
राष्ट्रपति नियुक्त करता है।
सीनेट की स्वीकृति
नियुक्तियों को सीनेट की मंजूरी आवश्यक होती है।
सिद्धांत का महत्व
1. शक्ति संतुलन बनाए रखता है।
2. निरंकुशता रोकता है।
3. लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
4. संविधान की रक्षा करता है।
आलोचना
1. निर्णय प्रक्रिया धीमी हो सकती है।
2. संस्थाओं में टकराव उत्पन्न हो सकता है।
निष्कर्ष
नियंत्रण एवं संतुलन का सिद्धांत अमेरिकी संविधान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। यह शासन के विभिन्न अंगों के बीच शक्ति संतुलन बनाए रखता है और लोकतांत्रिक शासन को सुरक्षित बनाता है।
इकाई–12 : संयुक्त राज्य अमेरिका – II
(संघीय कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका एवं दल प्रणाली)
प्रश्न 1. अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव प्रक्रिया पर निबन्ध लिखिए।
प्रस्तावना
अमेरिकी राष्ट्रपति विश्व के सबसे शक्तिशाली निर्वाचित पदों में से एक माना जाता है। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं बल्कि निर्वाचक मंडल (Electoral College) के माध्यम से किया जाता है। यह प्रक्रिया अमेरिकी संविधान की एक विशिष्ट विशेषता है।
राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया
1. उम्मीदवारों का चयन
प्रमुख राजनीतिक दल (डेमोक्रेटिक एवं रिपब्लिकन) अपने उम्मीदवारों का चयन करते हैं।
2. राष्ट्रीय सम्मेलन
दल अपने राष्ट्रीय सम्मेलन में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की औपचारिक घोषणा करते हैं।
3. आम चुनाव
जनता सीधे राष्ट्रपति को नहीं बल्कि निर्वाचकों (Electors) को चुनती है।
4. निर्वाचक मंडल (Electoral College)
प्रत्येक राज्य को उसकी जनसंख्या के आधार पर निर्वाचक दिए जाते हैं।
वर्तमान में कुल 538 निर्वाचक होते हैं।
5. राष्ट्रपति का निर्वाचन
जो उम्मीदवार 538 में से कम से कम 270 मत प्राप्त कर लेता है, वह राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है।
6. बहुमत न मिलने की स्थिति
यदि किसी उम्मीदवार को बहुमत प्राप्त न हो तो प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) राष्ट्रपति का चुनाव करती है।
राष्ट्रपति बनने की योग्यताएँ
1. अमेरिका का जन्मजात नागरिक हो।
2. कम से कम 35 वर्ष आयु हो।
3. कम से कम 14 वर्षों तक अमेरिका में निवास किया हो।
चुनाव प्रणाली के गुण
1. संघीय सिद्धांत की रक्षा
2. छोटे राज्यों का प्रतिनिधित्व
3. राजनीतिक स्थिरता
दोष
1. अप्रत्यक्ष चुनाव
2. लोकप्रिय मत और निर्वाचक मत में अंतर
3. जटिल प्रक्रिया
निष्कर्ष
अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव विश्व की सबसे अनोखी चुनाव प्रणालियों में से एक है। यह संघीय व्यवस्था और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है।
प्रश्न 2. अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्तियों की विवेचना कीजिए।
प्रस्तावना
अमेरिकी राष्ट्रपति राज्य और सरकार दोनों का प्रमुख होता है। वह संघीय कार्यपालिका का सर्वोच्च अधिकारी है और अनेक महत्वपूर्ण शक्तियों का प्रयोग करता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्तियाँ
1. कार्यपालिका शक्तियाँ
राष्ट्रपति पूरे संघीय प्रशासन का प्रमुख होता है।
कार्य
- अधिकारियों की नियुक्ति
- प्रशासनिक नियंत्रण
2. विधायी शक्तियाँ
(क) वीटो शक्ति
राष्ट्रपति कांग्रेस द्वारा पारित विधेयक को अस्वीकार कर सकता है।
(ख) संदेश भेजना
कांग्रेस को महत्वपूर्ण संदेश भेज सकता है।
3. सैन्य शक्तियाँ
राष्ट्रपति सेना का सर्वोच्च सेनापति (Commander-in-Chief) होता है।
4. विदेश नीति संबंधी शक्तियाँ
1. संधियाँ करना
2. राजदूत नियुक्त करना
3. विदेशी राज्यों को मान्यता देना
5. न्यायिक शक्तियाँ
संघीय न्यायाधीशों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
6. क्षमादान शक्ति
अपराधियों को क्षमा या दंड में कमी कर सकता है।
निष्कर्ष
अमेरिकी राष्ट्रपति के पास व्यापक कार्यपालिका, विधायी, सैन्य और विदेश नीति संबंधी शक्तियाँ होती हैं, जिसके कारण उसे विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक नेताओं में गिना जाता है।
प्रश्न 3. अमेरिकी मन्त्रिमण्डल के संगठन एवं कार्यों पर टिप्पणी कीजिए।
प्रस्तावना
अमेरिकी मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को प्रशासनिक कार्यों में सहायता प्रदान करता है। यह ब्रिटिश मंत्रिमंडल से भिन्न है क्योंकि यह कांग्रेस के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
अमेरिकी मंत्रिमंडल का संगठन
1. राष्ट्रपति इसका प्रमुख होता है।
2. विभागीय सचिव इसके सदस्य होते हैं।
3. सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
4. सीनेट की स्वीकृति आवश्यक होती है।
मंत्रिमंडल के प्रमुख कार्य
1. राष्ट्रपति को सलाह देना
2. प्रशासनिक विभागों का संचालन
3. सरकारी नीतियों का क्रियान्वयन
4. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विषयों पर परामर्श
5. प्रशासनिक समन्वय स्थापित करना
ब्रिटिश मंत्रिमंडल से अंतर
1. अमेरिकी मंत्रिमंडल सामूहिक रूप से उत्तरदायी नहीं होता।
2. मंत्री कांग्रेस के सदस्य नहीं होते।
3. राष्ट्रपति मंत्रिमंडल का वास्तविक प्रमुख होता है।
निष्कर्ष
अमेरिकी मंत्रिमंडल राष्ट्रपति का सलाहकार निकाय है जो प्रशासनिक कार्यों को संचालित करने में सहायता करता है। इसकी शक्ति राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर करती है।
प्रश्न 4. "अमेरिकी राष्ट्रपति का पद बेहद शक्तिशाली है" – विवेचना कीजिए।
प्रस्तावना
अमेरिकी राष्ट्रपति को विश्व का सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक शासक कहा जाता है। संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों तथा आधुनिक परिस्थितियों ने राष्ट्रपति पद को अत्यंत प्रभावशाली बना दिया है।
राष्ट्रपति के शक्तिशाली होने के कारण
1. राज्य एवं सरकार दोनों का प्रमुख
2. विशाल कार्यपालिका शक्तियाँ
3. सेना का सर्वोच्च सेनापति
4. विदेश नीति का प्रमुख निर्माता
5. वीटो शक्ति
6. नियुक्ति संबंधी शक्तियाँ
7. राष्ट्रीय नेतृत्व
संकट के समय राष्ट्रपति पूरे राष्ट्र का नेतृत्व करता है।
राष्ट्रपति की शक्तियों पर नियंत्रण
1. कांग्रेस का महाभियोग अधिकार
2. न्यायपालिका का न्यायिक पुनरावलोकन
3. सीनेट की स्वीकृति
निष्कर्ष
यद्यपि राष्ट्रपति अत्यंत शक्तिशाली होता है, फिर भी नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था उसे निरंकुश बनने से रोकती है। इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति को शक्तिशाली लेकिन नियंत्रित कार्यपालिका कहा जाता है।
प्रश्न 5. कांग्रेस की शक्तियाँ, शक्ति विभाजन के सिद्धान्त को बखूबी प्रदर्शित करती है। टिप्पणी कीजिए।
प्रस्तावना
कांग्रेस अमेरिका की संघीय विधायिका है। यह दो सदनों—प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सीनेट (Senate)—से मिलकर बनी है। अमेरिकी संविधान में शक्ति विभाजन के सिद्धांत के अंतर्गत कांग्रेस को महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।
कांग्रेस की प्रमुख शक्तियाँ
1. विधायी शक्तियाँ
संघीय कानूनों का निर्माण।
2. वित्तीय शक्तियाँ
1. कर लगाना
2. बजट स्वीकृत करना
3. सरकारी व्यय नियंत्रित करना
3. युद्ध संबंधी शक्तियाँ
युद्ध की घोषणा करने का अधिकार।
4. नियुक्तियों पर नियंत्रण
सीनेट राष्ट्रपति द्वारा की गई नियुक्तियों को स्वीकृति देती है।
5. संधियों की स्वीकृति
अंतरराष्ट्रीय संधियों को सीनेट की स्वीकृति आवश्यक होती है।
6. महाभियोग शक्ति
प्रतिनिधि सभा
महाभियोग का आरोप लगाती है।
सीनेट
मुकदमे का निर्णय करती है।
शक्ति विभाजन का प्रदर्शन
1. कांग्रेस कानून बनाती है।
2. राष्ट्रपति कानून लागू करता है।
3. न्यायपालिका कानूनों की वैधता की जांच करती है।
महत्व
1. निरंकुशता की रोकथाम
2. शक्ति संतुलन
3. लोकतांत्रिक शासन की सुरक्षा
निष्कर्ष
अमेरिकी कांग्रेस की शक्तियाँ शक्ति विभाजन एवं नियंत्रण-संतुलन के सिद्धांत का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। यह व्यवस्था लोकतंत्र को मजबूत बनाती है तथा शासन के किसी भी अंग को अत्यधिक शक्तिशाली बनने से रोकती है।
इकाई–13 : स्विट्ज़रलैंड का संविधान – I
(संविधान की मूलभूत विशेषताएँ, स्विस संघीय व्यवस्था)
प्रश्न 1. स्विट्जरलैण्ड के संविधान की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
प्रस्तावना
स्विट्जरलैण्ड का संविधान विश्व के प्रमुख लोकतांत्रिक संविधानों में से एक है। यह संघात्मक शासन, प्रत्यक्ष लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक स्थिरता के लिए प्रसिद्ध है। वर्तमान स्विस संविधान 1848 में लागू हुआ तथा 1874 और 1999 में इसमें महत्वपूर्ण संशोधन किए गए।
स्विस संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. लिखित संविधान
स्विट्जरलैण्ड का संविधान एक लिखित एवं व्यवस्थित दस्तावेज़ है।
2. संघात्मक संविधान
देश में केंद्र और कैंटन (राज्य) दोनों स्तर की सरकारें कार्य करती हैं।
3. कठोर संविधान
संविधान संशोधन के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है।
4. प्रत्यक्ष लोकतंत्र
स्विट्जरलैण्ड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रत्यक्ष लोकतंत्र है।
प्रमुख साधन
- जनमत संग्रह (Referendum)
- जन पहल (Initiative)
5. लोकप्रिय प्रभुसत्ता
जनता को सर्वोच्च शक्ति का स्रोत माना जाता है।
6. बहुभाषीय एवं बहुसांस्कृतिक राज्य
देश में विभिन्न भाषाओं एवं संस्कृतियों को समान सम्मान प्राप्त है।
7. मौलिक अधिकारों की व्यवस्था
नागरिकों को विभिन्न अधिकार और स्वतंत्रताएँ प्रदान की गई हैं।
8. स्वतंत्र न्यायपालिका
न्यायपालिका कानून के शासन की रक्षा करती है।
9. द्विसदनीय संघीय विधानमंडल
संघीय सभा दो सदनों से मिलकर बनती है—
- राष्ट्रीय परिषद
- राज्य परिषद
10. सामूहिक कार्यपालिका
संघीय परिषद (Federal Council) सात सदस्यों की सामूहिक कार्यपालिका है।
निष्कर्ष
स्विट्जरलैण्ड का संविधान लोकतंत्र, संघवाद और जनसहभागिता का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी विशेषताओं ने देश को राजनीतिक स्थिरता और प्रभावी शासन प्रदान किया है।
प्रश्न 2. प्रत्यक्ष प्रजातंत्र से आप क्या समझते हैं? स्विट्जरलैण्ड में इसके स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
प्रस्तावना
प्रत्यक्ष प्रजातंत्र (Direct Democracy) ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें जनता स्वयं शासन संबंधी निर्णयों में भाग लेती है। स्विट्जरलैण्ड को प्रत्यक्ष लोकतंत्र का आदर्श उदाहरण माना जाता है।
प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का अर्थ
प्रत्यक्ष प्रजातंत्र वह व्यवस्था है जिसमें जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से नहीं बल्कि सीधे शासन संबंधी निर्णयों में भाग लेती है।
स्विट्जरलैण्ड में प्रत्यक्ष प्रजातंत्र के साधन
1. जनमत संग्रह (Referendum)
जनता किसी कानून को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
प्रकार
(क) अनिवार्य जनमत संग्रह
संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक।
(ख) वैकल्पिक जनमत संग्रह
जनता की मांग पर कराया जाता है।
2. जन पहल (Popular Initiative)
नागरिक संविधान संशोधन का प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकते हैं।
3. लैंड्सगेमाइंड (Landsgemeinde)
कुछ कैंटनों में नागरिक खुले मैदान में एकत्र होकर निर्णय लेते हैं।
प्रत्यक्ष लोकतंत्र के गुण
1. जनता की सीधी भागीदारी
2. लोकतंत्र की मजबूती
3. सरकार पर नियंत्रण
4. राजनीतिक जागरूकता
दोष
1. समय एवं धन की अधिक आवश्यकता
2. जटिल विषयों पर निर्णय कठिन
3. भावनात्मक निर्णय की संभावना
निष्कर्ष
स्विट्जरलैण्ड का प्रत्यक्ष लोकतंत्र विश्व के लिए एक आदर्श मॉडल है। यह नागरिकों को शासन में सक्रिय भागीदारी का अवसर प्रदान करता है।
प्रश्न 3. स्विस संविधान प्राचीन होने के साथ-साथ समयानुकूल कैसे है?
प्रस्तावना
स्विट्जरलैण्ड का संविधान 1848 में लागू हुआ था, इसलिए यह अपेक्षाकृत पुराना संविधान है। इसके बावजूद यह आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित होता रहा है।
स्विस संविधान के समयानुकूल होने के कारण
1. संशोधन की व्यवस्था
संविधान में आवश्यकतानुसार संशोधन किए जा सकते हैं।
2. प्रत्यक्ष लोकतंत्र
जनता स्वयं संविधान में परिवर्तन का प्रस्ताव दे सकती है।
3. संघात्मक लचीलापन
केंद्र और कैंटनों के बीच संतुलन बनाए रखा गया है।
4. नागरिक अधिकारों का विस्तार
समय-समय पर नए अधिकारों को शामिल किया गया।
5. आधुनिक प्रशासनिक सुधार
शासन प्रणाली को बदलती परिस्थितियों के अनुसार विकसित किया गया।
6. बहुसांस्कृतिक समाज का सम्मान
विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक समूहों को समान महत्व दिया गया।
7. 1999 का नया संविधान
1999 में संविधान का पुनर्गठन कर उसे आधुनिक स्वरूप प्रदान किया गया।
निष्कर्ष
स्विस संविधान अपनी पुरातनता के साथ-साथ आधुनिक आवश्यकताओं को भी पूरा करता है। यही कारण है कि इसे एक जीवंत और समयानुकूल संविधान माना जाता है।
प्रश्न 4. स्विट्जरलैण्ड के संघात्मक शासन की विशेषताओं का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
प्रस्तावना
स्विट्जरलैण्ड विश्व के सफल संघीय राज्यों में से एक है। यहाँ संघीय व्यवस्था लोकतंत्र, स्थानीय स्वायत्तता तथा राष्ट्रीय एकता का संतुलित स्वरूप प्रस्तुत करती है।
स्विस संघात्मक शासन की प्रमुख विशेषताएँ
1. दोहरी शासन व्यवस्था
- संघीय सरकार
- कैंटन सरकारें
2. शक्तियों का विभाजन
संविधान द्वारा केंद्र और कैंटनों की शक्तियाँ निर्धारित की गई हैं।
3. कैंटनों की स्वायत्तता
कैंटन अपने स्थानीय मामलों में पर्याप्त स्वतंत्रता रखते हैं।
4. लिखित एवं कठोर संविधान
संघीय व्यवस्था की रक्षा करता है।
5. द्विसदनीय विधानमंडल
केंद्र और कैंटनों दोनों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका
संवैधानिक विवादों का समाधान करती है।
7. प्रत्यक्ष लोकतंत्र का समावेश
संघीय शासन में जनता की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई है।
स्विस संघीय व्यवस्था के गुण
1. स्थानीय स्वायत्तता
2. विविधता का संरक्षण
3. लोकतांत्रिक भागीदारी
4. राजनीतिक स्थिरता
आलोचना
1. निर्णय प्रक्रिया धीमी
2. प्रशासनिक जटिलता
3. विभिन्न कैंटनों में नीतिगत भिन्नताएँ
निष्कर्ष
स्विट्जरलैण्ड की संघीय व्यवस्था लोकतंत्र, स्वायत्तता और राष्ट्रीय एकता का उत्कृष्ट उदाहरण है। कुछ सीमाओं के बावजूद यह विश्व की सबसे सफल संघीय व्यवस्थाओं में गिनी जाती है।
इकाई–14 : स्विट्ज़रलैंड का संविधान – II
(संघीय शासन : संघीय सभा एवं संघीय परिषद)
प्रश्न 1. स्विट्जरलैण्ड की संघीय सभा की विशेषताओं व शक्तियों पर प्रकाश डालिए।
प्रस्तावना
स्विट्जरलैण्ड की संघीय सभा (Federal Assembly) देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है। यह संघीय शासन प्रणाली का महत्वपूर्ण अंग है और कानून निर्माण, प्रशासनिक नियंत्रण तथा राष्ट्रीय नीतियों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
संघीय सभा का गठन
स्विट्जरलैण्ड की संघीय सभा द्विसदनीय (Bicameral) है।
इसके दो सदन हैं—
1. राष्ट्रीय परिषद (National Council)
- जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
- सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है।
- वर्तमान में 200 सदस्य होते हैं।
2. राज्य परिषद (Council of States)
- कैंटनों का प्रतिनिधित्व करती है।
- प्रत्येक कैंटन को समान प्रतिनिधित्व दिया जाता है।
- कुल 46 सदस्य होते हैं।
संघीय सभा की प्रमुख विशेषताएँ
1. द्विसदनीय व्यवस्था
दोनों सदनों को लगभग समान शक्तियाँ प्राप्त हैं।
2. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व
जनता और कैंटन दोनों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है।
3. संघीय व्यवस्था की रक्षा
संघीय और कैंटन हितों में संतुलन बनाए रखती है।
4. प्रत्यक्ष लोकतंत्र से संबंध
जनमत संग्रह और जन पहल के माध्यम से जनता भी विधायी प्रक्रिया में भाग लेती है।
संघीय सभा की शक्तियाँ
1. विधायी शक्ति
संघीय कानूनों का निर्माण करती है।
2. वित्तीय शक्ति
राष्ट्रीय बजट पारित करती है।
3. निर्वाचन संबंधी शक्ति
संघीय परिषद तथा संघीय न्यायालय के न्यायाधीशों का चुनाव करती है।
4. प्रशासनिक नियंत्रण
संघीय परिषद के कार्यों की समीक्षा करती है।
5. विदेश नीति संबंधी शक्ति
महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौतों को स्वीकृति देती है।
6. संवैधानिक संशोधन
संविधान में संशोधन की प्रक्रिया में भाग लेती है।
संघीय सभा का महत्व
1. लोकतंत्र का आधार
2. संघीय व्यवस्था की रक्षा
3. जनप्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना
4. राष्ट्रीय नीति निर्धारण
निष्कर्ष
स्विट्जरलैण्ड की संघीय सभा लोकतांत्रिक एवं संघीय शासन की आधारशिला है। इसकी शक्तियाँ और संरचना जनता तथा कैंटनों दोनों के हितों की रक्षा करती हैं।
प्रश्न 2. स्विट्जरलैण्ड की संघीय परिषद की विशेषताओं व शक्तियों को बताइये।
प्रस्तावना
संघीय परिषद (Federal Council) स्विट्जरलैण्ड की कार्यपालिका है। यह विश्व की सबसे अनोखी कार्यपालिका व्यवस्थाओं में से एक है क्योंकि यहाँ एक व्यक्ति नहीं बल्कि सात सदस्यों की सामूहिक कार्यपालिका शासन चलाती है।
संघीय परिषद का गठन
1. कुल 7 सदस्य
संघीय परिषद में सात सदस्य होते हैं।
2. निर्वाचन
इनका चुनाव संघीय सभा द्वारा किया जाता है।
3. कार्यकाल
चार वर्ष का कार्यकाल होता है।
4. सामूहिक नेतृत्व
सभी सदस्य समान अधिकार रखते हैं।
संघीय परिषद की प्रमुख विशेषताएँ
1. सामूहिक कार्यपालिका
कार्यपालिका एक व्यक्ति नहीं बल्कि सात सदस्यों का समूह होती है।
2. स्थिर कार्यपालिका
संसद अविश्वास प्रस्ताव द्वारा इसे नहीं हटा सकती।
3. बहुदलीय प्रतिनिधित्व
विभिन्न दलों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है।
4. विशेषज्ञता आधारित संरचना
सदस्य अपने-अपने विभागों के विशेषज्ञ माने जाते हैं।
5. राष्ट्रपति की सीमित भूमिका
राष्ट्रपति केवल "प्रथम among equals" होता है।
संघीय परिषद की शक्तियाँ
1. प्रशासनिक शक्ति
देश का प्रशासन संचालित करती है।
2. विधायी शक्ति
विधेयकों का मसौदा तैयार करती है।
3. वित्तीय शक्ति
राष्ट्रीय बजट तैयार करती है।
4. विदेश नीति
अंतरराष्ट्रीय संबंधों का संचालन करती है।
5. रक्षा संबंधी शक्ति
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों का प्रबंधन करती है।
6. कानूनों का क्रियान्वयन
संघीय कानूनों को लागू करती है।
निष्कर्ष
संघीय परिषद स्विट्जरलैण्ड की कार्यपालिका का केंद्र है। इसकी सामूहिक नेतृत्व व्यवस्था और स्थिरता इसे विश्व की अन्य कार्यपालिकाओं से अलग बनाती है।
प्रश्न 3. स्विस कार्यपालिका को विशेषज्ञों की कार्यपालिका क्यों कहते हैं?
प्रस्तावना
स्विट्जरलैण्ड की कार्यपालिका को "विशेषज्ञों की कार्यपालिका" (Executive of Experts) कहा जाता है। इसका कारण इसकी संरचना, कार्यप्रणाली और सदस्यों की भूमिका है।
विशेषज्ञों की कार्यपालिका कहे जाने के कारण
1. अनुभवी सदस्यों का चयन
संघीय परिषद के सदस्य अनुभवी और योग्य व्यक्तियों में से चुने जाते हैं।
2. विभागीय विशेषज्ञता
प्रत्येक सदस्य एक विशेष विभाग का प्रमुख होता है।
उदाहरण
- विदेश विभाग
- वित्त विभाग
- रक्षा विभाग
3. राजनीतिक स्थिरता
सदस्य लंबे समय तक कार्य करते हैं जिससे उन्हें प्रशासनिक अनुभव प्राप्त होता है।
4. सामूहिक निर्णय प्रणाली
निर्णय विशेषज्ञों के सामूहिक विचार-विमर्श से लिए जाते हैं।
5. दलगत राजनीति का कम प्रभाव
कार्यपालिका में राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जाती है।
6. प्रशासनिक दक्षता
विशेषज्ञता के कारण प्रशासन अधिक प्रभावी होता है।
7. तकनीकी ज्ञान का उपयोग
नीति निर्माण में विशेषज्ञ ज्ञान और अनुभव का उपयोग किया जाता है।
इस व्यवस्था के लाभ
1. कुशल प्रशासन
2. स्थिर शासन
3. बेहतर नीति निर्माण
4. राष्ट्रीय हितों की रक्षा
सीमाएँ
1. निर्णय प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी
2. जनभावनाओं से दूरी की संभावना
निष्कर्ष
स्विस कार्यपालिका को विशेषज्ञों की कार्यपालिका इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके सदस्य अनुभवी, योग्य तथा प्रशासनिक विशेषज्ञ होते हैं। उनकी सामूहिक नेतृत्व प्रणाली स्विट्जरलैण्ड को स्थिर, कुशल और प्रभावी शासन प्रदान करती है।
इकाई–15 : चीन का संविधान
(संविधान की मूलभूत विशेषताएँ, राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस, कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं साम्यवादी दल)
प्रश्न 1. चीनी जनवादी गणराज्य के संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का संक्षेप में वर्णन कीजिये।
प्रस्तावना
चीन का वर्तमान संविधान साम्यवादी क्रांति और राजनीतिक परिवर्तनों का परिणाम है। 1949 में जनवादी गणराज्य चीन (People's Republic of China) की स्थापना के बाद देश में समाजवादी शासन व्यवस्था लागू की गई। चीन का संविधान साम्यवाद, समाजवाद तथा मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा पर आधारित है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1. साम्राज्यवादी शासन का अंत
1911 की क्रांति के बाद चीन में राजशाही समाप्त हुई।
2. कुओमिन्तांग शासन
सन यात-सेन और बाद में च्यांग काई-शेक के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शासन स्थापित हुआ।
3. साम्यवादी आंदोलन का विकास
माओत्से तुंग के नेतृत्व में साम्यवादी आंदोलन मजबूत हुआ।
4. जनवादी गणराज्य की स्थापना (1949)
1 अक्टूबर 1949 को जनवादी गणराज्य चीन की स्थापना हुई।
5. 1954 का संविधान
चीन का पहला स्थायी संविधान 1954 में लागू किया गया।
6. 1975 एवं 1978 के संविधान
सांस्कृतिक क्रांति के प्रभाव से नए संविधान बनाए गए।
7. 1982 का संविधान
वर्तमान संविधान 1982 में लागू हुआ, जिसे चीन का सबसे महत्वपूर्ण संविधान माना जाता है।
वर्तमान संविधान की विशेषता
- समाजवादी राज्य
- साम्यवादी दल का नेतृत्व
- जनता की सर्वोच्चता
- राष्ट्रीय एकता
- आर्थिक विकास पर बल
निष्कर्ष
चीन का संविधान ऐतिहासिक संघर्षों, साम्यवादी क्रांति तथा समाजवादी विचारधारा का परिणाम है। 1982 का संविधान चीन की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का आधार है।
प्रश्न 2. चीन की राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस की स्थायी समिति के संगठन, कार्यों एवं भूमिका का परीक्षण कीजिए।
प्रस्तावना
राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस (National People's Congress – NPC) चीन की सर्वोच्च विधायी संस्था है। इसकी स्थायी समिति (Standing Committee) कांग्रेस के अवकाश काल में उसके कार्यों का संचालन करती है।
स्थायी समिति का संगठन
1. अध्यक्ष
2. उपाध्यक्ष
3. महासचिव
4. अन्य सदस्य
इनका चुनाव राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस द्वारा किया जाता है।
स्थायी समिति के कार्य
1. विधायी कार्य
कानूनों का निर्माण एवं संशोधन।
2. संविधान की व्याख्या
संविधान की व्याख्या करने का अधिकार।
3. प्रशासनिक नियंत्रण
राज्य परिषद और अन्य निकायों की निगरानी।
4. नियुक्ति संबंधी कार्य
महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति और पदमुक्ति।
5. विदेश नीति संबंधी कार्य
अंतरराष्ट्रीय समझौतों को स्वीकृति देना।
स्थायी समिति की भूमिका
1. राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस का प्रतिनिधित्व
2. विधायी निरंतरता बनाए रखना
3. शासन में स्थिरता
4. साम्यवादी दल की नीतियों को लागू करना
निष्कर्ष
स्थायी समिति चीन की विधायी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण अंग है। यह राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस के कार्यों को निरंतर संचालित करती है और शासन व्यवस्था को प्रभावी बनाती है।
प्रश्न 3. राष्ट्रीय जनवादी चीन की समिति व्यवस्था पर एक निबंध लिखिए।
प्रस्तावना
चीन की राजनीतिक व्यवस्था समिति प्रणाली (Committee System) पर आधारित है। यह प्रणाली प्रशासनिक दक्षता और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को बढ़ावा देती है।
समिति व्यवस्था का अर्थ
समिति व्यवस्था ऐसी प्रणाली है जिसमें विभिन्न समितियाँ शासन और प्रशासन के विभिन्न कार्यों का संचालन करती हैं।
प्रमुख समितियाँ
1. राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस की समितियाँ
(क) वित्त समिति
(ख) विधि समिति
(ग) विदेश मामलों की समिति
2. स्थायी समिति
राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस की सबसे महत्वपूर्ण समिति।
3. स्थानीय समितियाँ
प्रांतों और स्थानीय निकायों में गठित समितियाँ।
समिति व्यवस्था की विशेषताएँ
1. सामूहिक निर्णय
2. प्रशासनिक विशेषज्ञता
3. कार्य विभाजन
4. शासन में दक्षता
समिति व्यवस्था का महत्व
1. प्रभावी प्रशासन
2. नीति निर्माण में सहायता
3. साम्यवादी दल की नीतियों का क्रियान्वयन
4. शासन में निरंतरता
निष्कर्ष
चीन की समिति व्यवस्था प्रशासनिक कुशलता और सामूहिक नेतृत्व का उदाहरण है। यह शासन को संगठित एवं प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रश्न 4. जनवादी चीन की न्याय व्यवस्था की समीक्षा कीजिए।
प्रस्तावना
चीन की न्यायपालिका समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य संविधान और कानूनों की रक्षा करना तथा समाजवादी व्यवस्था को मजबूत बनाना है।
चीन की न्यायिक संरचना
1. सर्वोच्च जन न्यायालय
(Supreme People's Court)
देश का सर्वोच्च न्यायालय।
2. स्थानीय जन न्यायालय
विभिन्न स्तरों पर स्थापित न्यायालय।
3. विशेष न्यायालय
उदाहरण
- सैन्य न्यायालय
- रेलवे न्यायालय
न्यायपालिका की विशेषताएँ
1. समाजवादी न्याय व्यवस्था
2. एकीकृत न्यायिक प्रणाली
3. जनहित पर बल
4. साम्यवादी दल का प्रभाव
न्यायपालिका के कार्य
1. कानूनों की व्याख्या
2. विवादों का निपटारा
3. नागरिक अधिकारों की रक्षा
4. न्याय प्रशासन
आलोचनात्मक मूल्यांकन
सकारात्मक पक्ष
1. सरल न्यायिक संरचना
2. त्वरित न्याय
3. राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा
नकारात्मक पक्ष
1. न्यायपालिका की सीमित स्वतंत्रता
2. साम्यवादी दल का प्रभाव
3. न्यायिक पुनरावलोकन का अभाव
निष्कर्ष
चीन की न्यायपालिका समाजवादी राज्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। यद्यपि इसकी स्वतंत्रता सीमित मानी जाती है, फिर भी यह प्रशासनिक एवं कानूनी व्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रश्न 5. चीन के प्रशासन में साम्यवादी दल के स्थान का वर्णन कीजिए।
प्रस्तावना
चीन की राजनीतिक व्यवस्था में साम्यवादी दल (Communist Party of China – CPC) का सर्वोच्च स्थान है। संविधान के अनुसार भी साम्यवादी दल देश का नेतृत्वकारी राजनीतिक संगठन है।
साम्यवादी दल का संगठन
1. राष्ट्रीय कांग्रेस
2. केंद्रीय समिति
3. पोलित ब्यूरो
4. पोलित ब्यूरो की स्थायी समिति
प्रशासन में साम्यवादी दल का स्थान
1. सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति
साम्यवादी दल चीन की सबसे शक्तिशाली संस्था है।
2. नीति निर्माण
राष्ट्रीय नीतियों का निर्धारण दल द्वारा किया जाता है।
3. सरकार पर नियंत्रण
राज्य की प्रमुख संस्थाएँ दल के निर्देशन में कार्य करती हैं।
4. सैन्य नियंत्रण
सेना पर साम्यवादी दल का नियंत्रण होता है।
5. प्रशासनिक नियुक्तियाँ
महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों में दल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
6. वैचारिक नेतृत्व
मार्क्सवाद, लेनिनवाद और समाजवादी विचारधारा का प्रसार।
साम्यवादी दल का महत्व
1. राजनीतिक स्थिरता
2. राष्ट्रीय एकता
3. आर्थिक विकास में योगदान
4. समाजवादी व्यवस्था की रक्षा
आलोचना
1. एकदलीय व्यवस्था
2. राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का अभाव
3. लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं पर सीमाएँ
निष्कर्ष
चीन के प्रशासन में साम्यवादी दल का केंद्रीय और सर्वोच्च स्थान है। सरकार, सेना और प्रशासन सभी पर उसका प्रभाव देखा जा सकता है। यही दल चीन की राजनीतिक व्यवस्था का वास्तविक केंद्र है।
इकाई–16 : रूस के संविधान की विशेषताएँ
प्रश्न 1. रूस में ड्यूमा का गठन कैसे होता है? उसकी शक्तियों की व्याख्या कीजिये।
प्रस्तावना
रूस की संघीय सभा (Federal Assembly) देश की संसद है। यह द्विसदनीय (Bicameral) विधायिका है, जिसमें उच्च सदन फेडरेशन काउंसिल (Federation Council) तथा निम्न सदन राज्य ड्यूमा (State Duma) होता है। ड्यूमा रूस की प्रमुख विधायी संस्था है।
ड्यूमा का गठन
1. निम्न सदन
ड्यूमा रूस की संसद का निम्न सदन है।
2. सदस्य संख्या
राज्य ड्यूमा में 450 सदस्य होते हैं।
3. निर्वाचन
सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से किया जाता है।
4. कार्यकाल
ड्यूमा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
5. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
सभी योग्य नागरिक मतदान कर सकते हैं।
ड्यूमा की शक्तियाँ
1. विधायी शक्ति
कानून बनाने का अधिकार ड्यूमा को प्राप्त है।
2. प्रधानमंत्री की नियुक्ति में भूमिका
राष्ट्रपति द्वारा प्रस्तावित प्रधानमंत्री की स्वीकृति ड्यूमा देती है।
3. सरकार पर नियंत्रण
सरकार के कार्यों की समीक्षा करती है।
4. अविश्वास प्रस्ताव
ड्यूमा सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सकती है।
5. बजट संबंधी शक्ति
राष्ट्रीय बजट पर विचार एवं स्वीकृति देती है।
6. महाभियोग प्रक्रिया
राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया प्रारंभ कर सकती है।
निष्कर्ष
रूस की राज्य ड्यूमा लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। यह कानून निर्माण, सरकार की जवाबदेही और राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रश्न 2. रूस के राष्ट्रपति का निर्वाचन तथा उसके अधिकारों की व्याख्या कीजिये।
प्रस्तावना
रूस का राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च संवैधानिक पदाधिकारी होता है। वह राज्य का प्रमुख तथा संविधान का संरक्षक माना जाता है। रूसी राजनीतिक व्यवस्था में राष्ट्रपति अत्यंत शक्तिशाली पद है।
राष्ट्रपति का निर्वाचन
1. प्रत्यक्ष चुनाव
राष्ट्रपति का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान से किया जाता है।
2. कार्यकाल
वर्तमान में राष्ट्रपति का कार्यकाल 6 वर्ष का है।
3. बहुमत का सिद्धांत
उम्मीदवार को कुल वैध मतों का 50% से अधिक प्राप्त करना आवश्यक है।
4. योग्यता
- रूस का नागरिक हो।
- निर्धारित आयु पूरी की हो।
- संविधान में निर्धारित शर्तों को पूरा करता हो।
राष्ट्रपति के अधिकार
1. कार्यपालिका शक्तियाँ
सरकार के कार्यों का निर्देशन करता है।
2. प्रधानमंत्री की नियुक्ति
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
3. विधायी शक्तियाँ
(क) विधेयकों पर हस्ताक्षर
(ख) वीटो शक्ति
4. विदेश नीति संबंधी शक्तियाँ
अंतरराष्ट्रीय संबंधों का संचालन करता है।
5. रक्षा संबंधी शक्तियाँ
राष्ट्रपति सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर होता है।
6. आपातकालीन शक्तियाँ
विशेष परिस्थितियों में आपातकाल घोषित कर सकता है।
7. नियुक्ति संबंधी शक्तियाँ
उच्च अधिकारियों और न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
निष्कर्ष
रूस का राष्ट्रपति अत्यंत शक्तिशाली संवैधानिक पद है। उसकी शक्तियाँ रूस की राजनीतिक व्यवस्था को स्थिरता और नेतृत्व प्रदान करती हैं।
प्रश्न 3. रूस के संविधान में विधायिका एवं कार्यपालिका के संबंधों पर एक निबन्ध लिखिये।
प्रस्तावना
रूस की शासन व्यवस्था अर्ध-अध्यक्षीय (Semi-Presidential) प्रणाली पर आधारित है। इसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सरकार तथा संसद के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है।
विधायिका और कार्यपालिका का संबंध
1. शक्तियों का पृथक्करण
संविधान के अनुसार विधायिका और कार्यपालिका अलग-अलग संस्थाएँ हैं।
2. राष्ट्रपति की भूमिका
राष्ट्रपति दोनों संस्थाओं के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है।
3. प्रधानमंत्री की नियुक्ति
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है, लेकिन ड्यूमा की स्वीकृति आवश्यक होती है।
4. कानून निर्माण
विधायिका कानून बनाती है जबकि कार्यपालिका उन्हें लागू करती है।
5. अविश्वास प्रस्ताव
ड्यूमा सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सकती है।
6. राष्ट्रपति का प्रभाव
राष्ट्रपति संसद को भंग करने की शक्ति रखता है (विशेष परिस्थितियों में)।
7. बजट प्रक्रिया
कार्यपालिका बजट प्रस्तुत करती है और विधायिका उसे स्वीकृत करती है।
संबंधों का मूल्यांकन
सकारात्मक पक्ष
- शक्ति संतुलन
- प्रशासनिक स्थिरता
- उत्तरदायित्व
नकारात्मक पक्ष
- राष्ट्रपति का अत्यधिक प्रभाव
- शक्ति असंतुलन की संभावना
निष्कर्ष
रूस की राजनीतिक व्यवस्था में विधायिका और कार्यपालिका के बीच सहयोग एवं नियंत्रण दोनों की व्यवस्था है। हालांकि राष्ट्रपति की शक्तियाँ अपेक्षाकृत अधिक होने के कारण कार्यपालिका अधिक प्रभावशाली दिखाई देती है।
प्रश्न 4. रूस की दलीय व्यवस्था पर निबंध लिखिए।
प्रस्तावना
राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग होते हैं। रूस में बहुदलीय व्यवस्था (Multi-Party System) विद्यमान है, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दल चुनावों और शासन प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
रूस की दलीय व्यवस्था का विकास
1. सोवियत काल
सोवियत संघ में केवल साम्यवादी दल (Communist Party) का प्रभुत्व था।
2. सोवियत संघ का विघटन (1991)
इसके बाद बहुदलीय व्यवस्था का विकास हुआ।
प्रमुख राजनीतिक दल
1. यूनाइटेड रशिया (United Russia)
सबसे प्रभावशाली दल माना जाता है।
2. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ द रशियन फेडरेशन
रूस का प्रमुख विपक्षी दल।
3. लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी
राष्ट्रवादी विचारधारा वाला दल।
4. ए जस्ट रशिया
सामाजिक लोकतांत्रिक विचारों का समर्थन करता है।
रूस की दलीय व्यवस्था की विशेषताएँ
1. बहुदलीय व्यवस्था
2. राष्ट्रपति प्रधान राजनीति
3. मजबूत सत्तारूढ़ दल
4. सीमित विपक्षी प्रभाव
5. राष्ट्रीय राजनीति में दलों की महत्वपूर्ण भूमिका
रूस की दलीय व्यवस्था का महत्व
1. लोकतांत्रिक भागीदारी
2. जनमत का प्रतिनिधित्व
3. नीति निर्माण में योगदान
4. राजनीतिक स्थिरता
आलोचना
1. सत्तारूढ़ दल का प्रभुत्व
2. विपक्ष की सीमित भूमिका
3. राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पर प्रश्न
निष्कर्ष
रूस में बहुदलीय व्यवस्था मौजूद है, लेकिन व्यवहार में सत्तारूढ़ दल का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। फिर भी राजनीतिक दल लोकतांत्रिक प्रक्रिया और शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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